अहले बैत (अ) की रिवायतों में इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत को असाधारण महत्व दिया गया है। विशेष रूप से इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने विभिन्न हदीसों में परिस्थितियों, सामर्थ्य और दूरी के अनुसार ज़ियारत-ए-सय्यदुश शोहदा (अ) के विभिन्न स्तरों को बयान किया है। कहीं साल में एक या दो बार ज़ियारत की ताकीद है, तो कहीं हर महीने ज़ियारत की प्रेरणा दी गई है, जबकि दूर रहने वालों के लिए दूर से सलाम और हृदय से ध्यान को भी महान प्रतिफल का कारण बताया गया है।
अहले बैत (अ) की रिवायतों में इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत को असाधारण महत्व दिया गया है। विशेष रूप से इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने विभिन्न हदीसों में परिस्थितियों, सामर्थ्य और दूरी के अनुसार ज़ियारत-ए-सय्यदुश शोहदा (अ) के विभिन्न स्तरों को बयान किया है। कहीं साल में एक या दो बार ज़ियारत की ताकीद है, तो कहीं हर महीने ज़ियारत की प्रेरणा दी गई है, जबकि दूर रहने वालों के लिए दूर से सलाम और हृदय से ध्यान को भी महान प्रतिफल का कारण बताया गया है।
धनवान और संपन्न लोगों के लिए साल में दो बार तथा गरीब के लिए एक बार ज़ियारत
इमाम सादिक़ (अ):
«حَقٌّ عَلَی الْغَنِیِّ أَنْ یَأْتِیَ قَبْرَ الْحُسَیْنِ ع فِی السَّنَةِ مَرَّتَیْنِ وَ حَقٌّ عَلَی الْفَقِیرِ أَنْ یَأْتِیَهُ فِی السَّنَةِ مَرَّةً.»
इमाम सादिक़ (अ) ने फरमाया: धनवान पर यह हक़ है कि वह साल में दो बार इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत करे, जबकि गरीब के लिए कम से कम साल में एक बार ज़ियारत करना आवश्यक है। (कामिलुज़ ज़ियारात, पेज 293)
यदि सामर्थ्य हो तो हर महीने ज़ियारत करो
इमाम सादिक़ (अ):
«یَا عَلِیُّ بَلَغَنِی أَنَّ قَوْماً مِنْ شِیعَتِنَا یَمُرُّ بِأَحَدِهِمُ السَّنَةُ وَ السَّنَتَانِ لَا یَزُورُونَ الْحُسَیْنَ...»
अली बिन मैमून साएग़ रिवायत करते हैं कि इमाम सादिक़ (अ) ने फरमाया: ऐ अली! मुझे खबर मिली है कि हमारे कुछ शियाओं पर एक या दो साल बीत जाते हैं और वे इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत नहीं करते। मैंने अर्ज़ की: मौला! मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ। इमाम (अ) ने फरमाया: वे अपने महान हिस्से से वंचित हो गए, ईश्वरीय प्रतिफल से दूर हो गए और रसूलुल्लाह (स) के करीब से वंचित हो गए। (कामिलुज़ ज़ियारात, पेज 295)
मैंने अर्ज़ की: कितने अंतराल पर ज़ियारत करनी चाहिए? फरमाया: यदि सामर्थ्य रखते हो तो हर महीने ज़ियारत करो।
मैंने अर्ज़ की: मैं अपने हाथों से काम करता हूँ और लोगों के मामले भी मेरे ज़िम्मे हैं, इसलिए यह संभव नहीं है। इमाम (अ) ने फरमाया: तुम माज़ूर हो, और वे लोग भी माज़ूर हैं जो मेहनत-मज़दूरी करते हैं। मेरी मुराद वे लोग हैं जिनके लिए हर जुमे ज़ियारत पर जाना आसान है, फिर भी नहीं जाते। ऐसे लोगों के पास क़ियामत के दिन अल्लाह और रसूल (स) के सामने कोई बहाना नहीं होगा।
मैंने अर्ज़ की: यदि कोई व्यक्ति अपनी ओर से किसी दूसरे को भेज दे तो क्या यह काफी है? फरमाया: हाँ, लेकिन यदि स्वयं जाए तो उसका प्रतिफल कहीं अधिक महान है। अल्लाह तआला ऐसे ज़ाइर पर रहमत की नज़र फरमाता है, उसे फ़िरदौसुल आ'ला प्रदान करता है और मुहम्मद व आले मुहम्मद (अ) के साथ महशूर करता है। अतः तुम इस नेकी में एक-दूसरे पर सबक़त ले जाओ और अहले ज़ियारत-ए-हुसैन (अ) में शामिल हो जाओ।
निकट रहने वालों के लिए मासिक और दूर रहने वालों के लिए हर तीन साल में एक बार ज़ियारत
इमाम सादिक़ (अ):
«لَا یَسَعُ أَکْثَرَ مِنْ شَهْرٍ وَ أَمَّا بَعِیدُ الدَّارِ فَفِی کُلِّ ثَلَاثِ سِنِینَ...»
सफ़वान जम्माल रिवायत करते हैं कि मैंने इमाम सादिक़ (अ) से अर्ज़ किया: जो व्यक्ति ज़ियारत करके वापस आ जाए, वह कितने दिनों बाद पुनः ज़ियारत करे? और लोग कितनी अवधि तक ज़ियारत छोड़ सकते हैं? (कामिलुज़ ज़ियारात, पे. 296)
इमाम (अ) ने फरमाया: निकट रहने वालों के लिए एक महीने से अधिक ज़ियारत छोड़ना उचित नहीं है, जबकि दूर रहने वालों को कम से कम हर तीन साल में एक बार ज़ियारत अवश्य करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति तीन वर्ष से अधिक अवधि तक बिना किसी बाधा के ज़ियारत छोड़ दे तो गोया उसने रसूलुल्लाह (स) की हुर्मत का उल्लंघन किया।
दूर से प्रतिदिन ज़ियारत और सलाम का महान प्रतिफल
इमाम सादिक़ (अ):
«یَا سَدِیرُ تَزُورُ قَبْرَ الْحُسَیْنِ ع فِی کُلِّ یَوْمٍ...»
इमाम सादिक़ (अ) ने सदीर से फरमाया: ऐ सदीर! क्या तुम प्रतिदिन इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत करते हो? (मिरआतुल उक़ूल, भाग 18, पेज 319)
उन्होंने अर्ज़ किया: नहीं।
फरमाया: तुम लोग कितनी बेवफ़ाई करते हो! क्या हर जुमे ज़ियारत करते हो? अर्ज़ किया: नहीं। फरमाया: हर महीने? अर्ज़ किया: नहीं। फरमाया: हर साल? अर्ज़ किया: कभी-कभार।
इमाम (अ) ने फरमाया: तुम लोग इमाम हुसैन (अ) के साथ कितनी बेवफ़ाई करते हो। क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह तआला के बीस लाख फ़रिश्ते हैं, जिनके बाल धूल-धूसरित हैं और वे शोकग्रस्त अवस्था में निरंतर इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत करते और रोते रहते हैं?
फिर फरमाया: यदि तुम दूर हो तो अपने घर की छत पर चढ़ो, दाएँ-बाएँ देखो, फिर आकाश की ओर सिर उठाओ और उसके बाद कर्बला की दिशा में ध्यान करके कहो:
«السَّلَامُ عَلَیْکَ یَا أَبَا عَبْدِ اللَّهِ السَّلَامُ عَلَیْکَ وَ رَحْمَةُ اللَّهِ وَ بَرَکَاتُهُ»
सलाम है तुझ पर, ऐ अबा अब्दिल्लाह, सलाम है तुझ पर और अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हैं।
इमाम (अ) ने फरमाया: तुम्हारे लिए एक ज़ियारत का प्रतिफल लिखा जाएगा, और प्रत्येक ज़ियारत का प्रतिफल एक हज और एक उमरा के बराबर होगा। सदीर कहते हैं: फिर मैंने ऐसा महीने में बीस बार से अधिक किया।