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दार और मिंबर का अजीब इम्तिज़ाज

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दार और मिंबर का अजीब इम्तिज़ाज

,बाज़ औक़ात तारीख़ के उफ़ुक़ पर ऐसे मंज़र नमूदार होते हैं जिनके सामने क़लम लरज़ने लगता है, अल्फ़ाज़ ख़ामोश हो जाते हैं और अक़्ल हैरत के समंदर में डूब जाती है। हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम की सूली भी ऐसा ही एक अज़ीम और नाक़ाबिले-फ़रामोश मंज़र है।

यह कोई मामूली फाँसी न थी। यह एक ग़ुलामे अली (अ०स०) और सल्तनते बातिल के दरमियान आख़िरी मुकालमा था। यह एक आशिक़े विलायत और जाबिर इक़्तेदार के दरमियान फ़ैसला-कुन मआरका था। यह एक ज़बान और हज़ारों तलवारों की जंग थी। यह एक दिल और एक सल्तनत का मुक़ाबला था। हैरतअंगेज़ बात यह है कि इस मआरके में तलवारें हार गईं और ज़बान जीत गई, हुकूमत हार गई और सूली जीत गई, क़ातिल शिकस्त खा गया और मक़तूल अमर हो गया।

सूली पर एक इंसान नहीं, एक मकतब खड़ा था

लोग समझते हैं कि इब्ने ज़ियाद ने एक फ़र्द को सूली दी थी। नहीं! उसने एक जिस्म को सूली दी थी, मगर उस जिस्म के अंदर एक पूरा मकतब धड़क रहा था।

वहाँ एक इंसान नहीं खड़ा था बल्कि अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम की मआरिफ़त खड़ी थी। वहाँ एक क़ैदी नहीं लटका था बल्कि विलायत का परचम लहरा रहा था। वहाँ एक मजबूर शख़्स नहीं था बल्कि इस्तिक़ामत का एक बुलंद पहाड़ ईस्तादा था। वहाँ कोई मुजरिम नहीं था बल्कि सदाक़त का एक रौशन सितारा जगमगा रहा था।

जिस लम्हे हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम दार पर बुलंद हुए, उसी लम्हे उनकी क़ामत ज़मीन से उठकर तारीख़ के आसमान तक पहुँच गई।

दार की बुलंदी और रूह की परवाज़

सूली का मक़सद इंसान को रुसवा करना होता है, लेकिन हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम की सूली उनकी रिफ़अत व अज़मत का सबब बन गई। ज़ालिमों ने उन्हें ज़मीन से इसलिए बुलंद किया था कि लोग इबरत हासिल करें, मगर ख़ुदा ने उन्हें इसलिए बुलंद किया कि लोग हिदायत हासिल करें। वह जितना सूली पर बुलंद होते गए, उतना ही उनका मक़ाम दिलों में बुलंद होता गया। वह जितना जिस्मानी तौर पर पाबंद होते गए, उतनी ही उनकी रूह आज़ाद होती गई।

यह अमीरे काइनात अली अलैहिस्सलाम की मआरिफ़त की दुनिया है; जहाँ ज़ंजीरें आज़ादी बन जाती हैं, क़ैद इबादत बन जाती है, शहादत ज़िंदगी बन जाती है और सूली मिंबर में बदल जाती है।

ख़तीबे विलायत, ज़ाकिरे मआरिफ़त, सुख़नराने बसीरत

हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम ने सूली पर इश्क़े अली (अ.स.) का आख़िरी ख़ुत्बा दिया।

तसव्वुर कीजिए! कूफ़ा का बाज़ार है, लोगों का हुजूम है, सिपाहियों का मुहासरा है, ख़ौफ़ की फ़िज़ा है, तलवारों की चमक है और दरमियान में सूली पर लटका हुआ एक आशिक़े अली (अ.स.) है।

आम इंसान होता तो अपने ज़ख़्म गिनता, अपनी तकलीफ़ बयान करता और अपनी जान बचाने की फ़िक्र करता, लेकिन हज़रत मीसम तम्मार अलैहिस्सलाम अपनी ज़ात को फ़रामोश कर चुके थे। वह अपनी प्यास भूल गए थे, अपने ज़ख़्म भूल गए थे, अपनी मौत भूल गए थे और सिर्फ़ मौला अली (अ.स.) को याद कर रहे थे।

गोया उनकी हर साँस यह एलान कर रही थी, “अगर ज़िंदगी मिली तो अली (अ.स.) के लिए, और अगर मौत आई तो अली (अ.स.) के लिए।”

यह इश्क़ की वह मंज़िल है जहाँ आशिक़ अपनी ज़ात से निकलकर महबूब में फ़ना हो जाता है।

ज़ालिम की सबसे बड़ी शिकस्त

ज़ालिम की कामयाबी सिर्फ़ किसी को क़त्ल कर देना नहीं होती बल्कि उसकी अस्ल कामयाबी यह होती है कि वह अपने मुख़ालिफ़ को ख़ामोश कर दे। लेकिन हज़रत मैसम तम्मार अलैहिस्सलाम के मामले में इब्ने ज़ियाद नाकाम हो गया। वह जिस्म को क़त्ल कर सका, फ़िक्र को नहीं; ज़बान को काट सका, अक़ीदे को नहीं; ख़ून बहा सका, पैग़ाम को नहीं। यही उसकी सबसे बड़ी शिकस्त थी।

वह सूली को ख़ामोशी की अलामत बनाना चाहता था, मगर हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने उसे बेदारी की अलामत बना दिया। वह मौत को ख़ौफ़ की निशानी बनाना चाहता था, मगर हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने उसे शुजाअत और हुर्रियत की निशानी बना दिया।

लहू का ख़िताब

जब ख़ून तक़रीर करता है तो उसकी गूँज अफ़लाक पर छा जाती है।

दुनिया की तक़रीरें चंद लम्हों के लिए असर रखती हैं, दुनिया के ख़तीब चंद बरसों बाद भुला दिए जाते हैं, मगर ख़ून की तक़रीर कभी ख़त्म नहीं होती। शहीद का ख़ुत्बा सदियों तक जारी रहता है।

हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम की ज़बान काट दी गई, मगर उनका ख़ून बोलता रहा, उनके ज़ख़्म बोलते रहे, उनकी सूली बोलती रही, उनकी ख़ामोशी बोलती रही और आज चौदह सौ बरस गुज़र जाने के बाद भी उनका पैग़ाम ज़िन्दा है।

इरफ़ाने फ़ना और बक़ाए अबदी

अहले इरफ़ान कहते हैं कि जब इंसान ख़ुदा की राह में अपनी ज़ात को फ़ना कर देता है तो उसे बक़ा नसीब होती है। हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने ख़ुद को विलायते अली (अ.स.) में फ़ना कर दिया था, इसी लिए उन्हें बक़ाए अबदी नसीब हुई।

उनका जिस्म ज़ेरे ख़ाक चला गया, मगर उनका नाम ज़िन्दा रहा। उनकी आवाज़ ख़ामोश हो गई, मगर उनका पैग़ाम बाक़ी रहा। उनकी आँखें बंद हो गईं, मगर उनकी बसीरत नस्लों को जगाती रही। इसी लिए आज भी जब उनका नाम लिया जाता है तो दिलों में अकीदत के चिराग़ रौशन हो जाते हैं।

कर्बला के सूरज की पहली किरन

अगर कर्बला को इन्क़िलाबे हुसैनी का नुक़्तए उरूज कहा जाए तो हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम उस इन्क़िलाब के इब्तिदाई तम्हीदी किरदारों में नुमायाँ नज़र आते हैं। यूँ महसूस होता है कि मीसम (अ.स.) की सूली दरअसल कर्बला के सूरज की पहली किरन थी।

उन्होंने कूफ़ा में वही पैग़ाम दिया जिसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में अपने ख़ून से रक़म किया। हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने सूली पर एलान किया कि हक़ को दबाया नहीं जा सकता, और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में साबित कर दिया कि हक़ को शिकस्त भी नहीं दी जा सकती। हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़बान क़ुर्बान की और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपना सर क़ुर्बान किया।

हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम ने दार को मिंबर बनाया और हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने असीरी को मिंबर बना दिया। यूँ मकतबे अहले बैत अलैहिमुस्सलाम ने दुनिया को सिखा दिया कि हक़ का मुबल्लिग़ हालात का मोहताज नहीं होता।

मीसम ए अस्र कौन?

अगर आज हज़रत मीसम अलैहिस्सलाम हमारे दरमियान होते तो शायद हमसे पूछते कि क्या तुम्हारी ज़बान हक़ के लिए खुलती है? क्या तुम इंसाफ़ और सदाक़त का साथ देते हो? क्या तुम मस्लेहत के बुत तोड़ सकते हो? क्या तुम हक़ की ख़ातिर नुक़सान बर्दाश्त कर सकते हो? क्या तुम अपने ज़माने के फ़ित्नों और आज़माइशों को पहचानते हो?

क्योंकि हर दौर अपने इम्तिहानात के साथ आता है, हर ज़माना इंसान के ज़मीर, किरदार और इस्तिक़ामत को परखता है, और हर अहद को ऐसे अफ़राद की ज़रूरत होती है जो सच्चाई, इंसाफ़ और इंसानी अक़दार का परचम बुलंद रख सकें।

मीसम ए अस्र वह है जो हालात के दबाव में भी अपने उसूलों का सौदा न करे, मुश्किलात के साये में भी सच्चाई, इंसाफ़ और इंसानी अक़दार का परचम बुलंद रखे, और अपने अहद की फ़िक्री तारीकियों में उम्मीद और शऊर का चिराग़ बनकर जलता रहे।

हर ज़माने में ऐसे मौक़े आते हैं जब हक़ व बातिल, सदाक़त व मस्लेहत और उसूल व मफ़ाद के दरमियान इंतिख़ाब करना पड़ता है। मीसम ए अस्र वही है जो आसान रास्तों के बजाय दुरुस्त रास्ते का इंतिख़ाब करे, ख़्वाह उसके लिए सब्र, इस्तिक़ामत और क़ुर्बानी ही क्यों न दरकार हो।

वह इख़्तिलाफ़ के बावजूद अख़लाक़ को, ताक़त के बावजूद इंसाफ़ को, और मुश्किलात के बावजूद उम्मीद को ज़िन्दा रखता है। उसकी जद्दोजहद किसी फ़र्द, जमाअत या गिरोह के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि आला इंसानी अक़दार, सच्चाई, दियानत और ख़ैर के फ़रोग़ के लिए होती है।

मीसम ए अस्र दरअसल एक फ़िक्र, एक किरदार और एक ज़िम्मेदारी का नाम है; ऐसा किरदार जो ज़माने के बदलते हालात में भी अपने ज़मीर, अपने उसूलों और अपनी अक़दार से वफ़ादार रहे।

सलाम बर मीसम ए विलायत

सलाम हो उस मर्द ए हक़ पर जिसने मौत के सामने मुस्कुरा कर हक़ का एलान किया।

सलाम हो उस आशिक़े अली (अ.स.) पर जिसने दार को मिंबर बना दिया।

सलाम हो उस आरिफ़ पर जिसने फ़ना में बक़ा तलाश कर ली।

सलाम हो उस मुजाहिदे सदाक़त पर जिसने इस्तिक़ामत का ऐसा दर्स दिया जो सदियों बाद भी ज़िन्दा है।

सलाम हो उस शहीद पर जिसकी कटी हुई ज़बान आज भी अहले ईमान के दिलों में बोल रही है।

और सलाम हो उस सूली पर जो तारीख़ की अज़ीम तरीन दर्सगाह बन गई; क्योंकि वहाँ एक इंसान नहीं लटका था, वहाँ विलायत का एक सूरज तुलूअ हो रहा था।

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