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इमाम-ए-ज़माना के इंतज़ार से ज़ुहूर तक का सफर!

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इमाम-ए-ज़माना के इंतज़ार से ज़ुहूर तक का सफर!

शब्दार्थ की दृष्टि से "इंतज़ार" का अर्थ किसी प्रिय के आने की आशा करना है, लेकिन अहल-ए-बैत के मत में इंतज़ार का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह आशा के साथ ज़िम्मेदारी, प्रेम के साथ आज्ञापालन और दुआ के साथ कर्म का नाम है।

लेखिका: नरगिस ग़ुलाम शब्बीर

 "और हम चाहते हैं कि जो लोग धरती में कमज़ोर बना दिए गए थे, उन पर कृपा करें, उन्हें नेतृत्व प्रदान करें और उन्हें धरती का वारिस बना दें।" (सूर ए क़ेसस, आयत 5)

मानव इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी अत्याचार और असत्य ने मानवता को अपने शिकंजे में लिया, तब अल्लाह ने नबियों और अपने नियुक्त उत्तराधिकारियों के माध्यम से मार्गदर्शन का दीप प्रज्वलित किया। इसी मार्गदर्शन की अंतिम कड़ी हज़रत इमाम महदी हैं, जो यद्यपि ग़ैबत (अदृश्यता) के पर्दे में हैं, फिर भी उनकी विलायत और मार्गदर्शन आज भी ईमान वालों के लिए आशा, धैर्य और ईश्वरीय न्याय का संदेश है। इसलिए इंतज़ार केवल एक धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि एक जीवंत विचार और कर्मप्रधान जीवन-पद्धति है।

शब्दार्थ की दृष्टि से इंतज़ार का अर्थ किसी प्रिय के आने की आशा करना है, लेकिन अहल-ए-बैत के मत में इसका अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह आशा के साथ ज़िम्मेदारी, प्रेम के साथ आज्ञापालन और दुआ के साथ कर्म का नाम है। इमाम जाफ़र सादिक़ ने फ़रमाया है:

"जो व्यक्ति चाहता है कि वह क़ाइम (इमाम महदी) के साथियों में शामिल हो, उसे चाहिए कि वह तक़वा (धर्मपरायणता) और उत्तम आचरण के साथ इंतज़ार करे।"

रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया:

"मेरी उम्मत के सबसे श्रेष्ठ कर्मों में से एक फ़रज (राहत और मुक्ति) का इंतज़ार करना है।"

इस हदीस से स्पष्ट होता है कि सच्चा इंतज़ार मनुष्य को आत्म-सुधार, इबादत, ज्ञान, दूरदर्शिता और मानव सेवा की ओर ले जाता है। विशेष रूप से मदरसों के विद्यार्थी इस इंतज़ार का व्यावहारिक उदाहरण हैं, जो अहल-ए-बैत के ज्ञान को समाज के सुधार और धर्म की सेवा का माध्यम बनाते हैं।

इमाम-ए-ज़माना का ज़ुहूर केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि ईश्वरीय न्याय पर आधारित वैश्विक व्यवस्था की शुरुआत है। इस महान परिवर्तन के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है, जिन्होंने ग़ैबत के दौर में अपने ईमान, चरित्र, ज्ञान और तक़वा को मज़बूत बना लिया हो। इसलिए इंतज़ार से ज़ुहूर तक का सफर वास्तव में आत्म-सुधार, चरित्र निर्माण और ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने का सफर है।

अल्लाह तआला हमें इमाम-ए-अस्र की सही पहचान, सच्चे इंतज़ार और उनके ज़ुहूर की तैयारी करने की तौफ़ीक़ प्रदान करे।

"ऐ अल्लाह! अपने वली के ज़ुहूर में शीघ्रता प्रदान कर और हमें उनके सहायकों तथा समर्थकों में शामिल कर। आमीन।"

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