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इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इंसानियत के अज़ीम इन्क़िलाबी रहनुमा

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इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इंसानियत के अज़ीम इन्क़िलाबी रहनुमा

तारीख़ में बहुत से लोगों ने हालात बदलने की कोशिश की, लेकिन वाक़ए कर्बला और इमाम हुसैन (अ) का नाम वह इकलौती मिसाल है जिसने हर दौर के मज़लूमों और सच्चे लोगों को रास्ता दिखाया है। इमाम हुसैन (अ) की जंग कोई सियासी जंग या कुर्सी की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह ज़ुल्म , नाइंसाफ़ी और इंसान की हुरमत की पामाली के ख़िलाफ़ एक बहुत बड़ा इन्क़िलाब था।

 तारीख़ में बहुत से लोगों ने हालात बदलने की कोशिश की, लेकिन वाक़ए कर्बला और इमाम हुसैन (अ) का नाम वह इकलौती मिसाल है जिसने हर दौर के मज़लूमों और सच्चे लोगों को रास्ता दिखाया है। इमाम हुसैन (अ) की जंग कोई सियासी जंग या कुर्सी की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और इंसान की हुरमत की पामाली के ख़िलाफ़ एक बहुत बड़ा इन्क़िलाब था।

सन 61 हिजरी में इंसानियत, इंसाफ़ और बराबरी को बहुत बड़ा ख़तरा था, उस वक़्त एक ऐसा ज़ालिम निज़ाम मुसल्लत हो चुका था जो लोगों को अपना ग़ुलाम बनाना चाहता था। इस अंधेरे और ख़ौफ़ के माहौल में इमाम हुसैन (अ) ने अपने, अपने ख़ानदान और दोस्तों की क़ुरबानी देकर सच और झूठ तथा ज़ुल्म और इंसाफ़ के दरमियान एक ऐसी लकीर खींच दी जिसे दुनिया की कोई ताक़त नहीं मिटा सकती।

इमाम हुसैन (अ) के पैग़ाम की मुनफ़रिद और लतीफ़ बातें:

अगर हम इमाम हुसैन (अ.) की इस अज़ीम संघर्ष को समझना चाहें तो इसके ये अहम पहलू सामने आते हैं:

ज़ुल्म के आगे झुकने से इनकार:

इमाम हुसैन (अ) का सबसे बड़ा पैग़ाम यह है कि ज़ालिम के सामने कभी सर मत झुकाओ।

आपने साबित किया कि ज़ुल्म सहते हुए ज़िल्लत की ज़िंदगी जीने से बेहतर है कि इज़्ज़त की मौत को गले लगा लिया जाए।

इंसानी इज़्ज़त बचाना:

आपका एक बड़ा मक़सद इंसान की खोई हुई इज़्ज़त वापस दिलाना था। जब मुआशरे में लोगों की जान और इज़्ज़त महफ़ूज़ न रहे और हुक्मरान ख़ुद को क़ानून से बालातर समझने लगें तो वहाँ ख़ामोश रहना ज़ुल्म का साथ देने के बराबर है।

नेकी फैलाना और बुराई को रोकना:

इमाम हुसैन (अ) का मक़सद सिर्फ़ नमाज़-रोज़ा तक महदूद  नहीं था, बल्कि आप का मक़सद मुआशरे में इंसाफ़ क़ायम करना, लोगों को उनके हक़ दिलाना और ज़ुल्म के निज़ाम को जड़ से उखाड़ फेंकना था।

दुनिया भर के मुफ़क्किरों की नज़र में:

इमाम हुसैन (अ) का पैग़ाम किसी एक मज़हब , फ़िरक़े या इलाक़े के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है। यही वजह है कि दुनिया के बड़े-बड़े मुफ़क्किरों ने आपसे बहुत कुछ सीखा है।

महात्मा गांधी कहते हैं: मैंने हुसैन (अ) से सीखा है कि मज़लूम होकर भी कैसे जीता जाता है।

चार्ल्स डिकेंस और दूसरे मग़रिबी  मुफ़क्किरों ने भी माना कि इमाम हुसैन (अ) की जंग सिर्फ़ उसूलों, सच्चाई और इंसानियत को बचाने के लिए थी।

मशहूर ईसाई लेखक एंटोन बारा लिखता है:

अगर हुसैन (अ) हमारे होते तो हम दुनिया के हर गाँव और हर शहर में उनके नाम का परचम लहराते।

आज के दौर में कर्बला का पैग़ाम:

आज की दुनिया में भी जहाँ ताक़तवर लोग ग़रीबों पर ज़ुल्म करते हैं और नाइंसाफ़ी आम है, वहाँ इमाम हुसैन (अ) की क़ुरबानी हमें राहे हयात दिखाती है। यह हमें सिखाती है कि अगर आप सच्चाई के रास्ते पर हैं तो चाहे आप अकेले ही क्यों न हों, आपके पास दौलत और ताक़त न भी हो, फिर भी कभी ज़ुल्म के साथ समझौता न करें।

हरफ़े आख़िर:

इमाम हुसैन (अ) की क़ुरबानी एक ऐसा चश्मा है जिससे हर दौर का सच्चा और दर्द-ए-दिल रखने वाला इंसान रौशनी लेता रहेगा और सिराब होता रहेगा। आपने दुनिया को यह सुनहरा उसूल दिया कि ज़ालिम की तलवार पर हमेशा मज़लूम के ख़ून को फ़तह मिलती है। इमाम हुसैन (अ) सच्चे मायनों में इंसानियत के वह अज़ीम रहनुमा हैं जिनका नाम और करदार क़यामत तक चमकता रहेगा।

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