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जनाब ज़ैनब कुबरा (स): सब्र, दृढ़ता और आंदोलन की प्रतीक

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जनाब ज़ैनब कुबरा (स): सब्र, दृढ़ता और आंदोलन की प्रतीक

जब हम जनाब ज़ैनब कुबरा (स) के जीवन का अध्ययन करते हैं तो हमारे मन में एक प्रश्न आता है कि उन्हें इतना महान स्थान क्यों प्राप्त हुआ?

लेखिका: हाफ़िज़ा ततहीर फ़ातिमा

 जब हम जनाब ज़ैनब कुबरा (स) के जीवन का अध्ययन करते हैं तो हमारे मन में एक प्रश्न आता है कि उन्हें इतना महान स्थान क्यों प्राप्त हुआ?

क्या उनकी महानता इसलिए है कि वे हज़रत ज़हरा (स) और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इब्न अबी तालिब (अ) की बेटी थीं? या इसलिए कि वे इमाम हसन (अ) और इमाम हुसैन (अ) की बहन थीं?

वास्तव में ऐसा नहीं है। उनकी महानता का कारण यह है कि उन्होंने अपने समय के इमाम का साथ दिया, उनका समर्थन किया और हर कठिन परिस्थिति में उनके साथ खड़ी रहीं।

वह ऐसा समय था जब बड़े-बड़े लोग भी सत्य का साथ देने का साहस नहीं कर सके। हज़रत इब्न अब्बास, हज़रत अब्दुल्लाह इब्न जाफ़र और इब्न ज़ुबैर जैसे लोग जहाँ मौन हो गए थे, वहाँ जनाब ज़ैनब (स) ने सत्य का दामन नहीं छोड़ा। ऐसे समय में, जब मदीना के अनेक बड़े लोग यह निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि इमाम हुसैन (अ) के साथ कर्बला जाएँ या नहीं, उन्होंने अपने समय के इमाम का साथ दिया और उनके साथ कर्बला गईं।

जब कोई उनकी महान हस्ती पर विचार करता है तो ऐसा लगता है मानो वे एक महिला के रूप में अमीरुल मोमिनीन की पुत्री होते हुए दूसरी हुसैन इब्न अली (अ) थीं।

यदि हम उनके जीवन को देखें तो उसमें तीन प्रमुख पहलू दिखाई देते हैं।

पहला पहलू: जनाब ज़ैनब कुबरा (स) का आंदोलन

जनाब ज़ैनब (स) का आंदोलन ऐसा आंदोलन था जिसमें उन्होंने अत्यंत गहरे दुख और कठिनाइयों का सामना किया। उन्होंने अपनी आँखों के सामने अपने भाई को शहीद होते देखा, अपने भतीजों और अपने बेटों को शहीद होते देखा। इसके बाद वे स्वयं बंदी बनीं और घायल लोगों तथा अनाथ बच्चों से भरे काफिले की ज़िम्मेदारी संभालते हुए शाम (सीरिया) की ओर रवाना हुईं।

लेकिन इन सभी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने आंदोलन को नहीं छोड़ा। वे सत्य के मार्ग से एक कदम भी पीछे नहीं हटीं। उन पर अनेक अत्याचार किए गए, लेकिन उन्होंने धैर्य और दृढ़ता का साथ नहीं छोड़ा और अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़ी रहीं।

आज भी जब कोई बहन या बेटी अत्याचार का शिकार होती है तो वह जनाब ज़ैनब (स.) को याद करती है, क्योंकि उन्होंने हमें साहस, शक्ति और यह शिक्षा दी कि पर्दे में रहते हुए भी एक महान परिवर्तन लाया जा सकता है।

दूसरा पहलू: कर्बला में उनकी भूमिका

उन्होंने उस टूटे हुए और बिखरे हुए काफिले को संभाला जिसे संभालना देखने में असंभव लगता था।

कहा जाता है कि कर्बला में खून ने तलवार पर विजय प्राप्त की। देखने में तो यज़ीद सफल दिखाई देता था, लेकिन इमाम हुसैन (अ) की शहादत ने पूरे वातावरण को बदल दिया।

बाद में जब हम तव्वाबीन आंदोलन, मुख़्तार सक़फ़ी के आंदोलन और ज़ैद बिन अली (अ) के विद्रोह को देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि कर्बला में वास्तविक विजय तलवार की नहीं बल्कि खून की हुई थी।

और इस विजय को सुरक्षित रखने का सबसे बड़ा श्रेय जनाब ज़ैनब कुबरा (स) को जाता है। यदि वे न होतीं, तो कर्बला का यह बलिदान शायद कर्बला की धरती तक ही सीमित रह जाता। यदि आज दुनिया को पता है कि कर्बला में क्या हुआ था, तो उसमें जनाब ज़ैनब (स) और इमाम सज्जाद (अ) के महान प्रयासों की मुख्य भूमिका है।

उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि एक महिला इतिहास के केवल किनारे पर रहने वाली नहीं होती, बल्कि इतिहास की दिशा बदलने वाली प्रभावशाली हस्ती भी बन सकती है।

तीसरा पहलू: जनाब ज़ैनब (स) के भाषण

उनके जीवन का तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू वे ऐतिहासिक भाषण हैं जो उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में दिए। कभी कूफ़ा में और कभी यज़ीद के दरबार में, उन्होंने सत्य का ऐसा ध्वज बुलंद किया जो हमेशा के लिए इतिहास का हिस्सा बन गया।

उनके भाषणों से उनके ऊँचे चरित्र, असाधारण साहस और अद्भुत दूरदर्शिता का पता चलता है। उन्होंने हर प्रकार की यातनाएँ झेलीं, उन पर अत्याचार किए गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यज़ीद के दरबार में पूरे साहस के साथ कहा:

"मा रअयतो इल्ला जमीला"

"मैंने कर्बला में सुंदरता के सिवा कुछ नहीं देखा।"

इसी प्रकार उन्होंने यज़ीद से कहा:

"फ़वल्लाहि ला तम्हू ज़िक्रना"

"खुदा की कसम! तुम हमारे उल्लेख को कभी मिटा नहीं सकते।"

मानो उन्होंने उसी समय घोषणा कर दी थी कि अहल-ए-बैत का नाम कभी समाप्त नहीं होगा, और आज इतिहास इस सत्य की गवाही दे रहा है।

अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में फरमाया है:

"फ़ज़्कोरूनी अज़्कोरोकुम"

"तुम मेरा स्मरण करो, मैं तुम्हारा स्मरण करूँगा।"

इमाम हुसैन (अ) कर्बला में अल्लाह के धर्म और उसके स्मरण को जीवित रखने के लिए आए थे, और क्योंकि यह अल्लाह का वादा था, इसलिए यह वादा अवश्य पूरा होना था।

जब हम जनाब ज़ैनब (स) के भाषणों का अध्ययन करते हैं तो हमें पता चलता है कि उन्होंने अपने ईश्वरीय दायित्व को पूरी तरह निभाया। उनके पास न कोई मंच था और न ही श्रोताओं का समर्थन, बल्कि वे दुश्मनों के बीच खड़ी होकर सत्य की आवाज़ बुलंद कर रही थीं।

उन्होंने कूफ़ा के लोगों की बेवफाई को उजागर किया, सत्य और असत्य के बीच स्पष्ट अंतर बताया और उन लोगों को उनकी ज़िम्मेदारियों का एहसास कराया जो अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सके।

जनाब ज़ैनब (स) का जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि एक महिला भी इतिहास की दिशा बदल सकती है, दुश्मन की दिखाई देने वाली जीत को वास्तविक हार में बदल सकती है, और अपने ईमान, धैर्य, दृढ़ता तथा दूरदर्शिता के बल पर पूरे समाज और व्यवस्था को झकझोर सकती है। महिला कमजोर नहीं होती; यदि वह अपने उद्देश्य पर अटल रहे, तो उसका एक भाषण, एक संबोधन और एक दृढ़ रुख भी इतिहास बदल सकता है।

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