हर क़त्ल के लिए तलवार ही सबब नहीं बनती, बल्कि बाज़ औकात हक़गोई भी कत्ल का सबब बन जाती है। बाज़ मक़्तूलों को नेज़े नहीं छेदते, बल्कि सच्चाई के दुश्मन उन्हें लहूलुहान कर देते हैं। और बाज़ खून ज़मीन पर नहीं गिरते, बल्कि तारीख़ के माथे पर ऐसी सुर्ख़ तहरीर बन जाते हैं जिन्हें ज़माना कभी मिटा नहीं सकता।
,हर क़त्ल के लिए तलवार ही सबब नहीं बनती, बल्कि बाज़ औकात हक़गोई भी कत्ल का सबब बन जाती है। बाज़ मक़्तूलों को नेज़े नहीं छेदते, बल्कि सच्चाई के दुश्मन उन्हें लहूलुहान कर देते हैं। और बाज़ खून ज़मीन पर नहीं गिरते, बल्कि तारीख़ के माथे पर ऐसी सुर्ख़ तहरीर बन जाते हैं जिन्हें ज़माना कभी मिटा नहीं सकता।
इमाम अबू अब्दुर्रहमान अहमद बिन अली नसाई का खून भी ऐसी ही एक रौशन तहरीर है।
वो न कूफ़ा के बाशिंदे थे, न नजफ़ के; न खुद को शिया कहते थे और न किसी सियासी जमाअत के अलमबरदार थे। वो एक अमानतदार मुहद्दिस, दियानत-शिआर मुहक्किक़ और आशिक़ ए रसूल-ए-अकरम स०अ० थे, जिन्होंने ये अहद कर रखा था कि ज़बान-ए-नुबूवत से निकलने वाले नूरानी मोतियों को उसी अमानत व दियानत के साथ महफूज़ रखेंगे, जिस तरह उन्हें सुना है।
मगर जब उस नूर का नाम "अली" (अ०स०) आया तो तारीख़ ने उनके इम्तेहान का आग़ाज़ कर दिया।
वो जानते थे कि ज़माने बदल सकते हैं, हुकूमतें तब्दील हो सकती हैं, सल्तनतें मिट सकती हैं, मगर हदीस-ए-रसूल-ए-ख़ुदा स०अ० नहीं बदल सकती, और न ही फज़ाइल-ए-अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम को कोई मिटा सकता है।
जब वो दमिश्क़ (शाम) पहुंचे तो वहां बनी उमय्या के प्रोपेगंडे के असरात अपनी आंखों से देखे। उन्होंने ऐसे माहौल का मुशाहिदा किया जहां मिम्बरों से अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की शान में गुस्ताखी की जाती थी और लोगों के दिलों में अहल-ए-बैतؑ (अ०स०) की मुहब्बत को कमज़ोर करने की कोशिश की जाती थी। ऐसे नाज़ुक वक़्त में उन्होंने क़लम उठाया और "ख़साइस-ए-अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम" जैसी लाज़वाल तस्नीफ उम्मत के सुपुर्द कर दी।
ये सिर्फ एक किताब न थी, बल्कि एक ज़िंदा ज़मीर की गवाही थी; ये सिर्फ अहादीस का मजमूआ न था, बल्कि इश्क़-ए-मुहम्मद स०अ० की अमली तफसीर थी। जो दिल रसूल-ए-अकरम स०अ० की मुहब्बत से सरशार हो, वो मौला अली (अ०स०) के फज़ाइल को कैसे छुपा सकता है?
किताब की तस्नीफ के बाद इमाम नसाई ने इसमें ज़िक्र की गई अहादीस लोगों के सामने बयान कीं और फज़ाइल-ए-अमीरुल मोमिनीन अ०स० को आम किया, ताकि बरसों से फैलाए गए तअस्सुबात का एज़ाला हो सके। इसी दौरान उन पर दबाव डाला गया कि वो अमीरुल मोमिनीन अ०स० के फज़ाइल बयान करने के बजाए ऐसे लोगों के फज़ाइल बयान करें जिनका राह-ए-फ़ज़ीलत व अज़मत में कोई वजूद न था।
लेकिन इमाम नसाई ने अपने कलम को मसलेहत का ग़ुलाम बनाने से इनकार कर दिया। उन्होंने इल्मी दियानत को अपनी जान की सलामती पर तरजीह दी और हक़ को छुपाने के बजाए उस पर अपने खून की मुहर साबित कर दी।
फिर उन पर तशद्दुद किया गया, उन्हें लातों और घूसों से मारा गया, ज़ुल्म व तअस्सुब के वार किए गए, मगर उनके दिल में रौशन चराग़-ए-मुहब्बत को कोई बुझा न सका।
कितना अजीब मंज़र है! जिस्म ज़ख्मी हो सकता है, मगर मुहब्बत का इक़रार ज़ख्मी नहीं होता; हड्डियां टूट सकती हैं, मगर मुहब्बत-ए-अली अ०स० नहीं टूटती; खून बह सकता है, मगर फज़ाइल-ए-अली अ०स० की रौशनी कभी मद्धम नहीं पड़ती।
यही मुहब्बत का राज़ है। मुहब्बत सिर्फ एक अक़ीदा नहीं, बल्कि नूर है, और नूर की फितरत ये है कि न उसे क़ैद किया जा सकता है, न दबाया जा सकता है और न बुझाया जा सकता है।
आज सवाल इमाम नसाई से नहीं, हमसे है।
अगर एक ऐसे अज़ीम मुहद्दिस, जो अहल-ए-सुन्नत के इमाम थे और जिनकी सुनन-ए-नसाई सिहाह-ए-सित्ता में शामिल है, अमीरुल मोमिनीन अ०स० के फज़ाइल की हिफाज़त के लिए ज़ुल्म सह सकते हैं, तो हम, जो खुद को शिया-ए-अली अ०स० कहते हैं, क्या सिर्फ इंतिसाब पर इक्तिफ़ा कर सकते हैं?
हरगिज़ नहीं।
तशय्युअ सिर्फ मुहब्बत का दावा नहीं, बल्कि मुहब्बत की अमानत है।
विलायत सिर्फ ज़बान का इक़रार नहीं, बल्कि रूह की मेराज है।
अली अ०स० से मुहब्बत सिर्फ ज़बानी दावा नहीं, बल्कि अपने नफ़्स को अद्ल-ए-अली अ०स०, तक़वा-ए-अली अ०स०, इबादत-ए-अली अ०स०, हिल्म-ए-अली अ०स० और शुजाअत-ए-अली अ०स० के सांचे में ढाल देने का नाम है।
अगर हमारे दिलों में अली अ०स० बसते हैं तो हमारे हाथ ज़ुल्म के आला-ए-कार नहीं बन सकते।
अगर हमारी ज़बान पर अली अ०स० का नाम है तो उस ज़बान से झूठ, ग़ीबत, बोहतान, नफ़रत और तफ़र्क़ा नहीं निकलना चाहिए।
अगर हमारे सज्दों में मुहब्बत-ए-अली अ०स० की हरारत है तो हमारी तिजारत, हमारी सियासत, हमारी अदालत, हमारी मुआशरत, बल्कि हमारी पूरी ज़िंदगी भी अली अ०स० के मीजान-ए-अद्ल पर इस्तवार होनी चाहिए।
इमाम नसाई ने अपने खून से गोया ये पैग़ाम रक़म कर दिया कि: "इश्क़ का चराग़ दलील से रौशन होता है, मवद्दत से फ़रोज़ां रहता है, और कुर्बानी उसे अबदी हयात अता करती है।"
आइए! हम भी अपने दिलों को "ख़साइस-ए-अली अ०स०" का आईना बना दें; ऐसी ज़िंदा किताब, जिसका हर वरक़ अख़्लाक़-ए-अली अ०स० हो, हर सतर अद्ल-ए-अली अ०स० हो, हर हर्फ़ तक़वा हो, हर बाब मअरिफ़त हो, हर सफ़हा खिदमत-ए-ख़ल्क़ से मुज़य्यन हो, और जिसकी हर सतर मुहब्बत-ए-अहल-ए-बैत-ए-अतहार अ०स० की खुशबू से मअत्तर हो।
तभी हम विलायत का हक़ अदा कर सकेंगे, क्योंकि विलायत का सबसे बड़ा सुबूत ज़बान नहीं, किरदार है; दावा नहीं, वफ़ादारी है; और निस्बत नहीं, सीरत है।
जिस दिन हमारी ज़िंदगियां सीरत-ए-अमीरुल मोमिनीन अ०स० का आईना बन जाएंगी, उसी दिन दुनिया जान लेगी कि इमाम नसाई ने जिस अली अ०स० के फज़ाइल की खातिर ज़ुल्म बर्दाश्त किया था, वो अली अ०स० आज भी अपने मानने वालों के अद्ल, इबादत, इल्म, हिल्म, खिदमत-ए-ख़ल्क़ और खुदा-शनासी में ज़िंदा हैं।
सलाम हो उन नाशिराने-फ़ज़ाइल-ए-अमीरुल मोमिनीन अ०स० पर, जिन्होंने अपने क़लम से विलायत की गवाही लिखी, अपने खून से उस गवाही पर मुहर-ए-सिदाक़त सब्त की, और रहती दुनिया तक ये पैग़ाम दे गए कि सच्चा मुहिब्ब अपनी जान तो कुर्बान कर सकता है, मगर अमानत-ए-रसूल-ए-ख़ुदा स०अ० में कभी खियानत नहीं कर सकता।