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शहादत-ए-इमाम हसन अस्करीؑ — सब्र, हिदायत और इस्तेक़ामत का रोशन बाब

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शहादत-ए-इमाम हसन अस्करीؑ — सब्र, हिदायत और इस्तेक़ामत का रोशन बाब

हज़रत इमाम हसन अस्करीؑ, शिया-ए-अहले-बैतؑ के ग्यारहवें इमाम, शुक्रवार 8 रबीउल-अव्वल सन 232 हिजरी क़मरी को मदीना-ए-मुनव्वरा में पैदा हुए। आपकी मुद्दत-ए-इमामत छह साल थी, जो सन 254 हिजरी क़मरी में शुरू हुई और सन 260 हिजरी क़मरी में आपकी शहादत के साथ समाप्त हुई।

आपؑ की ज़िंदगी एक ऐसे पुरफ़ित्न और पुरआशोब दौर में गुज़री, जब अब्बासी हुकूमत अहले-बैतؑ और उनके पैरोकारों पर सख़्त दबाव डाल रही थी। ख़ास तौर पर दौराने-इमामत आपको लगातार सरकारी निगरानी, पाबंदी, नज़रबंदी और क़ैद व बंद जैसे हालात का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद इमाम हसन अस्करीؑ ने अपनी मुख़्तसर मगर बाबरकत ज़िंदगी शियों की हिदायत, तालीम व तरबियत, मआरिफ़-ए-दीन की इशाअत और शरई उसूलों की हिफ़ाज़त के लिए वक़्फ़ कर दी। आपकी हयाते-मुबारका इल्म, अख़लाक़, सब्र, तक़वा और ज़ुल्म के मुक़ाबले इस्तेक़ामत का रोशन नमूना थी।

आपؑ ने सख़्त-तरीन सियासी दबाव के बावजूद कभी राहे-हक़ से क़दम पीछे नहीं हटाया। आपकी तालीमात और इल्मी व अख़लाक़ी विरासत ने उम्मत के लिए ऐसा क़ीमती सरमाया छोड़ा, जो आने वाली नस्लों के लिए चराग़-ए-राह बन गया। आपकी ज़िंदगी हमें यह सबक़ देती है कि हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों, हक़, दीन और उसूलों पर साबित-क़दम रहना ही अहले-ईमान की असली ज़िम्मेदारी है।

आख़िरकार 8 रबीउल-अव्वल सन 260 हिजरी क़मरी को सामर्रा में आपको ज़हर देकर शहीद कर दिया गया। आपकी शहादत ने शिया-ए-अहले-बैतؑ के दिलों को ग़म व अंदोह से भर दिया। यह साँचा-ए-ग़म तारीख़-ए-तशय्यो का एक अहम मोड़ साबित हुआ, क्योंकि इमाम हसन अस्करीؑ की शहादत के बाद आपके फ़र्ज़ंद-ए-गिरामी हज़रत वली-ए-अस्र इमाम महदीؑ (अज्जलल्लाहु फ़रजहु) की इमामत का आग़ाज़ हुआ और दौराने-ग़ैबत का एक नया बाब खुला।

8 रबीउल-अव्वल अगरचे ज़ाहिरी तौर पर अय्याम-ए-अज़ा के इख़्तिताम का दिन है, लेकिन पैग़ाम-ए-अज़ा का इख़्तिताम नहीं होता। मुहर्रम से रबीउल-अव्वल तक जारी रहने वाले ये अय्याम हमें सिर्फ़ सोग मनाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी इस्लाह, रुश्द, मारिफ़त, बेदारी और अमली तब्दीली के लिए दिए जाते हैं। अज़ादारी का असली फल यही है कि हम अहले-बैतؑ की सीरत और उनकी क़ुर्बानियों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ।

इसलिए 8 रबीउल-अव्वल के साथ अगरचे एक दौर-ए-अज़ादारी ख़त्म होता है, लेकिन पैग़ाम-ए-अज़ा का सफ़र हमेशा जारी रहना चाहिए और जारी रहेगा। ज़रूरत सिर्फ़ इस बात की है कि हम इन अय्याम को अपनी रुश्द व हिदायत का मशअल-ए-राह बनाएँ; वरना ये अय्याम भी आएँगे, हम मजलिसें करेंगे, मातम करेंगे, आँसू बहाएँगे और फिर वक़्त के साथ सब कुछ भूलकर अगले साल का इंतज़ार करने लगेंगे।

अज़ा का मक़सद सिर्फ़ अय्याम गुज़ारना नहीं, बल्कि ख़ुद को बदलना है;
सिर्फ़ आँखों को अश्कबार करना नहीं, बल्कि दिल को बेदार करना है;
सिर्फ़ मसाइब सुनना नहीं, बल्कि अहले-बैतؑ के पैग़ाम को अपनी ज़िंदगी में उतारना है।

अगर हमारी अज़ादारी हमारे किरदार, अख़लाक़, फ़िक्र, मुआशरत और दींदारी में कोई तब्दीली पैदा नहीं करती, तो हमें रुककर सोचना चाहिए कि हमने इन अय्याम से क्या हासिल किया?

पस आइए! इमाम हसन अस्करीؑ की शहादत के इस पुरसोज़ मौक़े पर अहद करें कि अय्याम-ए-अज़ा ख़त्म हो सकते हैं, लेकिन अज़ा का पैग़ाम, कर्बला की रूह, अहले-बैतؑ की तालीमात और हक़ व अद्ल की जद्दोजहद हमारी ज़िंदगी में हमेशा जारी रहेगी।

शहादत-ए-इमाम हसन अस्करीؑ की मुनासिबत से हज़रत वली-ए-अस्र इमाम महदीؑ (अज्‍जल्लाहु फ़रजहु), तमाम शिया-ए-अहले-बैतؑ और मुहिब्बान-ए-आल-ए-मुहम्मदؐ की ख़िदमत में दिली ताज़ियत व तस्लीम पेश करते हैं।

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