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बारह इमामों की माँ! जिसने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया ताकि तौहीदी तहज़ीब और तमद्दुन जन्म ले सके।

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बारह इमामों की माँ! जिसने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया ताकि तौहीदी तहज़ीब और तमद्दुन जन्म ले सके।

तारीख़-ए-इस्लाम के मुतालअ में हज़रत ख़दीजा कुबरा सलामुल्लाह अलैहा का नाम उस सितारे की मानिंद है जिसकी रौशनी गहरी मारिफ़त-ए-इलाही से फूटती है। आप वह पहली शख़्सियत हैं जिन्होंने यह समझा कि रिसालत दरअसल एक तमद्दुनी मनसूबा है जिसका मक़सद इंसान को तौहीद की बुनियाद पर अज़-सर-ए-नौ तामीर करना है।

मक्का के दौर-ए-जाहिलियत में दौलत और सामाजी मरतबा ही इज़्ज़त और करामत का मायार समझे जाते थे लेकिन हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा ने इस मायार को तोड़ दिया और दौलत पर मबनी मरदाना माशिरती साख़्त के मुक़ाबले में औरत की रूहानी क़ुव्वत को मैदान में उतारा। आपने जुरअत के साथ यह साबित किया कि मेरी दौलत, मेरी ताक़त और मेरी इज़्ज़त ईमान की खिदमत के लिए होनी चाहिए।

यह वह मुकाम था जहाँ फतह हासिल होने से पहले ही “इन्फ़ाक़” ने हक़ीकी मानवियत इख़्तियार की। रहबर-ए-इन्क़िलाब-ए-इस्लामी फरमाते हैं:

“अगर हज़रत ख़दीजा कुबरा सलामुल्लाह अलैहा की फ़िदाकारियाँ न होतीं तो शायद यह अज़ीम और पुर-ख़तर नबवी तहरीक अपने आग़ाज़ में इस क़दर इस्तिक़ामत हासिल न कर पाती। उन्होंने अपना सरमाया ख़र्च किया, अपनी इज़्ज़त लगाई और अपनी जान भी क़ुर्बान कर दी क्योंकि वह बाईमान थीं।”

मक्का के महदूद और पुर-ख़तर माहौल में यह तर्ज़-ए-अमल एक इन्क़िलाबी क़दम था; एक ऐसी ख़ातून का किरदार जिसने फतह से पहले और इंतिहाई दुश्वार हालात में अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया ताकि तौहीदी तहज़ीब और तमद्दुन जन्म ले सके। क़ुरान-ए-करीम उन लोगों के दरमियान जो फतह से पहले इन्फ़ाक़ करते और जिहाद करते हैं और उन लोगों के दरमियान जो फतह के बाद ऐसा करते हैं, फ़र्क़ बयान करता है क्योंकि ताक़त हासिल होने से पहले ईमान, सिदक़त का मायार है।

सूरा-ए-हदीद की आयत 10 में इरशाद होता है: ला यस्तवी मिन्कुम मन अन्फ़का मिन क़ब्लिल फत्हि व क़ातल। और इस इम्तियाज़ की अव्वलीन मिसालों में हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा शामिल हैं।

मौजूदा मीडिया दौर और मारिफ़ती जंग में भी हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का पैग़ाम ज़िंदा है: “ईमान को हिकमत और बसीरत पर मबनी होना चाहिए, मुहब्बत को दुरुस्त सिम्त हासिल होनी चाहिए और औरत को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का सुतून बनकर रहना चाहिए।”

हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा ने हमें सिखाया कि दुनिया की अज़ीम हस्तियाँ ख़ामोशी और फ़िदाकारी के ज़रिए दुनिया को बदल देती हैं।

हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा वह ख़ातून थीं जो जाहिलियत के मुक़ाबिल ईमान की मुस्कान के साथ खड़ी हुईं और फ़रमाया: “हक़ की एक क़ीमत होती है और उसे अदा करने वाली मैं हूँ!”

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