रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे बहुत से समूह हैं जो छोटी-छोटी बातों के मतभेद के कारण एक-दूसरे से अलग हो गए और ऐसे बहुत से दिल हैं जो एक अधूरी बहस के कारण वर्षों तक एक-दूसरे से नाराज़ रहे। “बहस को खींचते रहना” इतनी बड़ी बुराई है कि अल्लाह के नेक बंदों ने बार-बार इसके बारे में चेतावनी दी है। बहस का नुकसान केवल इस दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि आख़िरत में भी हम इस मामले में अपनी लापरवाही पर पछताएँगे। आयतुल्लाह हाएरी शीराज़ी ने सरल और प्रभावशाली अंदाज़ में हमें अपने इस व्यवहार पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है। आगे उनके विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
इंसान अपनी लापरवाहियों पर पछताएगा, इस बात पर कि उसने पक्का फैसला नहीं किया, उसके अवसर हाथ से निकल गए, उसने छोटी-छोटी बातों में सख्ती की, मामूली मतभेदों पर अपना समय बर्बाद किया और यहाँ तक कि बहस और झगड़ा भी किया।
बहस को खींचते रहना अपने आप में एक बुराई है और इससे थकान तथा परेशानी पैदा होती है। एक-दूसरे को परेशान करने और बार-बार उलझने से दिल में दुश्मनी और द्वेष पैदा होता है। उदाहरण के लिए, आप सामने वाले की कोई बात पकड़ लेते हैं और उसी बात को लेकर उसे नीचा दिखाते हैं। इससे सामने वाला दुखी हो जाता है। या उसने जो बात कही है, उसका गलत अर्थ निकालते हैं ताकि उसमें कोई कमी निकालकर उसे गलत साबित कर सकें। ये सभी बहस और झगड़े की बुराइयाँ और उसके नकारात्मक प्रभाव हैं।
बहस को किस तरह समाप्त किया जाए ताकि इंसान बहस करने वाला न बने? ठीक उसी जगह, जहाँ आपका दिल कहता है कि बहस को आगे बढ़ाएँ, वहीं उसे समाप्त कर दें। जिस समय आपको लग रहा हो कि आप जीत रहे हैं, उसी समय आगे बहस न करें। कुछ लोग बहस को तब तक आगे बढ़ाना चाहते हैं, जब तक उन्हें पूरी तरह जीत न मिल जाए और उसके बाद ही वे बहस छोड़ते हैं। वे समझते हैं कि जब वे गलत हों, तभी बहस बंद करनी चाहिए, लेकिन अगर सही बात उनके पक्ष में हो तो बहस समाप्त नहीं करनी चाहिए। ऐसा नहीं है। “बहस छोड़ दो, चाहे तुम सही ही क्यों न हो।” यानी बहस और वाद-विवाद को समाप्त कर दो, भले ही सही बात तुम्हारे पक्ष में हो।
बातचीत को किसी न किसी जगह रोककर समाप्त कर देना चाहिए। यदि आप बातचीत के दौरान किसी जगह बात को रोकते नहीं हैं और बहस या चर्चा का कोई अंतिम बिंदु तय नहीं करते, तो बहुत आसानी से एक साधारण बातचीत या विचारों का छोटा-सा मतभेद किसी पूरे समूह के बिखरने का कारण बन सकता है।
देखिए! असहाबे कहफ, जिन्हें अल्लाह की रोशनी और आध्यात्मिक कृपा प्राप्त थी, जब 309 वर्षों तक गुफा में रहे और अल्लाह ने उन्हें जगाया, तो उनके बीच सबसे पहली बात यह हुई कि “हम यहाँ कितनी देर रहे?” उनमें से एक ने कहा: “हम यहाँ आधे दिन सोए हैं।” दूसरे ने कहा: “नहीं, एक दिन हुआ है।” उनमें से किसी ने कहा: “तुम्हारा पालनहार बेहतर जानता है कि तुम यहाँ कितनी देर रहे हो। जब तुम्हें पता ही नहीं है, तो तुम बहस क्यों कर रहे हो?”
“قَالَ قَائِلٌ مِنْهُمْ کَمْ لَبِثْتُمْ قَالُوا لَبِثْنَا یَوْماً أَوْ بَعْضَ یَوْمٍ قَالُوا رَبُّکُمْ أَعْلَمُ بِمَا لَبِثْتُمْ उनमें से एक कहने वाले ने कहा: तुम यहाँ कितनी देर रहे? उन्होंने कहा: हम एक दिन या दिन के कुछ हिस्से तक रहे। उन्होंने कहा: तुम्हारा पालनहार बेहतर जानता है कि तुम कितनी देर यहाँ रहे।”
अर्थात वे ऐसी बहस को भी, जिसका कोई परिणाम नहीं निकलना है, तुरंत समाप्त कर देते हैं।