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जब जानकारी बढ़ जाए और अक्ल कम पड़ जाए!

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जब जानकारी बढ़ जाए और अक्ल कम पड़ जाए!

आज इंसान के हाथ में दुनिया का इतिहास है, उसकी आँखों के सामने पूरी दुनिया का हाल है और उंगली के एक स्पर्श पर हजारों किताबें, लाखों जानकारियाँ और अनगिनत विचार उसके सामने आ जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने जानकारी तक पहुँच को और भी आसान बना दिया है। लेकिन इस हैरान कर देने वाली तरक्की के बीच एक बुनियादी सवाल अब भी अपनी जगह मौजूद है: क्या जानकारी की इतनी अधिकता ने इंसान को वास्तव में अधिक समझदार भी बना दिया है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जानकारी और अक्ल एक ही चीज़ नहीं हैं। जानकारी इंसान को बहुत कुछ बताती है, लेकिन अक्ल उसे यह समझने की क्षमता देती है कि क्या सही है, क्या गलत है, क्या कहना चाहिए, कहाँ चुप रहना चाहिए और अपने ज्ञान का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए करना चाहिए।

सदियाँ बीत जाने के बावजूद इंसानों के शिक्षक, मानवता के मार्गदर्शक, हुज्जत-ए-रहमान, बोलते हुए कुरआन और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की अक्ल से संबंधित शिक्षाएँ आज भी इंसानी जीवन के लिए गहरी रहनुमाई रखती हैं। खास तौर पर आज के डिजिटल दौर में, जहाँ जानकारी की रफ्तार बेमिसाल है और विचारों का बिखराव भी उसी रफ्तार से बढ़ रहा है, इमाम अलैहिस्सलाम की ये शिक्षाएँ हमें अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को नए सिरे से देखने की दावत देती हैं।

इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं:

“الْعَقْلُ مَا عُبِدَ بِهِ الرَّحْمٰنُ وَاكْتُسِبَ بِهِ الْجِنَانُ अक्ल वह है जिसके द्वारा रहमान ख़ुदा की इबादत की जाए और जिसके द्वारा जन्नत हासिल की जाए।  (तफ़्सीर नूरुस्सक़लैन, भाग 1, पेज 76)

यहाँ अक्ल का मतलब केवल बुद्धिमत्ता या मानसिक क्षमता नहीं है, बल्कि इसे इंसान की हिदायत और मुक्ति से जोड़ा गया है। इसलिए वह बुद्धिमत्ता जो इंसान को घमंड, ज़ुल्म, धोखे और गुनाह की ओर ले जाए, भले ही दुनिया के हिसाब से उसकी प्रशंसा की जाए, लेकिन वह वह अक्ल नहीं है जिसे अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम इंसानी कमाल का साधन बताते हैं।

वास्तविक अक्ल इंसान को अपने पालनहार से जोड़ती है, उसे अपने नफ़्स पर काबू रखना सिखाती है और उसे ख़ुदा की मख़लूक़ के लिए भलाई और कल्याण का साधन बनाती है।

इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं:

“أَكْمَلُ النَّاسِ عَقْلًا أَحْسَنُهُمْ خُلُقًا लोगों में सबसे पूर्ण अक्ल वाला वह है जिसका नैतिक व्यवहार सबसे अच्छा हो।” (अल-काफ़ी, भाग 1, पेज 23)

यह हदीस हमारे वर्तमान समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश रखती है। आज शिक्षा, डिग्री, पद, धन और तकनीक को सफलता का पैमाना माना जाता है, लेकिन इमाम अलैहिस्सलाम अक्ल की पूर्णता को अच्छे नैतिक व्यवहार से जोड़ते हैं।

सोशल मीडिया के दौर में इस शिक्षा की अहमियत और भी बढ़ गई है। एक क्लिक से किसी की प्रशंसा भी की जा सकती है और किसी की इज़्ज़त भी खराब की जा सकती है। एक अपुष्ट खबर कुछ ही पलों में हजारों लोगों तक पहुँच सकती है और एक कठोर वाक्य वर्षों पुराने रिश्ते को नुकसान पहुँचा सकता है।

ऐसे माहौल में अच्छा व्यवहार केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता भी है।

इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं:

“الْجَهْلُ فِي ثَلَاثٍ: الْكِبْرِ، وَشِدَّةِ الْمِرَاءِ، وَالْجَهْلِ بِاللَّهِ जहालत की तीन निशानियाँ हैं: घमंड, बहुत अधिक बहस करना और अल्लाह से अनजान होना।” (बिहार उल अनवार, भाग 1, अक्ल के सैनिकों का अध्याय, पेज 43)

जहालत हमेशा कम जानकारी के रूप में दिखाई नहीं देती। कभी इंसान बहुत कुछ पढ़ने और जानने के बावजूद घमंडी, ज़िद्दी और सही बात को स्वीकार करने से बचने वाला हो सकता है।

आज बहुत सी बहसों में उद्देश्य सच्चाई तक पहुँचना नहीं, बल्कि अपनी राय को सही साबित करना बन गया है। दलील खत्म हो जाती है, लेकिन बहस खत्म नहीं होती। इंसान अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय नए-नए बहाने ढूँढ़ता रहता है।

समझदार इंसान जानता है कि सच्चाई किसी व्यक्ति या समूह की संपत्ति नहीं है। अगर सही बात किसी दूसरे व्यक्ति के माध्यम से सामने आए तो उसे स्वीकार करना हार नहीं, बल्कि अक्ल की परिपक्वता है।

इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं:

“كَمَالُ الْعَقْلِ فِي ثَلَاثٍ: التَّوَاضُعُ لِلَّهِ، وَحُسْنُ الْيَقِينِ، وَالصَّمْتُ إِلَّا مِنْ خَيْرٍ अक्ल की पूर्णता तीन चीज़ों में है: अल्लाह के सामने विनम्रता, अच्छा विश्वास और भलाई के अलावा चुप रहना।” (इमाम जाफ़र सादिक़ (अ), अल्लामा शैख़ मुहम्मद हुसैन मुज़फ़्फ़र, भाग 1, पेज 75)

हम ऐसे दौर में रह रहे हैं जहाँ हर व्यक्ति को अपनी राय पूरी दुनिया तक पहुँचाने का अवसर प्राप्त है, लेकिन हर अवसर पर बोलना समझदारी नहीं है। हर खबर को आगे बढ़ाना ज़रूरी नहीं है। हर मतभेद का जवाब देना ज़रूरी नहीं है। हर भड़काऊ पोस्ट पर टिप्पणी करना ज़रूरी नहीं है। और हर बहस में अपनी श्रेष्ठता साबित करना भी ज़रूरी नहीं है। बोलने की आज़ादी के साथ बोलने की ज़िम्मेदारी भी ज़रूरी है।

इमाम सादिक़ (अ) से यह कथन भी बयान हुआ है:

“أَفْضَلُ طَبَائِعِ الْعَقْلِ الْعِبَادَةُ، وَأَوْثَقُ الْحَدِيثِ لَهُ الْعِلْمُ، وَأَجْزَلُ حُظُوظِهِ الْحِكْمَةُ अक्ल की सबसे अच्छी विशेषता इबादत है, उसका सबसे मजबूत सहारा ज्ञान है और उसके बड़े हिस्सों में से एक हिकमत है।” (अल-इख़्तिसास, पेज 244)

इस कथन में अक्ल, ज्ञान और हिकमत के बीच एक सुंदर संबंध दिखाई देता है। ज्ञान इंसान को जानकारी देता है, जबकि हिकमत उसे उस जानकारी का सही और उचित तरीके से इस्तेमाल करने की समझ देती है।

आज इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल साधनों ने ज्ञान तक पहुँच को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। लेकिन इसके साथ ही झूठी खबरें, नकली तस्वीरें, गुमराह करने वाली जानकारियाँ और अधूरे विश्लेषण भी तेजी से फैल रहे हैं।

ऐसे माहौल में केवल जानकारी हासिल करना पर्याप्त नहीं है; जाँच-पड़ताल, आलोचनात्मक सोच, समझ और हिकमत भी ज़रूरी है।

इमाम सादिक़ (अ) से यह रिवायत भी बयान हुई है:

“كَثْرَةُ النَّظَرِ فِي الْعِلْمِ يَفْتَحُ الْعَقْلَ ज्ञान में अधिक विचार करना अक्ल को खोल देता है।” (अद-दअवात, पेज 221/603)

आज छोटी वीडियो, तुरंत की जाने वाली टिप्पणियों और कुछ पंक्तियों वाली पोस्ट ने गहरे अध्ययन की जगह लेना शुरू कर दिया है। केवल शीर्षक पढ़कर पूरी खबर समझ लेना या कुछ सेकंड की वीडियो देखकर किसी जटिल विषय पर अंतिम राय बना लेना एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति है।

ऐसे माहौल में इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की यह शिक्षा हमें अध्ययन, जाँच-पड़ताल और विचार करने की ओर ध्यान दिलाती है।

समझदार इंसान हर बात को तुरंत स्वीकार नहीं करता। वह स्रोत देखता है, संदर्भ को समझता है, अलग-अलग पहलुओं पर विचार करता है और फिर अपनी राय बनाता है।

खास तौर पर धार्मिक और सामाजिक मामलों में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि किसी अपुष्ट या गलत बात को फैलाना कभी बड़े वैचारिक और सामाजिक नुकसान का कारण बन सकता है।

इमाम सादिक़ (अ) से यह रिवायत भी बयान हुई है:

“وَالْعَالِمُ بِزَمَانِهِ لَا تَهْجُمُ عَلَيْهِ اللَّوَابِسُ जो व्यक्ति अपने समय को पहचानता है, उलझनें और संदेह अचानक उसे घेर नहीं लेते।” (तोहफ़ुल उक़ूल अन आलिर्रसूल (अ), भाग 1, पेज 356; अल-काफ़ी, भाग 1, पेज 27)

यह सिद्धांत आज के धार्मिक समाज के लिए विशेष महत्व रखता है। धर्म से जुड़ाव का मतलब अपने समय से अनजान होना नहीं है। एक मोमिन को अपने दौर की वैचारिक, वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों से परिचित होना चाहिए।

आज युवा पीढ़ी को नास्तिकता, धार्मिक संदेह, भौतिकवाद, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक बदलाव, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया की विभिन्न चुनौतियों का सामना है। इन समस्याओं का प्रभावी जवाब केवल भावनात्मक नारों से नहीं दिया जा सकता।

आस्था मजबूत हो, ज्ञान व्यापक हो, अक्ल जागरूक हो और समय की पहचान स्पष्ट हो, तभी प्रभावी धार्मिक समझ पैदा हो सकती है।

अगर इमाम सादिक़ (अ) की शिक्षाओं को सामाजिक जीवन पर लागू किया जाए तो समझदार समाज केवल वह नहीं है जहाँ अधिक पढ़े-लिखे लोग रहते हों, बल्कि वह समाज है जहाँ ज्ञान के साथ नैतिकता, मतभेद के साथ सम्मान, शक्ति के साथ न्याय, इबादत के साथ सेवा और आज़ादी के साथ जिम्मेदारी मौजूद हो।

अक्ल इंसान को केवल यह नहीं सिखाती कि वह अपना अधिकार कैसे हासिल करे, बल्कि यह भी सिखाती है कि दूसरों के अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए।

इसीलिए अक्ल किसी व्यक्ति का केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि सामाजिक पूँजी भी है।

आज हमें केवल अधिक जानकारी की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सही जानकारी को पहचानने की आवश्यकता है। हमें केवल अधिक बोलने वालों की जरूरत नहीं, बल्कि सही समय पर चुप रहने वालों की भी जरूरत है। हमें केवल बुद्धिमान लोगों की नहीं, बल्कि बुद्धिमान, विनम्र, अच्छे आचरण वाले और जिम्मेदार इंसानों की जरूरत है।

हमें ऐसी अक्ल चाहिए जो मस्जिद में इबादत करने वाला, घर में प्यार करने वाला, बाजार में ईमानदार, समाज में जिम्मेदार और मतभेद के समय गरिमापूर्ण बनाए।

ऐसी अक्ल जो आधुनिक दुनिया को समझ सके, लेकिन अपनी धार्मिक पहचान से वंचित न हो; जो सवाल करने से न डरे, लेकिन जवाब मिलने के बाद सच्चाई को स्वीकार करने का साहस भी रखे; जो तकनीक का इस्तेमाल करे, लेकिन तकनीक का गुलाम न बने; जो सोशल मीडिया पर मौजूद रहे, लेकिन उसके शोर में अपनी समझ न खो दे।

इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की शिक्षाओं में अक्ल केवल मानसिक शक्ति नहीं है, बल्कि इंसान के ईमान, नैतिकता, ज्ञान, चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी की बुनियाद है। वह अक्ल जो इंसान को ख़ुदा से जोड़े, ज्ञान की ओर ले जाए, उसके नैतिक व्यवहार को बेहतर बनाए, उसे घमंड से बचाए, हिकमत प्रदान करे और समय के फ़ितनों को समझने की क्षमता दे, वही इंसान को वास्तविक अर्थों में इंसान बनाती है।

आज के इंसान के पास जानकारी बहुत है, लेकिन सोचने के लिए समय कम; संपर्क बहुत हैं, लेकिन सच्चे रिश्ते कम; आवाज़ें बहुत हैं, लेकिन हिकमत की आवाज़ कम है।

ऐसे दौर में इमाम सादिक़ (अ) की शिक्षाएँ हमें एक बुनियादी सबक देती हैं कि जानकारी को ज्ञान बनाइए, ज्ञान को हिकमत में बदलिए, हिकमत को अमल में लाइए और अक्ल को ईमान और नैतिकता के साथ जोड़िए।

क्योंकि इंसान की महानता केवल इसमें नहीं है कि वह कितना जानता है, बल्कि इसमें है कि वह अपनी अक्ल और अपने ज्ञान का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए करता है।

यही वह स्थान है जहाँ अक्ल, ईमान से मिलती है; ज्ञान, नैतिकता से मिलता है; और व्यक्ति का सुधार, समाज के सुधार की शुरुआत बन जाता है।

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