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वो नूर उतरा तो काइनात रौशन हो गई

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वो नूर उतरा तो काइनात रौशन हो गई

आग़ाज़ ए काइनात से पहले क्या था? न सम्त थी, न जेहत; न सुबह थी, न शाम; न ज़मीन थी, न आसमान, न वक़्त की गर्दिश थी, न मकान की वुसअत। एक ज़ात थी, अज़ल से बे-नियाज़, अबद तक बे-मिसाल, जिसकी किब्रियाई के सामने हर तसव्वुर हीच और जिसकी वहदानियत के मुक़ाबिल हर कसरत बे-हक़ीक़त

फिर मशिय्यत-ए-इलाही ने जलवा दिखाया, फ़ैज़-ए-अज़ली ने पर्दा उठाया और नूर-ए-अव्वल का ज़ुहूर हुआ। रिवायात-ए-अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम में जिस हक़ीक़त को नूर-ए-मोहम्मद व आल-ए-मोहम्मद (अलैहिमुस्सलाम) के उन्वान से याद किया गया, वही नूर-ए-हिदायत काइनात के लिए फ़ैज़-ए-इलाही का वास्ता बना।

यही नूर-ए-अव्वल, यही ख़ल्क़-ए-अव्वल, यही अक़्ल-ए-अव्वल और यही वो मुक़द्दस अमानत थी जो अस्लाब-ए-शामिख़ा से अरहाम-ए-मुतह्हरा तक मुन्तक़िल होती हुई बिल-आख़िर सुल्ब-ए-अब्दुल्लाह में जलवा-गर हुई।

काइनात की हर बहार इसी नूर की ख़ुशबू से आशना हुई, हर सुबह ने इसी नूर की किरन से उजाला माँगा, हर नबी ने इसी नूर की बरकत से अपनी रिसालत का चिराग़ रौशन किया और हर वली ने इसी नूर से विलायत का फ़ैज़ पाया।

वो नूर जिसके सामने ज़माना बाद में आया, मकान बाद में आया; वो नूर जिसकी आमद से पहले ही काइनात उसकी मुन्तज़िर थी।

अम्बिया आए, मगर जिसकी ख़बर सुनाने आए

आदम अलैहिस्सलाम आए तो इल्म का दरवाज़ा खुला, मगर उनके क़ल्ब-ए-मुबारक में जिस हक़ीक़त का नूर था, वो मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम की आमद की तरफ़ इशारा कर रहा था।

नूह अलैहिस्सलाम आए तो तूफ़ान ने ज़मीन को ढाँप लिया, मगर सफ़ीना-ए-नजात के बादबानों में एक ऐसी अमानत थी जो आने वाले नबी-ए-रहमत की तरफ़ इशारा करती थी।

इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में डाला गया तो आग गुलज़ार हो गई; मगर उस गुलज़ार के फूलों में भी उस महबूब-ए-ख़ुदा की ख़ुशबू थी जिसके लिए ख़लील-ए-ख़ुदा की नस्ल को बरगुज़ीदा रखा गया।

मूसा अलैहिस्सलाम को कलीमुल्लाह बनाया गया, ईसा अलैहिस्सलाम को रूहुल्लाह कहा गया, दाऊद अलैहिस्सलाम को ज़बूर अता हुई, सुलैमान अलैहिस्सलाम को सल्तनत मिली, यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को हुस्न बख़्शा गया, मगर नुबूव्वत का क़ाफ़िला एक ऐसे नुक्ता-ए-कमाल की तरफ़ बढ़ रहा था जहाँ तमाम अम्बिया की बशारतें एक नाम पर आकर मुकम्मल होनी थीं: मोहम्मद!

वो नाम जो तौरात की बशारतों में गूँजा, इंजील के सफ़हात में जलवा-गर हुआ, सुहुफ़-ए-अम्बिया में उसकी आमद की ख़बर दी गई और जिसका इन्तिज़ार ख़ुद तारीख़ के सीने में साँस लेता रहा।

सदफ़-ए-रिसालत में नूर की परवरिश

फिर वो साअत आई जब नूर-ए-अव्वल सुल्ब-ए-अब्दुल्लाह अलैहिस्सलाम से मुन्तक़िल होकर रहम-ए-मुतह्हर-ए-आमिना सलामुल्लाह अलैहा में पहुँचा।

सदफ़ को गोया मालूम हो गया था कि इसमें मोती मामूली नहीं। जनाब-ए-आमिना सलामुल्लाह अलैहा इस अमानत की अमीन बनीं जिसके लिए ज़मीन व आसमान मुद्दतों से मुन्तज़िर थे। रिवायतों में इस ज़माने की एक नूरानी कैफ़ियत का ज़िक्र मिलता है कि हर माह एक नबी तशरीफ़ लाते और इस मौलूद-ए-मसऊद की आमद की बशारत देते। आदम अलैहिस्सलाम ने आकर कहा: मुबारक हो! इदरीस अलैहिस्सलाम आए: मुबारक हो! नूह अलैहिस्सलाम आए, इब्राहीम अलैहिस्सलाम आए, दाऊद अलैहिस्सलाम आए, इस्माईल अलैहिस्सलाम आए, सुलैमान अलैहिस्सलाम आए, मूसा अलैहिस्सलाम आए, और जब नवें माह ईसा अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाए तो गोया आसमान ने ज़मीन को आख़िरी पैग़ाम दे दिया: अब इन्तिज़ार ख़त्म होने वाला है; रहमत का सूरज तुलूअ होने वाला है।

हर माह एक बशारत थी, हर बशारत एक ऐलान; और हर ऐलान इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा था कि मक्का की ख़ाक पर अब वो क़दम पड़ने वाला है जिसकी बरकत से ख़ाक-ए-मक्का अफ़्लाक से ज़्यादा मुक़द्दस हो जाएगी।

मक्का ने जब अपने महबूब को देखा

अल्लाह ने अपने महबूब के लिए मकान भी मुन्तख़ब किया तो मक्का को मुन्तख़ब किया; ज़मान का इन्तिख़ाब हुआ तो रबीउल-अव्वल को चुना गया; और तारीख़ ने वो दिन महफ़ूज़ कर लिया जिसे अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की रिवायात में सत्रह रबीउल-अव्वल के नाम से याद किया जाता है।

ये महज़ एक तारीख़ न थी।

ये तारीख़ के माथे पर लिखी हुई वो सत्र थी जिसके बाद इन्सानियत की तक़दीर बदलने वाली थी। शब आई तो काइनात पर एक अजीब सुकूत तारी हो गया। किसरा के महल के कंगूरे लरज़ उठे, फ़ारस का आतश-कदा बुझ गया, दरया-ए-सावा ख़ुश्क हो गया और मक्का के बुत औंधे पड़ गए। गोया बातिल के ऐवानों को ख़बर हो गई कि वो आ गया है जिसके सामने तुम्हारे तमाम चराग़ बे-नूर हैं।

शैतान ने आसमान की तरफ़ परवाज़ चाही तो दरवाज़े बन्द मिले। ज़मीन की तरफ़ आया तो मक्का की हुदूद में नूर के पहरे थे। क्योंकि अब आसमानों की ख़बरें हर कान के लिए न थीं; अब वहई का अमीन एक ऐसी हस्ती के हुज़ूर उतरने वाला था जिसका नाम आसमानों में भी इज़्ज़त से लिया जाता था।

और फिर मक्का में सूरज तुलूअ हुआ

फिर वो लम्हा आया जिसके लिए तारीख़ बे-क़रार थी। आमिना सलामुल्लाह अलैहा की आग़ोश में वो नूर जलवा-गर हुआ जिसकी रौशनी से ज़माने की तारीकियाँ शिकस्त खाने वाली थीं।

जिसके चेहरे की ताबानी के सामने सूरज भी अपनी रौशनी का सवाली मालूम हो, जिसकी निस्बत से ख़ुशबू के वुजूद की हिकायतें बयान की जाएँ, जिसके गुज़रने से रास्ते मुअत्तर और मक़ामात मुनव्वर होने की रिवायात मिलें, उस महबूब-ए-किब्रिया की आमद पर अल्फ़ाज़ भी हैरान थे कि आख़िर इस विलादत की मद्ह कैसे की जाए?

इस नूर ने जब ज़मीन को छुआ तो ज़बान-ए-मुबारक पर तौहीद का नग़्मा जारी था: अल्लाहु अकबर वल-हम्दु लिल्लाहि कसीरा, सुब्हानल्लाहि बुक्रतंव्-व असीला।

ये पहला ऐलान था कि आने वाला इन्सानों को अपनी परस्तिश के लिए नहीं, अल्लाह की इबादत और तौहीद के लिए बुलाने आया है।

अबू तालिब अलैहिस्सलाम के घर की वो बशारत

अब्दुल-मुत्तलिब अलैहिस्सलाम की आँखों में ख़ुशी के चिराग़ रौशन थे। अबू तालिब अलैहिस्सलाम के दिल में मसर्रत का समुन्दर मौजज़न था।

फ़ातिमा बिन्त-ए-असद सलामुल्लाह अलैहा ने इस नूरानी बच्चे को देखा तो दिल में एक आरज़ू पैदा हुई: काश! मुझे भी ऐसा बेटा अता होता।

मोमिन-ए-कामिल अबू तालिब अलैहिस्सलाम ने अपनी मोमिना ज़ौजा की पेशानी पर उभरती हुई हसरत को पढ़ लिया। फ़रमाया: ग़म न करो; अल्लाह तुम्हें भी ऐसा बेटा अता करेगा जो इसका वसी और जानशीन होगा।

ये सिर्फ़ तसल्ली न थी। ये मुस्तक़बिल का ऐलान था। तारीख़ ने इस जुमले को अपने सीने में महफ़ूज़ कर लिया, यहाँ तक कि तक़रीबन तीस बरस बाद ख़ाना-ए-काबा की आग़ोश ने एक ऐसे मौलूद का इस्तिक़बाल किया जिसके बारे में ज़माना गवाही देगा: ये अली अलैहिस्सलाम हैं।

मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम आए तो रिसालत का आफ़ताब तुलूअ हुआ; अली अलैहिस्सलाम आए तो विलायत का आफ़ताब उसके साथ रौशन हो गया।

सत्रह रबीउल-अव्वल; दो विलादतें, एक नूरानी सिलसिला

और फिर क़ुदरत ने एक बार फिर सत्रह रबीउल-अव्वल को मुन्तख़ब किया। एक ही तारीख़, दो अज़ीम विलादतें। एक तरफ़ मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम — ख़ातमुन-नबिय्यीन, रहमतुल्लिल-आलमीन, सैय्यिदुल-मुर्सलीन, साहिब-ए-हौज़ ए कौसर, शफ़ीअ-ए-रोज़-ए-जज़ा और महबूब-ए-परवरदिगार।

दूसरी तरफ़ इसी ख़ानवादा-ए-नुबूव्वत का वो अज़ीम फ़र्ज़न्द जिसने मदीना को मदरसा, मस्जिद को मकतब और इल्म को ज़िन्दगी का मक़सद बना दिया यानी हुज्जत-ए-रहमान नातिक़-ए-क़ुरआन हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम।

अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम ने इन्सानियत को क़ुरआन अता किया तो इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने उलूम-ए-क़ुरआन के दरीचे खोले।

अगर मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम ने शरीअत की बुनियाद रखी तो जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने उसके इल्मी ख़दो-ख़ाल को नस्लों तक पहुँचाया।

अगर मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम रहमत बन कर आए तो जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इसी रहमत के इल्म, मअरिफ़त, अख़्लाक़ और फ़िक़ाहत के चश्मे जारी किए।

यही वजह है कि सत्रह रबीउल-अव्वल सिर्फ़ जश्न-ए-विलादत का दिन नहीं; ये नुबूव्वत और इल्म, रिसालत और मअरिफ़त, मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम और जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के नूरानी रिश्ते को याद करने का दिन है।

वो नाम जिसके लिए काइनात मुन्तज़िर थी, मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम यानी वो नाम जिसमें मोहब्बत भी है, रहमत भी, हिदायत भी, शफ़ाअत भी और इन्सानियत की नजात भी, वो अहमद हैं कि आसमानों ने उनकी हम्द की, वो मोहम्मद हैं कि ज़मीन व आसमान ने उनकी मद्ह की, वो सिराज-ए-मुनीर हैं कि तारीक दिलों को रौशनी अता करते हैं, वो बशीर हैं कि रहमत की बशारत देते हैं, वो नज़ीर हैं कि ग़फ़लत से जगाते हैं, वो रहमतुल्लिल-आलमीन हैं कि रहमत को किसी क़ौम, नस्ल या सरहद तक महदूद नहीं करते, वो मुस्तफ़ा हैं कि इन्तिख़ाब-ए-ख़ुदा हैं, वो अमीन हैं कि वहई के अमीन हैं, वो ख़ातमुन-नबिय्यीन हैं कि नुबूव्वत का क़ाफ़िला उनके वुजूद पर मुकम्मल हुआ और वो अब्द हैं, क्योंकि महबूबियत की सबसे बुलन्द मंज़िल भी अब्दियत ही है।

महबूब-ए-ख़ुदा की विलादत, इन्सानियत की सुबह

मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम की विलादत दर-अस्ल एक बच्चे की विलादत नहीं थी; ये इन्सानियत की नई सुबह थी। ये वो सुबह थी जिसमें ग़ुलाम को इन्सान होने का शुऊर मिला, औरत को इज़्ज़त मिली, यतीम को सहारा मिला, कमज़ोर को हक़ मिला, इल्म को इबादत का मक़ाम मिला, अख़्लाक़ को ईमान का हिस्सा बनाया गया और इन्सान को अपने ख़ालिक़ से जोड़ने वाली राह दिखाई गई।

ये वो सुबह थी जिसने बुतों के सामने झुके हुए सरों को तौहीद के सामने झुकना सिखाया।

ये वो सुबह थी जिसने अरब के रेगिस्तान से उठ कर पूरी दुनिया को पैग़ाम दिया कि ख़ुदा एक है, इन्सान बराबर हैं, अद्ल लाज़िम है, रहमत मतलूब है, इल्म ज़रूरी है और अख़्लाक़ दीन की रूह है।

और इसी नूरानी सिलसिले में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाए ताकि मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम के इल्म की शमअ को ऐसे हाथों में दें जो क़यामत तक उसे रौशन रख सकें।

सलाम हो उस नूर पर!

सलाम हो उस नूर पर जिसने ज़ुल्मतों के सीने चीर दिए।

सलाम हो उस रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम पर जिसकी आमद से इन्सानियत को रहमत का मफ़हूम मिला।

सलाम हो उस मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम पर जिनकी सीरत अख़्लाक़-ए-इलाही का आईना है।

सलाम हो उस मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम पर जिनका ज़िक्र अज़ान में बुलन्द हुआ, जिन पर दुरूद आसमानों से उतरता है और जिनकी शफ़ाअत के उम्मीदवार क़यामत के दिन खड़े होंगे।

सलाम हो उन जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम पर जिसने अपने जद्द-ए-अमजद सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम के इल्म को मदीना से दुनिया के गोशे-गोशे तक पहुँचाया।

और सलाम हो उस सत्रह रबीउल-अव्वल पर जिसने एक ही दिन में तारीख़ को दो चराग़ अता किए, एक चराग़-ए-रिसालत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम और एक चराग़-ए-इल्म व विलायत, जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम।

ऐ रबीउल-अव्वल! तू सिर्फ़ बहार का महीना नहीं; तू वो मौसम है जिसमें ज़मीन ने आसमान से एक तोहफ़ा वसूल किया था।

ऐ सत्रह रबीउल-अव्वल! तेरी सुबह को सलाम, तेरे सूरज को सलाम, तेरे उफ़ुक़ को सलाम, और उस नूर को हज़ारों सलाम
जिसके तुलूअ होते ही काइनात ने गोया एक ही सदा में कहा: मुबारक हो इन्सानियत! रहमत का रसूल आ गया है।

मुबारक हो अहल-ए-ईमान!
मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की विलादत-ए-बा-सआदत मुबारक हो।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला मोहम्मदिंव्-व आलि मोहम्मदिंव्-व अज्जिल फ़रजहुम।

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