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आसमान-ए-फ़क़ाहत का एक रोशन सितारा ख़ामोश हो गया

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फ़िक़्ह, तहक़ीक़, तक़वा और एतेदाल की एक ताबिंदा इल्मी रिवायत रुख़्सत हो गई

लेखक: मौलाना तक़ी अब्बास रिज़वी कलकत्तावी

फ़िक़्ह, तहक़ीक़, तक़वा और एतेदाल की एक ताबिंदा इल्मी रिवायत रुख़्सत हो गई
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

الَّذِينَ تَتَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ طَيِّبِينَ ۙ يَقُولُونَ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (अन-नहल: 32)

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन

कभी किसी बुज़ुर्ग की रिहलत सिर्फ़ एक इंसान के दुनिया से उठ जाने का नाम नहीं होती; उसके साथ एक अहद रुख़्सत होता है, एक इल्मी रिवायत का रोशन बाब बंद होता है और एक ऐसा मुनफ़रिद मिज़ाज हमारी नज़रों से ओझल हो जाता है जिसकी तश्कील में कई दहाइयाँ सरफ़ हुई होती हैं। आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानीؒ की रिहलत भी इसी नौइयत का सानिहा है। 99 बरस की उम्र में उनका विसाल हुआ; उनकी तक़रीबन नौ दहाइयों पर मुश्तमिल ज़िंदगी तहसील-ए-इल्म, तदरीस, तहक़ीक़, तरबियत-ए-शागिर्दान, फ़क़ाहत और दीनी ख़िदमत से इबारत थी।

तशय्युअ ने एक ऐसे फ़क़ीह, मुहक़्क़िक़, मुदर्रिस और मरजअ-ए-आली-क़द्र को खो दिया है जिसकी इल्मी शख़्सियत सिर्फ़ एक शोबा-ए-इल्म तक महदूद न थी। फ़िक़्ह व उसूल में गहरी बसीरत, रिजाल व हदीस से ग़ैर-मामूली शग़फ़, तारीखी मसादिर से वाक़फ़ियत और हौज़वी इल्मी रिवायत की बारीकियों से गहरी आगाही ने उनके इल्मी वजूद को एक जामे सूरत अता की थी।

एक तवील इल्मी सफ़र

सय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानीؒ 10 इस्फ़ंद 1306 शम्सी को क़ुम में एक इल्मी ख़ानदान में पैदा हुए। उनके वालिद आयतुल्लाह सय्यद अहमद शुबैरी ज़ंजानी भी साहिब-ए-इल्म शख़्सियत थे और हौज़ा-ए-क़ुम के इब्तिदाई दौर के इल्मी माहौल से क़रीबी ताल्लुक़ रखते थे। सय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानी ने कम-उम्री ही से हौज़वी तालीम का आग़ाज़ किया और मुख़्तसर मुद्दत में दुरूस-ए-सतह मुकम्मल करके असातिज़ा-ए-बुज़ुर्ग की मजालिस-ए-दर्स में पहुँच गए।

उन्होंने क़ुम में आयतुल्लाह सय्यद सदरुद्दीन सदर, आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद हुसैन बुरूजर्दी और बिलख़ुसूस आयतुल्लाह सय्यद मुहम्मद मुहक़्क़िक़ दामाद से इस्तिफ़ादा किया। उनका मुहक़्क़िक़ दामाद के दर्स से ताल्लुक़ ग़ैर-मामूली तौर पर तवील रहा; तक़रीबन इक्कीस बरस तक उनके दर्स-ए-ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह में शिरकत की और उसूल की एक मुकम्मल दौरा-ए-दर्स भी उनसे हासिल किया। नजफ़-ए-अशरफ़ के इल्मी सफ़र में आयतुल्लाह सय्यद अब्दुलहादी शीराज़ी, आयतुल्लाह सय्यद मोहसिन हकीम और आयतुल्लाह सय्यद अबुल-क़ासिम ख़ूई जैसे अकाबिर से भी इस्तिफ़ादा किया।

यही मुख़्तलिफ़ इल्मी तरबियत आगे चलकर उनकी शख़्सियत में एक ऐसी फ़िक़्ही पुख़्तगी का सबब बनी जिसमें क़ुम की उसूली रिवायत, नजफ़ की फ़िक़्ही गहराई और रिजाल व हदीस की तहक़ीक़ी हस्सासियत एक-दूसरे से मरबूत दिखाई देती है।

उन्होंने तदरीस का आग़ाज़ भी निस्बतन कम-उम्री में कर दिया था और बाद के दहाकों में दर्स-ए-ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह व उसूल उनकी ज़िंदगी का मुस्तक़िल हिस्सा बन गया। उनकी तदरीस ने मुतअद्दिद नस्लों को मुतास्सिर किया और हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के इल्मी तसलसुल में उनका एक नुमायाँ मक़ाम क़ायम हुआ।

इल्म का वह लहजा जिसमें शोर नहीं था

उनके इल्म की एक ख़ास पहचान यह थी कि उसमें शोर नहीं था, वज़्न था।

वह इल्म को महज़ मालूमात के अंबार का नाम नहीं समझते थे। उनके नज़दीक आलिम के लिए यह भी ज़रूरी था कि वह कब गुफ़्तगू करे, कहाँ ख़ामोश रहे, इख़्तिलाफ़ को किस अंदाज़ से बयान करे, किसी दावे को क़बूल करने से पहले किस क़दर तहक़ीक़ करे और शरई हुक्म बयान करते वक़्त अपनी ज़िम्मेदारी का कितना एहसास रखे।

इसीलिए उनके तर्ज़-ए-गुफ़्तगू और इल्मी मिज़ाज में एहतियात, तहक़ीक़, इस्तिदलाल और मतानत नुमायाँ थी। वह जज़्बाती रद्द-ए-अमल के बजाय ग़ौर व फ़िक्र को, बुलंद दावों के बजाय दलील को और जल्दी के बजाय तहक़ीक़ को तरजीह देते थे।

रिजाल और हदीस के मैदान में उनकी दिलचस्पी महज़ एक इल्मी तख़स्सुस नहीं थी; यह शिया इल्मी विरसे की हिफ़ाज़त का एक अहम ज़रिया थी। रावियों की शनाख़्त, असानिद की जाँच, क़दीम मसादिर का मुतालआ और उलमा के हालात से वाक़फ़ियत ने उन्हें उस इल्मी सिलसिले का अमीन बनाया जिसके ज़रिए अहले-बैतؑ की तालीमात नस्ल-दर-नस्ल मुन्तक़िल हुई हैं।

उनकी इल्मी ख़िदमात में «जुरअत-ए-अज़ दरिया»जैसे आसार और रिजाल व हदीस से मुताल्लिक़ तहक़ीक़ात भी शामिल हैं, जिन्होंने उनके तहक़ीक़ी ज़ौक़ और इल्मी गहराई को नुमायाँ किया।

फ़क़ाहत; मंसब नहीं, ज़िम्मेदारी

मरजइयत ने उनके इल्म को ज़िम्मेदारी का एक वसीअतर मैदान अता किया। उनके लिए मरजइयत महज़ एक उनवान, इज्तिमाई मक़ाम या इल्मी मंसब नहीं थी; यह लोगों के दीनी सवालात, शरई मसाइल और ज़िंदगी की पेचीदगियों में रहनुमाई की ज़िम्मेदारी थी।

इसीलिए उनके तर्ज़-ए-मरजइयत में नुमूद से ज़्यादा ख़िदमत, इज़हार से ज़्यादा ज़िम्मेदारी और शख़्सी मक़बूलियत से ज़्यादा दीनी अमानत नुमायाँ रही।

उन्होंने अपनी शख़्सियत को मरकज़ बनाने के बजाय **इल्म, तहक़ीक़ और दीनी ज़िम्मेदारी** को मरकज़ रखा। शायद यही वजह है कि उनकी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा शोहरत के हंगामों से दूर, दर्स व तदरीस और इल्मी तहक़ीक़ की ख़ामोश फ़ज़ा में गुज़रा।

आज जब शोहरत बसा-औक़ात इल्म से ज़्यादा तेज़ी से सफ़र करती है, उनकी ज़िंदगी इस हक़ीक़त की याद दिलाती है कि इल्मी अज़मत को हमेशा तशहीर की ज़रूरत नहीं होती। कभी एक उस्ताद की ख़ामोश तदरीस, कई दहाइयों की तहक़ीक़ और चंद नस्लों की तरबियत ऐसी मीरास छोड़ जाती है जिसकी आवाज़ ज़माने के शोर से कहीं ज़्यादा देरपा होती है।

शोहरत से दूर, ख़िदमत के क़रीब

उनकी शनाख़्त बुलंद दावों से नहीं, तवील तदरीस से बनी; तशहीर से नहीं, तहक़ीक़ से; नारों से नहीं, शागिर्दों से; और ज़ाहिरी नुमूद से नहीं, उस इल्मी मीरास से जो उनके बाद भी बाक़ी रहनी थी।

यही उनकी शख़्सियत का हुस्न था कि उन्होंने इल्म को अपनी ज़ात की नुमाइश का ज़रिया नहीं बनाया। वह हौज़ा, दर्स, तहक़ीक़ और तरबियत के आदमी थे।

उनके लिए एक अच्छा दर्स सिर्फ़ चंद मसाइल की तौज़ीह नहीं था; वह तालिब-ए-इल्म के अंदर तहक़ीक़ का ज़ौक़, दलील का एहतराम, इल्मी एहतियात और हक़ की तलाश पैदा करने की कोशिश थी। इसी लिए उनकी असल मीरास सिर्फ़ उनकी तसानीफ़ या फ़तावों में नहीं, बल्कि उन ज़ेहनों में भी महफ़ूज़ है जो उनके इल्मी माहौल से गुज़रे।

एतेदाल कमज़ोरी नहीं, इल्मी पुख़्तगी है

उनके मिज़ाज का एक नुमायाँ पहलू एतेदाल था।

यह ऐसा एतेदाल नहीं था जो उसूलों से दस्तबरदारी का नाम हो, बल्कि ऐसा तवाज़ुन था जिसमें उसूल अपनी जगह मज़बूत रहें और इख़्तिलाफ़ अख़लाक़, इंसाफ़ और हिकमत की हुदूद से बाहर न निकले।

फ़िक़्ही इख़्तिलाफ़ को शख़्सी दुश्मनी में बदल देना, फ़िक्री इख़्तिलाफ़ को ताल्लुक़ात के ख़ातमे का सबब बनाना या दीनी वक़ार को शोर व हंगामे का मोहताज समझना उनके इल्मी मिज़ाज से हमआहंग न था।

वह इस बात की मिसाल थे कि इंसान अपने उसूलों पर क़ायम रहते हुए भी दूसरों के एहतराम को बरक़रार रख सकता है; दलील पर मज़बूती से क़ायम रहते हुए भी ज़बान में नरमी रख सकता है; और दीनी ज़िम्मेदारी अदा करते हुए भी ग़ैर-ज़रूरी कशमकश से ख़ुद को महफ़ूज़ रख सकता है।

यही तवाज़ुन किसी आलिम को सिर्फ़ साहिब-ए-इल्म नहीं बल्कि साहिब-ए-बसीरत बनाता है।

इख़्तिलाफ़ अपनी जगह, एहतराम अपनी जगह

उनकी वसीअ इल्मी और इंसानी शख़्सियत का एक पहलू यह भी था कि मुख़्तलिफ़ फ़िक्री और समाजी हल्क़ों से ताल्लुक़ रखने वाले अफ़राद के साथ उनके रवाबित रहे। बाज़ मुलाक़ातों और बाज़ ताल्लुक़ात को मुख़्तलिफ़ लोगों ने अपने-अपने ज़ाविये से देखा, लेकिन उनकी शख़्सियत का नुमायाँ वस्फ़ यह था कि वह इख़्तिलाफ़ को इंसान की तौहीन में तब्दील नहीं करते थे।

उनके नज़दीक इल्मी इख़्तिलाफ़ अपनी जगह क़ायम रह सकता था और इंसानी एहतराम अपनी जगह।

यह रवैया ख़ास तौर पर उस दौर में अहम महसूस होता है जब इख़्तिलाफ़-ए-राय बहुत जल्द इख़्तिलाफ़-ए-ज़ात में तब्दील हो जाता है और इल्मी बहस शख़्सी निज़ा की सूरत इख़्तियार कर लेती है।

शायद इसी लिए उनकी शख़्सियत में एक ऐसी वुसअत दिखाई देती थी जिसमें इल्मी इस्तिक़लाल भी था और इंसानी शाइस्तगी भी।

इज्तिमाई मामलात में ख़ैरख़्वाहाना किरदार

उनकी ज़िंदगी के बाज़ पहलू यह भी बताते हैं कि मरजइयत को वह सिर्फ़ मदरसे और किताब तक महदूद नहीं समझते थे। हस्सास इज्तिमाई मामलात में भी उनकी राय और मशावरत का ज़िक्र मिलता है।

रहबर-ए-इंक़िलाब आयतुल्लाह सय्यद अली ख़ामेनई के साथ उनके तवील रवाबित के हवाले से मुख़्तलिफ़ वाक़ियात बयान किए गए हैं। उनमें एक वाक़िया अहमद मुन्तज़री के बयान से मुताल्लिक़ है, जिसके मुताबिक़ आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी ने अहमद मुन्तज़री के अदालती हुक्म पर अमल-दरामद को मस्लहत के ख़िलाफ़ क़रार देते हुए अपनी राय आला हुक्काम तक पहुँचाने की कोशिश की; अहमद मुन्तज़री के मुताबिक़ बादअज़ाँ आयतुल्लाह ख़ामेनई की जानिब से आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी की राय के मुताबिक़ अमल करने की हिदायत दी गई और अदालती हुक्म मुअत्तल हुआ। यह तफ़्सील अहमद मुन्तज़री के अपने बयान पर मबनी है, इसलिए इसे इसी निस्बत के साथ देखना ज़्यादा मुनासिब है।

इस वाक़िये से क़त्अ-ए-नज़र, इन रवाबित का एक पहलू यह ज़रूर नुमायाँ होता है कि एक बुज़ुर्ग मरजअ इज्तिमाई मामलात में अपनी शरई व अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी के एहसास के तहत ख़ैरख़्वाहाना राय पेश कर सकता है और अपने इल्मी इस्तिक़लाल को बरक़रार रखते हुए अहल-ए-इक़्तिदार से मुकालमा कर सकता है।

यह तर्ज़-ए-अमल न अंधी ताईद का नाम है, न महज़ मुख़ालिफ़त का; बल्कि इसमें एक आलिम की तरफ़ से अपनी ज़िम्मेदारी के दायरे में रहते हुए ख़ैरख़्वाहाना मशवरा देने का तसव्वुर मौजूद है।

तशय्युअ ने क्या खोया?

आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानीؒ की रिहलत को सिर्फ़ एक मरजअ की वफ़ात के तौर पर देखना उनकी शख़्सियत की वुसअत को महदूद कर देना होगा।

तशय्युअ ने एक ऐसे आलिम को खोया जिसने क़ुम व नजफ़ की कई इल्मी नस्लों को अपनी आँखों से देखा, उनके अकाबिर से इस्तिफ़ादा किया, उनकी इल्मी रिवायत को आगे मुन्तक़िल किया और फ़िक़्ह, उसूल, रिजाल, हदीस और तारीख़ के मुख़्तलिफ़ गोशों में तहक़ीक़ की।

उन्होंने एक ऐसे ज़माने में ज़िंदगी गुज़ारी जिसमें हौज़ा-ए-इल्मिया की कई नस्लें तब्दील हुईं। उनकी याददाश्त और इल्मी तजुर्बे में एक तवील हौज़वी तारीख़ के नुक़ूश महफ़ूज़ थे।

इसीलिए उनकी रिहलत के साथ सिर्फ़ एक उस्ताद ख़ामोश नहीं हुआ؛ इल्मी हाफ़िज़े का एक बड़ा बाब भी बंद हुआ है।

ख़ला सिर्फ़ मंसब का नहीं, मिज़ाज का भी

हौज़ा-ए-इल्मिया बाक़ी रहेगा।

दर्स-ए-ख़ारिज जारी रहेंगे।
फ़िक़्ही मबाहिस आगे बढ़ेंगे।
किताबें लिखी जाएँगी।
शागिर्द नए असातिज़ा से फ़ैज़ हासिल करेंगे।
और इल्म का सिलसिला इंशाअल्लाह जारी रहेगा।

लेकिन हर बुज़ुर्ग अपने साथ एक मुनफ़रिद इल्मी मिज़ाज लेकर आता है, जिसे किसी ओहदे, मंसब या उनवान के ज़रिए दोबारा पैदा नहीं किया जा सकता।

यह किसी कुर्सी का ख़ला नहीं; एक तर्ज़-ए-इल्म का ख़ला है।

यह किसी दफ़्तर का ख़ला नहीं; एक तर्ज़-ए-तहक़ीक़ का ख़ला है।

यह सिर्फ़ एक मरजअ के मंसब का ख़ला नहीं; एक ऐसे तर्ज़-ए-मरजइयत का ख़ला है जिसमें इल्म के साथ वक़ार, इख़्तिलाफ़ के साथ अख़लाक़, फ़तवे के साथ एहतियात और मंसब के साथ एहसास-ए-ज़िम्मेदारी शामिल था।

आने वाले ज़माने के लिए एक ख़ामोश वसीयत

बाज़ शख़्सियात अपनी ज़िंदगी में किताबें लिखती हैं, बाज़ इदारे क़ायम करती हैं, बाज़ तहरीकें चलाती हैं; लेकिन कुछ लोग अपनी पूरी ज़िंदगी ही एक ख़ामोश दर्स बना देते हैं।

आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानीؒ की ज़िंदगी भी एक ऐसे ही ख़ामोश दर्स की मानिंद थी।

वह दर्स कि इल्म सिर्फ़ ज़्यादा जानने का नाम नहीं; सही बात तक पहुँचने की दियानत भी इल्म है।

वह दर्स कि तहक़ीक़ सिर्फ़ हवाला जमा करने का नाम नहीं; हक़ीक़त की तलाश में अमानत भी तहक़ीक़ है।

वह दर्स कि इख़्तिलाफ़ सिर्फ़ अपनी राय मनवाने का नाम नहीं; दलील के साथ दूसरे के एहतराम को बाक़ी रखना भी इल्मी अख़लाक़ है।

वह दर्स कि फ़तवा सिर्फ़ एक जवाब नहीं; एक शरई ज़िम्मेदारी है।

और वह दर्स कि मरजइयत सिर्फ़ मक़ाम नहीं; लोगों के दीनी एतमाद का बोझ है।

ऐसी ज़िंदगी अपने इख़्तिताम पर भी ख़त्म नहीं होती; वह आने वाली नस्लों के किरदार में अपना तसलसुल पैदा करती है।

एक अहद रुख़्सत हो गया

आज जब उनके इंतिक़ाल की ख़बर हौज़ात, इल्मी मराकिज़ और तशय्युअ के हल्क़ों में सोग की कैफ़ियत पैदा कर रही है तो यह एहसास भी गहरा हो रहा है कि एक पूरा इल्मी अहद अपने एक मोतबर नुमाइंदे से महरूम हो गया है। उनके इंतिक़ाल पर क़ुम के इल्मी हल्क़ों और मुख़्तलिफ़ दीनी इदारों की जानिब से ताज़ियती पैग़ामात और मजालिस-ए-विदाअ का इनइक़ाद इसी वसीअ इल्मी ताल्लुक़ की अक्कासी करता है।

लेकिन अहल-ए-इल्म की ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तियाज़ यही होता है कि उनकी मौत उनके इल्म को ख़त्म नहीं करती।

वह हाथ जो बरसों किताबों के औराक़ पलटते रहे, आज ख़ामोश हैं; मगर उन हाथों से रोशन होने वाली सत़रें आने वाली नस्लों से गुफ़्तगू करती रहेंगी।

वह ज़बान जो फ़िक़्ह व उसूल, रिजाल व हदीस की बारिकियों को बयान करती रही, आज ख़ामोश हो गई; मगर उसकी इल्मी बाज़गश्त दर्सगाहों में सुनाई देती रहेगी।

वह उस्ताद जिसने नस्लों को इल्म के आदाब सिखाए, आज ख़ुद हमारी आँखों से ओझल है; मगर उसके शागिर्द, उसकी तहक़ीक़ात और उसका इल्मी उस्लूब उसके वजूद की गवाही देते रहेंगे।

और वह शख़्सियत जो शोहरत के हंगामों से दूर रहकर इल्म व फ़क़ाहत की ख़िदमत करती रही, आज पर्दा-ए-हयात से रुख़्सत हो गई; मगर उसकी मीरास अहल-ए-इल्म के लिए एक मुस्तक़िल हवाला बनकर बाक़ी रहेगी।

ख़ुदावंद-ए-मुतआल इस अज़ीम फ़क़ीह, मुहक़्क़िक़, मुदर्रिस और मरजअ-ए-आली-क़द्र को जवार-ए-मुहम्मद व आले-मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम में आला मक़ाम अता फ़रमाए, उनकी इल्मी व दीनी ख़िदमात को शरफ़-ए-क़बूल बख़्शे, उनके शागिर्दों और इल्मी सिलसिले को बाक़ी व ताबिंदा रखे, हौज़ात-ए-इल्मिया और उम्मत-ए-तशय्युअ को इस अज़ीम फ़क़दान पर सब्र व इस्तिक़ामत अता फ़रमाए और हमें उनकी इल्मी, अख़लाक़ी और दीनी मीरास की क़द्र करने और उसे आइंदा नस्लों तक मुन्तक़िल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

आसमान-ए-फ़क़ाहत का एक रोशन सितारा ख़ामोश हो गया, मगर उसकी रोशनी बाक़ी है।

यह वह इल्म के रोशन चराग़ हैं जिनको हवा बुझाती नहीं,है सलाम करती है।

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