कर्बला इतिहास की सिर्फ़ एक घटना नहीं, बल्कि एक ऐसा स्कूल है जिसने ज़ुल्म के सामने इंसान की ज़िम्मेदारी, हक़ के लिए डटे रहने और क़ुर्बानी के मतलब को एक हमेशा रहने वाली ज़ुबान दी है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस स्कूल के केंद्र और धुरी हैं और आशूरा इसकी सबसे रौशन व्याख्या है। बाद के दौर में इस स्कूल से जुड़े लोग अपने-अपने समय के हालात में हक़, इज़्ज़त और मज़लूमियत के सवालों का सामना करते हैं और इसी हुसैनी सोच से अपने लिए रूहानी रहनुमाई लेते हैं।
लेखकः मौलाना सय्यद अली हाशिम आब्दी
27 सितंबर 2026 को शहीद-ए-मुक़ावमत, सालार-ए-इस्तिक़ामत, क़ाइद-ए-कारवान-ए-हुर्रियत, अलमबरदार-ए-मकतब-ए-कर्बला, पैरू-ए-फ़िक्र-ए-हुसैनी, मर्द-ए-मैदान-ए-मुज़ाहमत अल्लामा सैयद हसन नसरुल्लाह रिज़वानुल्लाह तआला अलैह की शहादत को 2 साल पूरे हो रहे हैं। 27 सितंबर 2024 को बैरूत में इसराइली हवाई हमले में उनकी शहादत के बाद लेबनान और पूरे क्षेत्र की स्थिति एक नए दौर में दाख़िल हो गई। ये दो साल सिर्फ़ एक रहबर के बिछड़ने का समय नहीं हैं, बल्कि लेबनान, फ़िलिस्तीन, मुक़ावमत और क्षेत्र में होने वाले बदलावों को देखने और समझने का भी अहम दौर है।
शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह रिज़वानुल्लाह तआला अलैह की शख़्सियत को समझने के लिए सिर्फ़ उनकी सियासी ज़िंदगी या सैन्य नेतृत्व को पढ़ना काफ़ी नहीं है। उनकी सोच और उनके भाषणों में कर्बला, आशूरा और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद एक लगातार रूहानी हवाले के तौर पर मौजूद रही। इज़्ज़त, डटे रहना, वफ़ादारी, क़ुर्बानी और मज़लूम के साथ खड़े होना जैसे विचार उनके वैचारिक बयान में बार-बार कर्बला की ज़ुबान में सामने आए। यही वजह है कि उनकी शहादत के बाद उनकी शख़्सियत को याद करते हुए कर्बला का हवाला सिर्फ़ भावनात्मक लगाव नहीं, बल्कि उनकी सोच और उनके नज़रिये को समझने का एक अहम पहलू भी है।
कर्बला इतिहास की सिर्फ़ एक घटना नहीं, बल्कि एक ऐसा स्कूल है जिसने ज़ुल्म के सामने इंसान की ज़िम्मेदारी, हक़ के लिए डटे रहने और क़ुर्बानी के मतलब को एक हमेशा रहने वाली ज़ुबान दी है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस स्कूल के केंद्र और धुरी हैं और आशूरा इसकी सबसे रौशन व्याख्या है। बाद के दौर में इस स्कूल से जुड़े लोग अपने-अपने समय के हालात में हक़, इज़्ज़त और मज़लूमियत के सवालों का सामना करते हैं और इसी हुसैनी सोच से अपने लिए रूहानी रहनुमाई लेते हैं।
शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह रिज़वानुल्लाह तआला अलैह की ज़िंदगी में यह रिश्ता साफ़ तौर पर दिखाई देता है। उनके लिए आशूरा सिर्फ़ अतीत की याद नहीं था, वे इसे अपने दौर के इंसान के लिए एक नैतिक संदेश के रूप में पेश करते रहे। कर्बला की ज़ुबान में वे इज़्ज़त और ज़िल्लत, हक़ और बातिल और क़ुर्बानी और मसलेहत के सवालों को आज के हालात से जोड़ते थे।
मरजअ-ए-आला-ए-दीनी आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली सीस्तानी द०ज़ि० ने 28 सितंबर 2024 को अपने शोक संदेश में शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह रिज़वानुल्लाह तआला अलैह को "अनमूज़जन क़ियादिय्यन क़ल्ला नज़ीरुहू फ़िल उक़ूदिल अख़ीरा" यानी पिछले दशकों में कम ही मिलने वाला नेतृत्व का नमूना कहा था। उस संदेश में लेबनान की ज़मीन को इसराइली कब्ज़े से आज़ाद कराने में उनकी भूमिका, इराक़ी जनता की दाइश के ख़िलाफ़ मदद और फ़िलिस्तीन के मज़लूम लोगों के समर्थन में उनके स्टैंड का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया गया था।
दो साल बाद जब उनकी ज़िंदगी और संघर्ष पर नज़र डालते हैं, तो यह बात सामने आती है कि कुछ लोग अपने दौर के सवालों का जवाब सिर्फ़ शब्दों से नहीं, बल्कि अपने अमल, फ़ैसलों और क़ुर्बानियों से देते हैं।
कर्बला का संदेश सिर्फ़ यह नहीं है कि ज़ुल्म को पहचाना जाए, बल्कि यह भी है कि इंसान अपने रुख और अपने किरदार से अपने दौर के सामने जवाबदेह हो। हर ज़माना अपने सवाल लेकर आता है और हर पीढ़ी को अपने हिस्से की परीक्षा का सामना करना पड़ता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी इसीलिए किसी एक समय तक सीमित नहीं रही, क्योंकि उसने इंसान के सामने यह शाश्वत सवाल रख दिया कि जब हक़ और बातिल आमने-सामने हों तो उसका रुख क्या होगा।
इसी रूहानी सिलसिले में शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह रिज़वानुल्लाह तआला अलैह को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आज्ञाकारी, अनुयायी और मकतब-ए-हुसैनी का एक समकालीन सिपाही कहा जाता है।
दो साल बाद उनकी याद सिर्फ़ एक व्यक्ति की याद नहीं, बल्कि उन सवालों की भी याद है जो हर दौर के सामने खड़े होते हैं: ज़ुल्म के सामने हमारा रुख क्या हो? क़ुर्बानी की क़ीमत क्या है? वफ़ादारी की मांग क्या है? और मज़लूम के साथ खड़े होने की ज़िम्मेदारी कहाँ तक जाती है?
समय बदलते रहेंगे, हालात के नाम बदलते रहेंगे और ज़ुल्म के रूप भी बदलते रहेंगे, लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद, आशूरा का संदेश और मकतब-ए-इमाम हुसैन की नैतिक रौशनी उन दिलों में ज़िंदा रहेगी जो हक़, इज़्ज़त, आज़ादी और मज़लूम की हिमायत को अपनी मानवीय ज़िम्मेदारी समझते हैं।
और आख़िर में, इस रिश्ते की सबसे रौशन व्याख्या वही है जो कर्बला हमें देती है: हम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ग़ुलाम हैं, हम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अनुयायी हैं, और हम मकतब-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सिपाही हैं।