जब निकाह मुश्किल हो जाए और उसमें सादगी खत्म हो जाए तो परिवार भी अपनी वास्तविक आत्मा खो देता है। जब गुनाह आसान और हलाल रास्ता मुश्किल दिखाई देने लगे तो युवा लड़के-लड़कियां गुनाह की राह पर चल पड़ते हैं। जब कोई सभ्यता अपनी मूल भावना से दूर होने लगती है तो सबसे पहले उसके पवित्र संस्थान प्रभावित होते हैं और इनमें सबसे प्रमुख संस्था परिवार है।
लेखक: मौलाना अहमद फ़ातिमी
जब निकाह मुश्किल हो जाए और उसमें सादगी खत्म हो जाए तो परिवार भी अपनी वास्तविक आत्मा खो देता है। जब गुनाह आसान और हलाल रास्ता मुश्किल दिखाई देने लगे तो युवा लड़के-लड़कियां गुनाह की राह पर चल पड़ते हैं। जब कोई सभ्यता अपनी मूल भावना से दूर होने लगती है तो सबसे पहले उसके पवित्र संस्थान प्रभावित होते हैं और इनमें सबसे प्रमुख संस्था परिवार है।
हमें खुद से सवाल करना चाहिए कि हमारे उपमहाद्वीप के समाज में खास तौर पर गुनाह आसान और निकाह मुश्किल क्यों होता जा रहा है। एक ओर दुश्मन की सांस्कृतिक आक्रामकता है, वहीं दूसरी ओर हम अपने बनाए हुए गलत मानदंडों के जरिए अनजाने में उसी दुश्मन के मौन हथियार और साधन बनकर अपनी नई पीढ़ी को नुकसान पहुंचाने में भूमिका निभा रहे हैं।
आज हमारे समाज में शादी, जो दिल के सुकून और दीन की तकमील का माध्यम थी, रस्मों-रिवाज, दिखावे और आर्थिक बोझ की भेंट चढ़ गई है। परिवार प्रेम, सुकून और तरबीयत का केंद्र है और इसकी बुनियाद निकाह पर कायम होती है।
ऐसे समय में शहीद रहबर आयतुल्लाह उज्मा सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई के विचार हमारे लिए मार्गदर्शन का प्रकाशस्तंभ हैं। उन्होंने तीन दशकों से अधिक समय के दौरान विभिन्न अवसरों पर युवाओं और परिवारों को सादगीपूर्ण और आसान शादी की ओर प्रेरित किया।
इस लेख में उनके चुनिंदा बयानों की रोशनी में इस विषय के महत्वपूर्ण पहलुओं की समीक्षा की गई है।
निकाह-ए-अमीरुल मोमिनीन और फ़ातिमा ज़हरा: सादगी का आदर्श नमूना
इस्लाम के इतिहास का वह स्वर्णिम अवसर, जब अमीरुल मोमिनीन हज़रत इमाम अली (अ.) और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) का निकाह हुआ, केवल विवाह की एक रस्म नहीं थी, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दृष्टि की घोषणा थी। इसने स्पष्ट कर दिया कि प्रेम को दौलत की आवश्यकता नहीं, सच्ची निष्ठा रस्मों और परंपराओं से ऊपर है और सादगी महानता के विपरीत नहीं, बल्कि उसकी बुनियाद है।
शहीद रहबर इसी आदर्श की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं कि मुस्लिम लड़की की शादी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की शादी जैसी होनी चाहिए। ऐसी शादी, जिसमें मोमिन पुरुष और महिला के बीच आध्यात्मिक और ईश्वरीय प्रेम का संबंध हो तथा वास्तविक अर्थों में सहयोग और जीवन-संगति हो, लेकिन खोखली औपचारिकताओं, दिखावे और धन-दौलत से पूरी तरह दूर हो। (16/01/1990)
एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा कि हज़रत ज़हरा (स.) के दहेज में इतनी सादगी अपनाने के पीछे शैक्षिक और तरबीयती पहलू था, ताकि लोगों के लिए व्यवहार का एक आधार और मानदंड कायम रहे और वे अत्यधिक खर्च से पैदा होने वाली परेशानियों में न पड़ें। (09/07/1998)
मुख्य बाधा आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक है
आमतौर पर शादी में देरी का कारण आर्थिक तंगी को माना जाता है, लेकिन शहीद रहबर इस विश्लेषण को पर्याप्त नहीं मानते थे। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों की एक सभा में कहा कि शादी की सांस्कृतिक बाधाओं को मामूली नहीं समझना चाहिए। आर्थिक बाधाएं समस्या का केवल एक हिस्सा हैं, जबकि इसका बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक बाधाओं से जुड़ा है—आदतें, गर्व और दिखावा, अधिकता पर गर्व करना, दूसरों की देखा-देखी और प्रतिस्पर्धा तथा बनाव-श्रृंगार की प्रवृत्ति। (27/02/2001)
यह कथन हमारी सामाजिक कमजोरियों का आईना है। उन्होंने इसी संबोधन में कहा कि इस्लाम में शादी की बुनियाद सादगी पर है। अफसोस है कि अधिक से अधिक पाने, दिखावे और पूंजीवादी संस्कृति ने इस काम को मुश्किल बना दिया है। यहां तक कि कुछ जिम्मेदार लोगों ने भी अपने परिवारों में दिखावटी शादियों के जरिए मुश्किलें पैदा की हैं।
माता-पिता की जिम्मेदारी
समाज तभी सुधरता है जब उसके बुजुर्ग अपनी जिम्मेदारियों को पहचानें। शहीद रहबर ने माता-पिता को बेहद आत्मीयता के साथ संबोधित करते हुए कहा कि मैं माताओं और पिताओं को याद दिलाता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि शादी के अवसरों को थोड़ा आसान बनाएं। माता-पिता सख्ती करते हैं, जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं है। हां, कुछ स्वाभाविक कठिनाइयां हैं, जैसे घर और रोजगार की समस्या, लेकिन कुरआन कहता है: “यदि वे गरीब होंगे तो अल्लाह अपने फ़ज़्ल से उन्हें समृद्ध कर देगा।” युवाओं की शादी को न रोकें। (15/07/2015)
ये शब्द केवल एक नसीहत नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता हैं। जब माता-पिता अपनी प्रतिष्ठा, इच्छाओं और सामाजिक हैसियत को प्राथमिकता देते हैं तो वे वास्तव में अपनी ही संतानों के भविष्य को जटिल बना देते हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इस्लामी क्रांति के शुरुआती दौर में औपचारिकताओं और सख्तियों में कमी आने से शादियां आसान हुई थीं और चेतावनी दी कि हमें फिर उसी पुरानी स्थिति की ओर नहीं लौटना चाहिए। (16/01/1990)
रिश्ते कराने की परंपरा को फिर से जीवित करना
शहीद रहबर ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया कि रिश्ते मांगने और अच्छे रिश्ते तय कराने के लिए बीच में मध्यस्थ बनने की परंपरा कमजोर पड़ गई है। जबकि अतीत में नेक और मोमिन लोग उपयुक्त लड़के-लड़कियों का परिचय कराते और उनकी शादी का रास्ता आसान बनाते थे। उनके अनुसार इस परंपरा को फिर से जीवित किया जाना चाहिए और समाज में इसके लिए एक आंदोलन पैदा होना चाहिए। (23/07/2014, 11/07/2015)
मेहर: मात्रा नहीं, नीयत और निष्ठा
मेहर निकाह में महिला का अनिवार्य अधिकार है, लेकिन हमारे समाज में इसके संबंध में दो तरह की अतियां दिखाई देती हैं। एक ओर मेहर केवल औपचारिक और प्रतीकात्मक रह जाता है, यानी हर चीज महंगी हो गई लेकिन मेहर की राशि वही रही। दूसरी ओर लड़की की सुरक्षा के नाम पर बहुत अधिक मेहर निर्धारित कर दिया जाता है।
शहीद रहबर इस दूसरी अतिशयोक्ति की आलोचना करते हुए कहते हैं:
“अधिक मेहर से कोई खुशहाल नहीं हुआ। जो लोग समझते हैं कि अधिक मेहर न होने से उनकी बेटी की शादी अस्थिर हो जाएगी, वे गलत हैं। यदि शादी प्रेम और सही परिस्थितियों पर आधारित हो तो कम मेहर में भी वह अस्थिर नहीं होगी और यदि शादी धोखे और चालाकी की बुनियाद पर हो तो मेहर कितना भी अधिक हो, बुरे स्वभाव वाला पुरुष उससे बच निकलने का रास्ता खोज लेगा।” (25/10/1996)
उन्होंने भारी मेहर को जाहिलियत की परंपरा बताते हुए स्पष्ट किया कि यह तरीका पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और आइम्मा-ए-हुदा (अ.) तथा इस्लाम की महान हस्तियों की सीरत के विपरीत है। (23/11/1994)
दहेज: सामाजिक न्याय का मुद्दा
दहेज के बारे में शहीद रहबर का दृष्टिकोण केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय पर आधारित है। उन्होंने कहा:
“यह तर्क कि ‘हमारे पास है, इसलिए हम ऐसा करते हैं’ बिल्कुल पर्याप्त नहीं है। समाज में हर तरह के लोग रहते हैं। आपको ऐसा करना चाहिए कि जिस लड़की के पास यह सब नहीं है, वह भी अगर शादी करना चाहे तो कर सके। अन्यथा यह दहेज और यह मेहर दूसरों के लिए शादी का दरवाजा बंद कर देंगे। यह मानवीय तरीका नहीं है, इस्लामी तरीका नहीं है।” (26/10/1996)
उन्होंने इस प्रतिस्पर्धा को भी गंभीर गलती बताया कि दहेज में कोई वस्तु रिश्तेदार, बहन, पड़ोसन या सहपाठी से कम न हो। उनके अनुसार इसी कारण बहुत-सी लड़कियों की शादी नहीं हो पाती और बहुत-से लड़के विवाह नहीं कर पाते। (16/01/1994) उन्होंने यह सलाह भी दी कि महंगी और तथाकथित मशहूर दुकानों का रुख न किया जाए। (09/07/1993)
फ़ुजूलखर्ची और दिखावा
आज के दौर में शादियों की सबसे बड़ी समस्याओं में फ़ुजूलखर्ची और दिखावा शामिल है। इस बीमारी में केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि समाज के प्रभावशाली लोग भी कभी-कभी उससे आगे निकल जाते हैं। जुबान से हर कोई फिजूलखर्ची का विरोध करता है, लेकिन व्यवहार में कोई पीछे नहीं रहता। इस्लाम ने फिजूलखर्ची को हराम क़रार दिया है, लेकिन हमने इसे गर्व का विषय बना लिया है।
शहीद रहबर कहते हैं: “कुछ लोग उस काम से, जिससे सवाब कमाया जा सकता है, गुनाह कमाते हैं—अपने फिजूलखर्ची करने और इस नेक काम को हराम कामों के साथ मिला देने के कारण। ... फिजूलखर्ची हराम है। जिन लोगों के पास साधन नहीं हैं, उनके दिल को ठेस पहुंचाना भी कुछ अवसरों पर वास्तव में हराम है।” (29/01/1998)
शादी के महंगे कपड़ों के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें किराए पर लेने में कोई शर्म नहीं है। असली शर्म की बात यह है कि इंसान बहुत अधिक पैसा खर्च करके ऐसी चीज खरीदे, जिसका केवल एक बार इस्तेमाल हो और फिर उसे रख दिया जाए। (25/12/1995)
सादगी: पूरी जिंदगी की बुनियाद
शहीद रहबर के अनुसार शादी की सादगी केवल एक समारोह तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी वैवाहिक जिंदगी की बुनियाद है। उन्होंने कहा:
“अपनी जिंदगी के सभी मामलों में सादगी का ध्यान रखें और इसकी शुरुआत इसी शादी के समारोह से होती है। यदि आपने सादगी से शुरुआत की तो अगला कदम भी सादा होगा। लेकिन यदि आपने अमीरों जैसी दिखावटी महफिल सजा ली तो फिर छोटे घर और सीमित सामान के साथ जिंदगी गुजारना मुश्किल हो जाएगा।” (02/09/2015)
युवा: बदलाव के वाहक
हर बदलाव की बुनियाद युवा होते हैं और आसान शादी की मुहिम भी उनके बिना संभव नहीं है। शहीद रहबर युवाओं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आप मांग करने वाले और उत्साही हैं और शादी के क्षेत्र में मौजूद गलत परंपराओं को तोड़ना भी आपका ही काम है। (23/07/2014)
उन्होंने इस गलत धारणा को भी खारिज किया कि शादी से पहले अपना निजी घर और अच्छी आय वाली नौकरी होना जरूरी है। कुरआन की आयत “यदि वे गरीब होंगे तो अल्लाह अपने फ़ज़्ल से उन्हें समृद्ध कर देगा” का उल्लेख करते हुए उन्होंने अल्लाह पर भरोसा रखने की शिक्षा दी और विवाह की उम्र बढ़ने को एक गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि इस पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार किया जाना चाहिए। (28/10/2013)
यह संदेश वास्तव में युवाओं को सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर सादगी को अपनाने का आह्वान है।
संस्कृति निर्माण की आवश्यकता
शहीद रहबर के अनुसार यह समस्या केवल व्यक्तिगत सुधार से हल नहीं होगी, बल्कि इसके लिए सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बदलाव जरूरी है। उन्होंने कहा:
“परिवार के गठन के लिए संस्कृति निर्माण की आवश्यकता है, आसान शादी के लिए संस्कृति निर्माण की आवश्यकता है और शादी के मामले में सख्ती न करने के लिए भी संस्कृति निर्माण की आवश्यकता है।” (15/02/2020)
उन्होंने इसे समाज के भविष्य से भी जोड़ा और कहा कि युवा आबादी की कमी समाज को बूढ़ा कर देती है और बूढ़ा समाज विकास की ऊंचाइयों को हासिल नहीं कर सकता।
आसान शादी: एक सुधारात्मक कदम
गहराई से देखा जाए तो आसान शादी एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार है। यह दिखावे और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के खिलाफ आवाज, सामाजिक असमानता के मुकाबले समानता का संदेश और नैतिक पतन के विरुद्ध सुधार का प्रयास है। यह बदलाव हथियारों से नहीं, बल्कि जागरूकता से आता है और नारों से नहीं, बल्कि व्यवहार से पैदा होता है।
किसी भी समाज की प्रगति काफी हद तक उसकी परिवार व्यवस्था पर निर्भर करती है। आसान शादी मजबूत परिवारों को जन्म देती है, मजबूत परिवार स्थिर समाज की बुनियाद बनते हैं और स्थिर समाज विकास की राह आसान करता है। इसके विपरीत, शादी को अनावश्यक रूप से कठिन बनाना धीरे-धीरे समाज को कमजोर कर सकता है।
आत्ममंथन की जरूरत
आज हमें खुद से कुछ सवाल करने की जरूरत है: क्या हम शादी को आसान बना रहे हैं या मुश्किल? क्या हम सुन्नत को जीवित कर रहे हैं या रस्मों को? हमारे उपमहाद्वीप के समाज में खास तौर पर गुनाह आसान और निकाह मुश्किल क्यों होता जा रहा है? एक ओर दुश्मन की सांस्कृतिक आक्रामकता है, वहीं दूसरी ओर हम अपने बनाए हुए गलत मानदंडों के जरिए अनजाने में उसी दुश्मन के मौन हथियार और साधन बनकर अपनी नई पीढ़ी को नुकसान पहुंचाने में भूमिका निभा रहे हैं।
क्या हम प्रेम को प्राथमिकता दे रहे हैं या दिखावे को? यही सवाल बदलाव की शुरुआत का आधार बन सकते हैं।
निष्कर्ष
आसान शादी कोई मामूली या द्वितीयक मुद्दा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता है। शहीद रहबर आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई के विचार हमें बताते हैं कि सादगी अपनाना ऐसा कदम है, जो व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ समाज की दिशा को भी प्रभावित करता है।
जब हम अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) के आदर्श का अनुसरण करते हैं तो सुकून, बरकत और वास्तविक सफलता की राह पर आगे बढ़ते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम सादगी को अपना सिद्धांत बनाएं, आसानी को बढ़ावा दें और ऐसा समाज बनाएं जहां शादी बोझ नहीं, बल्कि रहमत हो; जहां प्रेम को प्राथमिकता मिले और दिखावा पीछे छूट जाए; जहां गुनाह मुश्किल और शादी आसान हो। यही वह बदलाव है जो हमारी युवा पीढ़ी को सुरक्षित रखने और उन्हें इमाम-ए-ज़माना (अज.) की निगाह में कामयाबी दिलाने की राह प्रशस्त कर सकता है।