Print this page

आयात ए ज़िंदगी । सही रास्ता मालूम है फ़िर भी उसे क्यो नही चुनते?

Rate this item
(0 votes)
आयात ए ज़िंदगी । सही रास्ता मालूम है फ़िर भी उसे क्यो नही चुनते?

कभी-कभी इंसान विकास और मार्गदर्शन का रास्ता देखता है, लेकिन उसे अपना रास्ता नहीं मानता। यानी समस्या केवल सही रास्ते को पहचानने की नहीं, बल्कि सच्चाई को अपने जीवन से जोड़ने की भी होती है।

 अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में फ़रमाता है:

«سَأَصْرِفُ عَنْ آيَاتِيَ الَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَإِنْ يَرَوْا كُلَّ آيَةٍ لَا يُؤْمِنُوا بِهَا وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الرُّشْدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الْغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِلِينَ.» (सूर ए आराफ़, आयत 146)

“जो लोग धरती में नाहक़ घमंड करते हैं, मैं उन्हें अपनी निशानियों से फेर दूँगा। वे ऐसी स्थिति में हैं कि यदि वे हर निशानी को देख लें, तब भी उस पर ईमान नहीं लाएँगे; यदि वे मार्गदर्शन का रास्ता देखें, तो उसे अपना रास्ता नहीं बनाएँगे और यदि वे गुमराही का रास्ता देखें, तो उसे अपना रास्ता बना लेंगे। यह इसलिए है कि उन्होंने हमारी निशानियों को झुठलाया और उनसे ग़ाफ़िल रहे।”

व्याख्या:

कभी-कभी इंसान सच्चाई को देखता और पहचानता है, लेकिन घमंड और ग़फ़लत के कारण उसे स्वीकार करने और उसके अनुसार चलने की क्षमता खो देता है। आयत में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है:

«وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الرُّشْدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا»

“यदि वे मार्गदर्शन का रास्ता देखें, तो उसे अपना रास्ता नहीं बनाते।”

इसके विपरीत:

«وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الْغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا»

“यदि वे गुमराही का रास्ता देखें, तो उसे अपना रास्ता बना लेते हैं।”

इसलिए समस्या सही रास्ते को देखने में असमर्थता नहीं, बल्कि सही रास्ते को चुनने में असमर्थता है।

इस आयत के अनुसार, नाहक़ घमंड, अल्लाह की निशानियों को लगातार झुठलाना और ग़फ़लत धीरे-धीरे इंसान के सोचने और निर्णय लेने के तरीके को बदल देते हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँच जाती है कि जब उसके सामने विकास और मार्गदर्शन का रास्ता स्पष्ट होता है, तब भी वह उससे मुंह मोड़ लेता है। वास्तव में, सच्चाई को पहचानने, उसे स्वीकार करने और उसके अनुसार अमल करने के बीच अंतर होता है।

इस आयत से एक महत्वपूर्ण बात यह भी समझ में आती है कि कभी-कभी इंसान मार्गदर्शन का रास्ता देखता है, लेकिन उसे अपना रास्ता नहीं मानता। यानी समस्या केवल सैद्धांतिक रूप से सही बात को पहचानने की नहीं, बल्कि उस सच्चाई को अपने जीवन का हिस्सा बनाने की होती है।

कितने ही लोग न्याय की बातें करते हैं, लेकिन जब उनके निजी हित सामने आते हैं तो न्याय को छोड़ देते हैं। वे विनम्रता की प्रशंसा करते हैं, लेकिन सत्य के सामने अपनी गलती स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते। वे मार्गदर्शन की बातें करते हैं, लेकिन जब मार्गदर्शन उनकी इच्छाओं के विरुद्ध होता है तो दूसरा रास्ता अपना लेते हैं। ऐसी स्थिति में इंसान सच्चाई को जान सकता है, लेकिन उसे स्वीकार नहीं करता; उसे देख सकता है, लेकिन चुनता नहीं; उसे सुन सकता है, लेकिन उसके सामने समर्पण नहीं करता।

इस दृष्टि से घमंड केवल एक बुरा नैतिक गुण नहीं है, बल्कि यह ज्ञान और सही निर्णय के रास्ते में भी पर्दा बन सकता है। घमंडी इंसान सच्चाई को तब तक स्वीकार करता है, जब तक वह उसके अहंकार से टकराती नहीं। लेकिन जब सच्चाई को स्वीकार करने के लिए स्वार्थ छोड़ना, अपनी गलती मानना, किसी दूसरे व्यक्ति की सही बात को स्वीकार करना या अपना रास्ता बदलना पड़े, तो उसका नफ़्स उसके सामने प्रतिरोध करने लगता है।

इसीलिए क़ुरआन यह नहीं कहता कि वे मार्गदर्शन का रास्ता देखते ही नहीं, बल्कि कहता है:

«لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا»

“वे उसे अपना रास्ता नहीं बनाते।”

दूसरी ओर, इस स्थिति का लगातार बने रहना इंसान की निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। जब भी इंसान किसी सच्चाई को पहचानकर जानबूझकर उससे मुंह मोड़ता है, तो अगली बार उससे मुंह मोड़ना उसके लिए आसान हो जाता है। इसी तरह, जब वह बार-बार अपने नफ़्स और घमंड के सामने झुकता है, तो सच्चाई के सामने झुकने से बचना उसके लिए आसान होता जाता है।

धीरे-धीरे जो चीज़ कभी उसे बुरी लगती थी, वह सामान्य लगने लगती है और जो बात कभी उसके लिए स्पष्ट और महत्वपूर्ण थी, उसका प्रभाव कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में इंसान न केवल मार्गदर्शन के रास्ते को छोड़ सकता है, बल्कि गुमराही के रास्ते को भी अपनी इच्छा और विश्वास के साथ चुनने लगता है:

«وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الْغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا»

“यदि वे गुमराही का रास्ता देखें, तो उसे अपना रास्ता बना लेते हैं।”

इस प्रकार, यह आयत इंसान के धीरे-धीरे सच्चाई से दूर होने के बारे में गंभीर चेतावनी देती है। गुमराही हमेशा खुले और अचानक इनकार से शुरू नहीं होती। कभी-कभी इसकी शुरुआत थोड़े से घमंड, थोड़ी-सी ग़फ़लत, किसी सच्चाई को स्वीकार न करने, उसका बहाना बनाने या अल्लाह के आदेश पर अपनी इच्छा को प्राथमिकता देने से होती है। यदि समय रहते सुधार न किया जाए तो धीरे-धीरे इंसान ऐसी स्थिति में पहुँच सकता है कि वह स्पष्ट से स्पष्ट निशानियों के सामने भी समर्पण न करे।

इसलिए इंसान को मार्गदर्शन के रास्ते पर बनाए रखने के लिए केवल ज्ञान और जानकारी बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ नफ़्स की पाकीज़गी, सच्चाई के सामने विनम्रता, दिल की निगरानी और सत्य को स्वीकार करने की तत्परता भी आवश्यक है।

Read 4 times