परमाणु शक्ति बनना अपने आप में कोई गौरव की बात नहीं है, लेकिन किसी राष्ट्र को उसके जायज़ वैज्ञानिक अधिकारों से वंचित रखना, उसकी तरक्की के रास्ते बंद करना और उसे दूसरों का मोहताज बनाने की कोशिश करना भी किसी सभ्य वैश्विक व्यवस्था की निशानी नहीं है। असल सवाल यह नहीं है कि ईरान परमाणु बम बनाए या नहीं, बल्कि यह है कि दुनिया की कुछ शक्तियाँ ईरान के वैज्ञानिक कार्यक्रम को लेकर इतनी संवेदनशील क्यों हैं कि उसके हर कदम को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर पेश करती हैं, जबकि स्वयं उनके पास हजारों विनाशकारी परमाणु हथियार मौजूद हैं?
लेखकः मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री
यह एक ऐसे राष्ट्र के संघर्ष और दृढ़ संकल्प की कहानी है, जो दबाव के सामने झुकने के बजाय अपने भविष्य का फैसला स्वयं करना चाहता है।
परमाणु शक्ति बनना अपने आप में कोई गौरव की बात नहीं है, लेकिन किसी राष्ट्र को उसके जायज़ वैज्ञानिक अधिकारों से वंचित रखना, उसकी तरक्की के रास्ते बंद करना और उसे दूसरों का मोहताज बनाने की कोशिश करना भी किसी सभ्य वैश्विक व्यवस्था की निशानी नहीं है। असल सवाल यह नहीं है कि ईरान परमाणु बम बनाए या नहीं, बल्कि यह है कि दुनिया की कुछ शक्तियाँ ईरान के वैज्ञानिक कार्यक्रम को लेकर इतनी संवेदनशील क्यों हैं कि उसके हर कदम को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर पेश करती हैं, जबकि स्वयं उनके पास हजारों विनाशकारी परमाणु हथियार मौजूद हैं?
क्या वास्तव में अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता का मुख्य कारण परमाणु हथियारों का प्रसार है, या इसके पीछे एक ऐसे राष्ट्र की संप्रभुता, वैज्ञानिक प्रगति और राजनीतिक स्वतंत्रता का भय भी है, जो पश्चिमी दबाव के बावजूद अपना रास्ता स्वयं चुनने पर अड़ा हुआ है?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए ज़रूरी है कि ईरान के मामले को केवल परमाणु तकनीक की बहस तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे वैश्विक शक्ति-संतुलन, उपनिवेशवाद के इतिहास, आर्थिक हितों और विकासशील देशों के भविष्य के संदर्भ में भी देखा जाए।
ईरान का असली अपराध क्या है?
ईरान का मूल रुख हमेशा यह रहा है कि उसे शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक हासिल करने और वैज्ञानिक प्रगति करने का अधिकार है। यह अधिकार केवल ईरान का दावा नहीं है, बल्कि परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत इसके सदस्य देशों को संबंधित प्रावधानों और सुरक्षा उपायों के अधीन शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के अनुसंधान, उत्पादन और उपयोग का अधिकार प्राप्त है।
इस अधिकार और परमाणु हथियार बनाने के बीच स्पष्ट अंतर है। किसी देश के पास यूरेनियम संवर्धन की क्षमता होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसने परमाणु बम बनाने का फैसला कर लिया है। इसी तरह शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को लेकर उठने वाले सवालों को नज़रअंदाज़ करना भी उचित नहीं है। किसी कार्यक्रम की प्रकृति और संबंधित अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का निर्धारण आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणों, निगरानी और सत्यापित की जा सकने वाली जानकारियों के आधार पर होना चाहिए।
यहाँ ईरान के रुख की महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपनी वैज्ञानिक संप्रभुता को बाहरी शक्तियों की असीमित अनुमति पर निर्भर करने के लिए तैयार नहीं है। वह इस सिद्धांत का समर्थन करता है कि विकासशील देश भी आधुनिक विज्ञान, ऊर्जा, चिकित्सा और उद्योग के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं। उन्हें केवल इसलिए पीछे नहीं रखा जा सकता कि उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएँ वाशिंगटन या किसी अन्य राजधानी की नीतियों से मेल नहीं खातीं।
यहाँ एक बुनियादी सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन आवश्यक है, लेकिन उन समझौतों को किसी राष्ट्र की वैज्ञानिक प्रगति रोकने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम के प्रत्येक पहलू की जाँच प्रमाणों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के आधार पर की जा सकती है, लेकिन किसी देश को आधुनिक तकनीक से वंचित रखने की कोशिश को केवल विश्व शांति के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
उपनिवेशवाद अब केवल सेनाओं के माध्यम से नहीं आता
उपनिवेशवाद के पुराने दौर में सेनाएँ आती थीं, ज़मीनों पर कब्ज़ा किया जाता था, संसाधनों को लूटा जाता था और स्थानीय आबादी को अधीन बना लिया जाता था। लेकिन आधुनिक दुनिया में प्रभुत्व स्थापित करने के तरीके कहीं अधिक जटिल हो गए हैं।
अब किसी देश पर सीधे कब्ज़ा किए बिना भी उसे आर्थिक प्रतिबंधों, तकनीक की आपूर्ति पर रोक, वित्तीय व्यवस्था तक सीमित पहुँच, व्यापारिक दबाव और राजनीतिक अलगाव के माध्यम से कमज़ोर रखा जा सकता है।
यहाँ एक अंतर समझना ज़रूरी है। प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध या व्यापारिक नियम अनिवार्य रूप से कोई औपनिवेशिक योजना नहीं होता। कुछ प्रतिबंध विशेष कानूनी या सुरक्षा संबंधी चिंताओं के आधार पर भी लगाए जाते हैं। लेकिन जब आर्थिक दबाव व्यापक स्तर पर आम नागरिकों के जीवन, औद्योगिक विकास और बुनियादी आवश्यकताओं को प्रभावित करने लगे या तकनीकी सहयोग को राजनीतिक वफादारी से जोड़ दिया जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वैश्विक शक्ति के साधनों का इस्तेमाल दूसरों की तरक्की रोकने के लिए किया जा रहा है?
विकासशील दुनिया के अनेक देशों ने औपनिवेशिक शासन समाप्त होने के बाद भी ऐसी परिस्थितियों का सामना किया है, जिनमें उनकी अर्थव्यवस्थाएँ कच्चा माल निर्यात करने और तैयार माल आयात करने तक सीमित रह गईं। तकनीक, पूँजी, औद्योगिक मशीनरी और उच्चस्तरीय अनुसंधान के लिए उन्हें विदेशी देशों पर निर्भर रहना पड़ा।
इस निर्भरता के परिणाम केवल व्यापार घाटे तक सीमित नहीं रहते। जब किसी देश के पास अपनी तकनीक, औद्योगिक आधार और अनुसंधान के पर्याप्त संसाधन नहीं होते, तो उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता भी कई बार आर्थिक मजबूरियों के सामने कमज़ोर पड़ जाती है।
ऐसे माहौल में ईरान के आत्मनिर्भर बनने के प्रयासों को व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए। ईरान का महत्व केवल उसके परमाणु कार्यक्रम में नहीं, बल्कि इस प्रयास में भी है कि वह प्रतिबंधों के बावजूद अपनी वैज्ञानिक, औद्योगिक और रक्षा क्षमताओं को बनाए रखे तथा बाहरी दबाव के सामने अपने फैसले स्वयं लेने का अधिकार सुरक्षित रखे।
जो राष्ट्र अपने लिए ज्ञान और तकनीक विकसित नहीं करता, उसे अक्सर दूसरों से ज्ञान खरीदना पड़ता है। और जो राष्ट्र अपनी प्रत्येक महत्वपूर्ण आवश्यकता के लिए दूसरों पर निर्भर हो, उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता भी लगातार दबाव में रह सकती है।
विकासशील देशों को इसी वास्तविकता को समझने की आवश्यकता है।
क्या पश्चिमी शक्तियाँ नहीं चाहतीं कि एशियाई और अफ्रीकी देश तरक्की करें?
इस सवाल का जवाब भावनात्मक सामान्यीकरण के बजाय ऐतिहासिक और आर्थिक विश्लेषण के आधार पर दिया जाना चाहिए।
यह कहना उचित नहीं होगा कि अमेरिका या प्रत्येक पश्चिमी देश का हर कदम केवल इस उद्देश्य से उठाया जाता है कि एशियाई और अफ्रीकी देश तरक्की न कर सकें। इन देशों के साथ व्यापार, शिक्षा, निवेश और वैज्ञानिक सहयोग के अनेक उदाहरण भी मौजूद हैं। स्वयं पश्चिमी समाजों में ऐसे संस्थान, शोधकर्ता और राजनीतिक समूह हैं, जो विकासशील देशों की प्रगति का समर्थन करते हैं।
लेकिन यह भी एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि औपनिवेशिक व्यवस्था ने एशिया और अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों की अर्थव्यवस्थाओं को औपनिवेशिक शक्तियों के हितों के अनुसार ढाला। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, स्थानीय उद्योगों को कमज़ोर करना और वैश्विक व्यापार में असमान स्थिति ने इन क्षेत्रों के विकास पर लंबे समय तक प्रभाव डाला।
औपनिवेशिक शासन समाप्त होने के बाद भी कुछ आर्थिक और राजनीतिक संबंधों में शक्ति का असंतुलन बना रहा। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को वित्तीय संस्थानों, वैश्विक बाज़ारों, आधुनिक तकनीक और निवेश के साधनों तक अपेक्षाकृत अधिक पहुँच प्राप्त रही, जबकि कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं को अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा।
इसलिए मूल सवाल यह नहीं है कि पश्चिम कभी किसी विकासशील देश की सहायता करता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वैश्विक आर्थिक व्यवस्था विकासशील देशों को अपना औद्योगिक आधार, अनुसंधान क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता विकसित करने के समान अवसर प्रदान करती है?
यदि किसी देश को आधुनिक तकनीक तक पहुँच बनाने के लिए लगातार राजनीतिक शर्तें स्वीकार करनी पड़ें, यदि उसका औद्योगिक विकास बाहरी प्रतिबंधों पर निर्भर हो और यदि उसके अपने संसाधनों से होने वाली आय भी वैश्विक वित्तीय दबाव के कारण सीमित हो जाए, तो उसकी संप्रभुता का वास्तविक अर्थ कमज़ोर पड़ सकता है।
ईरान के मामले में यह सवाल विशेष महत्व रखता है।
ईरानी नेतृत्व का मूल आग्रह यही रहा है कि देश को अपनी वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति के लिए दूसरे देशों की राजनीतिक मंज़ूरी का मोहताज नहीं होना चाहिए। इस रुख को केवल पश्चिम-विरोधी कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन इसके पीछे मौजूद राष्ट्रीय संप्रभुता और तकनीकी आत्मनिर्भरता के सवालों को नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं है।
ईरान की असली ताकत: धैर्य, साहस और दृढ़ संकल्प
ईरान के मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू उसकी लंबे समय से चली आ रही दृढ़ता है।
कई दशकों से ईरान आर्थिक प्रतिबंधों, कूटनीतिक दबाव, क्षेत्रीय तनाव और सैन्य खतरों का सामना करता रहा है। इन परिस्थितियों ने ईरान की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के जीवन पर वास्तविक बोझ डाला है। इसके बावजूद ईरान ने अपने वैज्ञानिक, शैक्षणिक, औद्योगिक और रक्षा कार्यक्रमों को जारी रखने तथा अनेक क्षेत्रों में स्थानीय क्षमताएँ विकसित करने के प्रयास किए हैं।
किसी राष्ट्र की ताकत का आकलन केवल उसके हथियारों या सैन्य बजट से नहीं किया जाता। उसकी एक महत्वपूर्ण पहचान यह भी है कि वह लगातार दबाव के बावजूद अपने बुनियादी संस्थानों, वैज्ञानिक क्षमताओं और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को किस हद तक बनाए रख सकता है।
ईरान के इस संघर्ष में कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन पर ध्यान देना आवश्यक है।
उसने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि आर्थिक प्रतिबंध किसी राष्ट्र के ज्ञान प्राप्त करने, अपने उद्योगों को विकसित करने और वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के संकल्प को अनिवार्य रूप से समाप्त नहीं कर सकते। उसने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और परमाणु संप्रभुता से जुड़े मामलों को केवल बाहरी दबाव के हवाले करने से इनकार किया है।
यह दृढ़ता अपने आप में ध्यान देने योग्य है। हालाँकि, इसके साथ यह वास्तविकता भी स्वीकार करनी चाहिए कि प्रतिबंधों की कीमत ईरानी जनता ने भी चुकाई है। आर्थिक कठिनाइयों, महँगाई और व्यापारिक बाधाओं ने आम नागरिकों को प्रभावित किया है। किसी भी राष्ट्रीय नीति की सफलता का आकलन करते समय जनता के कल्याण को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
ईरान की वास्तविक सफलता उस समय और अधिक स्पष्ट होगी, जब वह अपनी वैज्ञानिक और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को आम नागरिकों की खुशहाली, आर्थिक स्थिरता और बेहतर जीवन स्तर में भी बदल सकेगा।
धैर्य का अर्थ केवल कठिनाइयों को सहन करना नहीं है। धैर्य का उच्चतम स्तर यह है कि कोई राष्ट्र मुश्किलों के बावजूद अपने उद्देश्य, विवेक और अपने भविष्य के प्रति जागरूकता को जीवित रखे।
ईरान के संघर्ष को इसी कसौटी पर देखा जाना चाहिए।
अमेरिका के लिए समस्या केवल परमाणु बम नहीं, बल्कि बदलता हुआ शक्ति संतुलन भी है
यह कहना कि अमेरिका और उसके सहयोगियों को ईरान के परमाणु हथियारों से कोई खतरा नहीं है, एक ऐसा दावा होगा जिसके लिए प्रमाण आवश्यक हैं। यदि किसी देश के परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल करने की आशंका हो, तो उससे संबंधित वास्तविक सुरक्षा संबंधी सवाल उठ सकते हैं। किसी भी देश की सरकार अपने नागरिकों और सहयोगियों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त कर सकती है।
लेकिन इस मामले का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।
ईरान का महत्व केवल उसके परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। ऊर्जा संसाधनों, भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रीय प्रभाव, वैज्ञानिक क्षमता और औद्योगिक आत्मनिर्भरता के प्रयासों के कारण भी उसका विशेष महत्व है। उसका विकास मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है और उसे अंतरराष्ट्रीय मामलों में अधिक स्वतंत्रता के साथ फैसले लेने की क्षमता प्रदान कर सकता है।
यह संभावना मौजूद है कि ईरान को लेकर कुछ पश्चिमी नीति-निर्माताओं की चिंता केवल परमाणु अप्रसार तक सीमित न हो, बल्कि उसमें क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, अमेरिकी प्रभाव और ईरान की बढ़ती संप्रभुता से जुड़े सवाल भी शामिल हों।
यह एक विश्लेषणात्मक संभावना है, जिसकी जाँच विशिष्ट नीतियों, सरकारी बयानों और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर की जानी चाहिए। इसे पश्चिम के प्रत्येक कदम के पीछे एकमात्र और सिद्ध उद्देश्य मानना उचित नहीं होगा।
हालाँकि, एक सवाल ज़रूर उठता है कि यदि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और सत्यापित सीमाओं के भीतर हो, तब भी क्या अमेरिका और ईरान के बीच सभी बुनियादी मतभेद समाप्त हो जाएँगे?
संभवतः नहीं, क्योंकि दोनों देशों के बीच मतभेदों में क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंध, राजनीतिक प्रभाव, इज़राइल, ऊर्जा और मध्य पूर्व के भविष्य जैसे अनेक मुद्दे शामिल हैं।
यह वास्तविकता इस बहस को और व्यापक बनाती है। ईरान और अमेरिका के विवाद को केवल परमाणु बम के सवाल तक सीमित कर देना उसके राजनीतिक और ऐतिहासिक कारणों की अनदेखी करने के समान होगा।
तकनीकी स्वतंत्रता: ईरान की सबसे बड़ी परीक्षा
किसी भी राष्ट्र के लिए आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में प्रगति केवल आर्थिक सफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण साधन भी है।
जो देश अपनी दवाइयाँ बना सकता हो, अपनी औद्योगिक मशीनरी तैयार कर सकता हो, अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा स्वयं पूरा कर सकता हो और आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान में भाग ले सकता हो, उसकी वैश्विक बाज़ार में स्थिति अपेक्षाकृत मज़बूत होती है।
इसके विपरीत, जो देश अपनी बुनियादी औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए भी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर हो, उसे कीमतों में उतार-चढ़ाव, निर्यात प्रतिबंधों, राजनीतिक दबाव और वैश्विक संकटों का अधिक सामना करना पड़ सकता है।
ईरान ने प्रतिबंधों के माहौल में कुछ क्षेत्रों में स्थानीय क्षमताएँ विकसित करने का प्रयास किया है। इस अनुभव से विकासशील देशों को एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है कि राष्ट्रीय विकास का स्थायी रास्ता केवल विदेशी निवेश या तैयार उत्पादों के आयात से नहीं बनता। इसके लिए शिक्षा, अनुसंधान, स्थानीय उद्योग, कौशल विकास, संस्थागत पारदर्शिता और दीर्घकालिक निवेश आवश्यक हैं।
हालाँकि, आत्मनिर्भरता का अर्थ यह भी नहीं है कि हर वस्तु देश के भीतर ही बनाई जाए या अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बचा जाए। आधुनिक विज्ञान का विकास अक्सर अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान, ज्ञान के आदान-प्रदान और संयुक्त परियोजनाओं के माध्यम से तेज़ होता है।
वास्तविक उद्देश्य यह होना चाहिए कि विदेशी सहयोग विकास का माध्यम बने, स्थायी निर्भरता का नहीं।
ईरान के संप्रभुता संबंधी संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण और उचित पक्ष यही है कि वह अपने देश की वैज्ञानिक और औद्योगिक बुनियाद को मज़बूत बनाने का प्रयास कर रहा है।
यदि किसी राष्ट्र को अपनी क्षमताएँ बढ़ाने के कारण आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव या सैन्य धमकियों का सामना करना पड़े, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसी नीतियों के औचित्य और परिणामों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
इराक और लीबिया से सबक: वादों से अधिक ज़रूरी हैं सुरक्षा की गारंटियाँ
ईरान की चिंताओं को समझने के लिए इराक और लीबिया का इतिहास महत्वपूर्ण है, हालाँकि दोनों देशों की परिस्थितियाँ ईरान से अलग थीं।
वर्ष 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हमला किया गया। इस हमले के प्रमुख आधारों में व्यापक विनाश के हथियारों का खतरा भी शामिल था। बाद में वे सक्रिय हथियार भंडार नहीं मिले, जिनके आधार पर युद्ध को उचित ठहराया गया था।
लीबिया ने वर्ष 2003 में अपने गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम को समाप्त करने की घोषणा की थी। लेकिन वर्ष 2011 में आंतरिक विद्रोह और गृहयुद्ध के दौरान नाटो के सैन्य हस्तक्षेप ने मुअम्मर गद्दाफी की सरकार के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इन घटनाओं से यह साबित नहीं होता कि परमाणु हथियार रखने से प्रत्येक देश सुरक्षित हो जाता है या इन हथियारों को छोड़ना ही किसी सरकार के पतन का कारण बनता है। लेकिन इन घटनाओं से यह सवाल ज़रूर उठता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय वादे और कूटनीतिक समझौते किसी देश की सुरक्षा के लिए पर्याप्त हैं, यदि उनके साथ भरोसेमंद गारंटियाँ मौजूद न हों?
ईरान के दृष्टिकोण से यह सवाल केवल सैद्धांतिक नहीं है। यदि किसी देश को यह महसूस हो कि वह अपनी रक्षा क्षमता के संबंध में रियायतें दे सकता है, लेकिन इसके बावजूद उसकी संप्रभुता पर सैन्य खतरे बने रहेंगे, तो अपने रक्षा संबंधी फैसलों पर पुनर्विचार करना उसकी एक समझ में आने वाली राजनीतिक प्रतिक्रिया हो सकती है।
यहाँ वैश्विक शक्तियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यदि वे परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना चाहती हैं, तो उन्हें ऐसी कूटनीति अपनानी चाहिए, जो केवल एकतरफा माँगों पर आधारित न हो, बल्कि आपसी जिम्मेदारियों, समझौतों के पालन और भरोसेमंद सुरक्षा गारंटियों पर टिकी हो।
ईरान के धैर्य का वास्तविक अर्थ
ईरान के रवैये की सराहना करते समय एक महत्वपूर्ण अंतर को ध्यान में रखना चाहिए। धैर्य का अर्थ प्रत्येक कदम पर खामोश रहना नहीं है और न ही अपनी संप्रभुता से समझौता कर लेना है।
एक जिम्मेदार राष्ट्र को अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है। लेकिन जिम्मेदारी की माँग यह भी है कि वह संकट को ऐसे मोड़ पर न ले जाए, जहाँ गलतफहमी, उकसावे या जल्दबाज़ी के कारण पूरा क्षेत्र विनाशकारी संघर्ष की ओर बढ़ जाए।
ईरान की नीति का सराहनीय पक्ष वहाँ सामने आता है, जहाँ वह अपने राष्ट्रीय अधिकारों पर अडिग रहते हुए कूटनीतिक संभावनाओं को पूरी तरह समाप्त करने से बचे, अपनी रक्षा क्षमता बनाए रखे और अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए व्यावहारिक रास्ते खुले रखे।