رضوی

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ईरान इस्लामिक गणराज्य में दस दिवसीय फ़ज्र समारोह की शुरुआत हो गई है। ये समारोह इस्लामिक गणराज्य ईरान के संस्थापक इमाम खुमैनी की मातृभूमि पर वापसी और इस्लामी क्रांति की सफलता की चवालिस्वीं वर्षगांठ के मौके पर पूरे देश में आयोजित किए जाते हैं।

ईरान इस्लामिक गणराज्य में दस दिवसीय फ़ज्र समारोह की शुरुआत हो गई है। ये समारोह इस्लामिक गणराज्य ईरान के संस्थापक इमाम खुमैनी की मातृभूमि पर वापसी और इस्लामी क्रांति की सफलता की चवालिस्वीं वर्षगांठ के मौके पर पूरे देश में आयोजित किए जाते हैं। अशरा ए फ़ज्र के पहले दिन से पूरे देश के स्कूलों में घंटी बजाई गई।

फ़ज्र समारोह की शुरुआत के मौके पर, इस्लामिक क्रांति के नेता आयतुल्लाह सय्यद अली खामेनेई ने इमाम खुमैनी के मज़ार पर नमाज अदा की।

फ़ज्र समारोह की शुरुआत के अवसर पर अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे, जिनमें तेहरान के महराबाद हवाई अड्डे से ऐतिहासिक बहेश्ते ज़हरा कब्रिस्तान तक, इमाम खुमैनी की वापसी के मार्ग पर हेलीकॉप्टरों द्वारा फूलों की वर्षा, सशस्त्र बलों की मोटरसाइकिल परेड और इमाम खुमैनी की मज़ार में विशेष कार्यक्रम प्रमुख रूप से शामिल हैं।

इस्लामी क्रांति की सफलता के जश्न और इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम खुमैनी की मातृभूमि पर वापसी के अवसर पर पूरे देश में विभिन्न रंग-बिरंगे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें खलीज फारस में समुद्री जहाजों के हार्न बजाना भी शामिल है।

28 रजब को इमाम हुसैन अ.स. ने मदीने से हिजरत की, और पूरी दुनिया वालों के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का खुला संदेश था यज़ीद की बैय्यत से इनकार और दीने खुदा की सुरक्षा करना,

28 रजब को इमाम हुसैन अ.स. ने मदीने से हिजरत की, और पूरी दुनिया वालों के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का खुला संदेश था यज़ीद की बैय्यत से इनकार और दीने खुदा की सुरक्षा करना,

इब्ने ज़ुबैर ने कहा कि इस समय वलीद के दरबार में जाना आपके लिए ख़तरनाक हो सकता है، इमाम ने कहा कि में जाऊँगा तो ज़रूर लेकिन अपनी सुरक्षा का इंतेज़ाम करके वलीद से मिलूँगा खुद अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रातों रात मदीने से मक्के की तरफ फरार कर गए।

मुआविया जहन्नम रसीद हुआ तो मदीने में बनी उमय्या के गवर्नर वलीद ने इमाम हुसैन (अ.स.) को संदेश भेजा कि वह दरबार में आयें उनके लिए यज़ीद का एक ज़रूरी पैग़ाम है। इमाम हुसैन (अ.स.) उस समय इब्ने ज़ुबैर के साथ मस्जिद-ए-नबवी में बैठे थे।

जब यह संदेश आया तो इमाम से इब्ने ज़ुबैर ने कहा कि इस समय इस तरह का पैग़ाम आने का मतलब क्या हो सकता है? इमाम हुसैन (अ.स.) ने कहा कि लगता है कि मुआविया की मौत हो गई है और शायद यज़ीद की बैअत के लिए वलीद ने हमें बुलाया है। इब्ने ज़ुबैर ने कहा कि इस समय वलीद के दरबार में जाना आपके लिए ख़तरनाक हो सकता है। इमाम ने कहा कि में जाऊँगा तो ज़रूर लेकिन अपनी सुरक्षा का इंतेज़ाम करके वलीद से मिलूँगा। खुद अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रातों रात मदीने से मक्के की तरफ फरार कर गए।

इमाम बनी हाशिम के जवानों को लेकर वलीद के दरबार में पहुँच गए। लेकिन अपने साथ आये बनी हाशिम के जवानों से कहा कि वह लोग बाहर ही ठहरे और अगर इमाम की आवाज़ बुलंद हो तो अन्दर आ जाएँ।

इमाम वलीद के दरबार में पहुँचे तो उस समय वलीद के साथ बनी उमय्या का अहम् सरदार और रसूलो अहले बैते रसूल का बदतरीन दुश्मन मरवान भी बैठा हुआ था। इमाम हुसैन (अ.स.) तशरीफ़ लाए तो वलीद ने मुआविया की मौत कि ख़बर देने के बाद यज़ीद की बैअत के लिए कहा। इमाम हुसैन (अ.स.) ने यज़ीद की बैअत करने से साफ़ इनकार कर दिया और वापस जाने लगे तो पास बैठे हुए मरवान ने कहा कि अगर तूने इस वक़्त हुसैन को जाने दिया तो फिर ऐसा मौक़ा नहीं मिलेगा यही अच्छा होगा कि इनको गिरफ़्तार करके बैअत ले ले या फिर क़त्ल कर के इनका सर यज़ीद के पास भेज दे।

यह सुनकर इमाम हुसैन (अ.स.) को जलाल आ गया और आपने बुलंद आवाज़ में फ़रमाया “भला तेरी या वलीद कि यह मजाल कि मुझे क़त्ल कर सकें?” इमाम हुसैन (अ.स.) की आवाज़ बुलंद होते ही उनके छोटे भाई हज़रत अब्बास के नेतृत्व मैं बनी हाशिम के जवान तलवारें उठाये दरबार में दाखिल हो गए लेकिन इमाम ने इन नौजवानों को सब्र की तलक़ीन की और घर वापस आ कर मदीना छोड़ने के बारे मैं मशविरा करने लगे।

बनी हाशिम के मोहल्ले मैं इस खबर से शोक का माहौल छा गया। इमाम हुसैन (अ.स.) अपने खानदान के साथ मदीना छोड़ कर मक्का की ओर हिजरत कर गए जहाँ आप लगभग साढ़े चार महीने खाना ए काबा के नज़दीक रहे लेकिन हज का ज़माना आते ही इमाम को खबर मिली कि यज़ीद ने हाजियों के लिबास में क़ातिलों का एक ग्रुप भेजा है जो इमाम को हज के दौरान क़त्ल करने की नीयत से आया है। वैसे तो हज के दौरान हथियार रखना हराम है और एक चींटी को भी मार दिया जाए तो इंसान पर कफ्फ़ारा लाज़िम हो जाता है लेकिन यज़ीद और बनी उमय्या के लिए इस्लामी उसूल या काएदे कानून क्या मायने रखते थे?

जिस वक़्त पूरा आलमे इस्लाम सिमट कर मक्का की तरफ आ रहा था इमामे हुसैन ने हुरमते काबा बचाने के लिए हज को उमरह में बदल कर मक्का से कर्बला की तरफ हिजरत का फैसला किया।

 

शाबाना हज़रत रसूल्लाह (स) का महीना है इस महीने उनके प्यारो का जन्म हुआ।

शाबान का महीना हिजरी कैलेंडर का आठवां महीना है और यह महीना रहमतुन लिल आलमीन, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (अ) से जुड़ा हुआ है। जैसा कि खुद रसूल अल्लाह (स) ने फ़रमाया: "रजब अल्लाह का महीना है, शाबान मेरा महीना है और रमजान मेरी उम्मत का महीना है।" इसके अलावा उन्होंने यह भी फरमाया: "शाबान मेरा महीना है, अल्लाह उस बंदे पर रहमत नाज़िल करे जो इस महीने में मेरी मदद करेगा, जो कोई भी इस महीने में एक रोज़ा रखेगा, उस पर जन्नत वाजिब हो जाएगी।" रसूल अल्लाह (स) ने एक और जगह पर कहा: "शाबान वह महीना है जिसमें अमाल (अच्छे कार्य) क़ुबूल होते हैं जबकि लोग इससे गाफिल होते हैं।" अमीरुल मोमिनीन, इमाम अली (अ) ने फरमाया: "शाबान रसूल अल्लाह (स) का महीना है।"

कुछ हदीसों में शाबान को महीनों का सरदार भी कहा गया है। इमाम जाफर सादिक़ (अ) से रिवायत है कि जब शाबान का चाँद आसान पर नज़र आता तो इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ) अपने साथियों को इकट्ठा करते और कहते थे: "क्या तुम जानते हो कि यह कौन सा महीना है?" यह महीना शाबान है। रसूल अल्लाह (स) ने फ़रमाया कि यह मेरा महीना है। इसलिए रसूल अल्लाह (स) की मोहब्बत और अल्लाह के करीब होने के लिए इस महीने में रोज़ा रखो। उस अल्लाह की क़सम! जिसके हाथ में अली बिन हुसैन की जान है, मैंने अपने वालिद इमाम हुसैन (अ) से सुना कि अमीरुल मोमिनीन (अ) ने फ़रमाया: "जो भी शाबान के महीने में रसूल अल्लाह (स) की मोहब्बत और अल्लाह के करीब होने के लिए रोज़ा रखेगा, वह अल्लाह का महबूब होगा, क़यामत के दिन अल्लाह की करामत उसके साथ होगी और जन्नत उसके ऊपर वाजिब हो जाएगी।"

सफ़वान जमाल से रिवायत है कि इमाम जाफर सादिक़ (अ) हमें हुक्म देते थे कि अपने आस-पास के लोगों को शाबान में रोज़ा रखने के लिए तैयार करो। हमने उनसे पूछा, "क्या आप इस महीने की फ़ज़ीलत बयान करें?" तो इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमाया: "जब शाबान का महीना शुरू होता तो रसूल अल्लाह (स) मदीना में पुकारने वाले को हुक्म देते कि वह ऐ मदीना वालो! जान लो, यह महीना मेरा महीना है। अल्लाह उस बंदे पर रहमत नाज़िल करे जो इस महीने में मेरी मदद करेगा, यानी रोज़ा रखे।" अमीरुल मोमिनीन (अ) ने कहा: "जब से मैंने रसूल अल्लाह (स) के पुकारने की आवाज़ सुनी है, मैंने शाबान में रोज़ा कभी नहीं छोड़ा। इंशा अल्लाह, जीवन भर शाबान के रोज़े नहीं छोड़ूँगा।"

शाबान रसूल अल्लाह (स) का महीना है, इस महीने में रसूल अल्लाह (स) के चाहने वालों की विलादत हुई।

3 शाबान 5 हिजरी को रसूल अल्लाह (स) के प्यारे नवासे इंसानियत के महान नेता इमाम हुसैन (अ) का जन्म हुआ, जिन्होंने इस्लाम की रक्षा के लिए महान कुर्बानियाँ दीं और रसूल अल्लाह (स) की हदीस "मैं हुसैन से हूँ" की व्याख्या की।

4 शाबान 26 हिजरी को अल्लाह के मुखलिस बंदे और रसूल अल्लाह (स) के मुतीअ खालिस हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) का जन्म हुआ। जिनकी तमन्ना रसूल अल्लाह (स) के नफ़्स अमीरुल मोमीन अली इब्न अबि तालिब (अ) ने की, बिन्ते रसूल हज़रत ज़हरा (स) ने जिन्हे अपना बेटा कहा, इमाम हुसैन (अ) ने जिन्हे अपनी सेना का सेनापति बनाया, हज़रत अब्बास (अ) ने दीन की नुसरत मे अपनी दोनो भुजाए क़ुरबान कर दी रिवायत के अनुसार आपकी यही दोनो भुजाए उम्मत की शफ़ाअत का माध्यम बनेगी।

5 शाबान 38 हिजरी को इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ) का जन्म हुआ।

11 शाबान को शबीह-ए-रसूल (स) और मोअज़्ज़िन-ए-सुब्ह-ए-आशूरा हज़रत अली अकबर (अ) का जन्म हुआ।

15 शाबान 255 हिजरी को मुंज़ी-ए-आलम-ए-बशरियत, क़ुत्ब-ए-आलम-ए-इमकान, लंगर-ए-ज़मीन-ओ-आसमां, साहिब-ए-ज़माना, ख़ातम-ए-औसिया इमाम महदी (अ) का जन्म हुआ और उसी दिन 329 हिजरी को उनके आख़िरी नाइब ख़ास हज़रत अली बिन मुहम्मद समरी (अ) का निधन हुआ।

18 शाबान 326 हिजरी को इमाम महदी (अ) के तीसरे नाइब ख़ास हज़रत हुसैन बिन रूह नुबख़ती (र) का निधन हुआ, जिनके ज़रिए मोमेनीन अपने मौला और आका इमाम ज़माना (अ) के पास दुआ भेजते थे।

शाबान महीने के आमाल:

रोज़ा रखना।

सलवात पढ़ना।

सदक़ा देना।

मुनाजात शाबानिया पढ़ना।

रोज़ाना 70 बार  "असतग़फिरुल्लाह व असअलुहुत तौबा" पढ़ना।

रोज़ाना 70 बार "असतग़फिरुल लाहिल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवर्रहमानुर्रहीमुलहय्युलक़य्यूमू व अतूबू इलैही" पढ़ना।

जुमेरात की खास नमाज़।

सलवात शाबानिया पढ़ना।

"ख़ुदाया! इमाम ज़माना अ.ज.अ. के ज़ुहूर में ताजील फ़रमा। आमीन।"

28 रजब को इमाम हुसैन अ.स. ने मदीने से हिजरत की, और पूरी दुनिया वालों के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का खुला संदेश था यज़ीद की बैय्यत से इनकार और दीने खुदा की सुरक्षा करना।

28 रजब को इमाम हुसैन अ.स. ने मदीने से हिजरत की और पूरी दुनिया वालों के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का खुला संदेश था यज़ीद की बैय्यत से इनकार और दीने खुदा की सुरक्षा करना,

इब्ने ज़ुबैर ने कहा कि इस समय वलीद के दरबार में जाना आपके लिए ख़तरनाक हो सकता है، इमाम ने कहा कि में जाऊँगा तो ज़रूर लेकिन अपनी सुरक्षा का इंतेज़ाम करके वलीद से मिलूँगा खुद अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रातों रात मदीने से मक्के की तरफ फरार कर गए।

मुआविया जहन्नम रसीद हुआ तो मदीने में बनी उमय्या के गवर्नर वलीद ने इमाम हुसैन (अ.स.) को संदेश भेजा कि वह दरबार में आयें उनके लिए यज़ीद का एक ज़रूरी पैग़ाम है। इमाम हुसैन (अ.स.) उस समय इब्ने ज़ुबैर के साथ मस्जिद-ए-नबवी में बैठे थे।

जब यह संदेश आया तो इमाम से इब्ने ज़ुबैर ने कहा कि इस समय इस तरह का पैग़ाम आने का मतलब क्या हो सकता है? इमाम हुसैन (अ.स.) ने कहा कि लगता है कि मुआविया की मौत हो गई है और शायद यज़ीद की बैअत के लिए वलीद ने हमें बुलाया है।

इब्ने ज़ुबैर ने कहा कि इस समय वलीद के दरबार में जाना आपके लिए ख़तरनाक हो सकता है। इमाम ने कहा कि में जाऊँगा तो ज़रूर लेकिन अपनी सुरक्षा का इंतेज़ाम करके वलीद से मिलूँगा। खुद अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रातों रात मदीने से मक्के की तरफ फरार कर गए।

इमाम बनी हाशिम के जवानों को लेकर वलीद के दरबार में पहुँच गए। लेकिन अपने साथ आये बनी हाशिम के जवानों से कहा कि वह लोग बाहर ही ठहरे और अगर इमाम की आवाज़ बुलंद हो तो अन्दर आ जाएँ।

इमाम वलीद के दरबार में पहुँचे तो उस समय वलीद के साथ बनी उमय्या का अहम् सरदार और रसूलो अहले बैते रसूल का बदतरीन दुश्मन मरवान भी बैठा हुआ था। इमाम हुसैन (अ.स.) तशरीफ़ लाए तो वलीद ने मुआविया की मौत कि ख़बर देने के बाद यज़ीद की बैअत के लिए कहा। इमाम हुसैन (अ.स.) ने यज़ीद की बैअत करने से साफ़ इनकार कर दिया और वापस जाने लगे तो पास बैठे हुए मरवान ने कहा कि अगर तूने इस वक़्त हुसैन को जाने दिया तो फिर ऐसा मौक़ा नहीं मिलेगा यही अच्छा होगा कि इनको गिरफ़्तार करके बैअत ले ले या फिर क़त्ल कर के इनका सर यज़ीद के पास भेज दे।

यह सुनकर इमाम हुसैन (अ.स.) को जलाल आ गया और आपने बुलंद आवाज़ में फ़रमाया “भला तेरी या वलीद कि यह मजाल कि मुझे क़त्ल कर सकें?” इमाम हुसैन (अ.स.) की आवाज़ बुलंद होते ही उनके छोटे भाई हज़रत अब्बास के नेतृत्व मैं बनी हाशिम के जवान तलवारें उठाये दरबार में दाखिल हो गए लेकिन इमाम ने इन नौजवानों को सब्र की तलक़ीन की और घर वापस आ कर मदीना छोड़ने के बारे मैं मशविरा करने लगे।

बनी हाशिम के मोहल्ले मैं इस खबर से शोक का माहौल छा गया। इमाम हुसैन (अ.स.) अपने खानदान के साथ मदीना छोड़ कर मक्का की ओर हिजरत कर गए जहाँ आप लगभग साढ़े चार महीने खाना ए काबा के नज़दीक रहे लेकिन हज का ज़माना आते ही इमाम को खबर मिली कि यज़ीद ने हाजियों के लिबास में क़ातिलों का एक ग्रुप भेजा है जो इमाम को हज के दौरान क़त्ल करने की नीयत से आया है। वैसे तो हज के दौरान हथियार रखना हराम है और एक चींटी को भी मार दिया जाए तो इंसान पर कफ्फ़ारा लाज़िम हो जाता है लेकिन यज़ीद और बनी उमय्या के लिए इस्लामी उसूल या काएदे कानून क्या मायने रखते थे?

जिस वक़्त पूरा आलमे इस्लाम सिमट कर मक्का की तरफ आ रहा था इमामे हुसैन ने हुरमते काबा बचाने के लिए हज को उमरह में बदल कर मक्का से कर्बला की तरफ हिजरत का फैसला किया।

अरब लीग ने फिलिस्तीनियों को विस्थापित करने की अमेरिकी योजना को अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए खारिज कर दिया है।

अरब लीग महासचिव ने दोहराया कि मध्य पूर्व में स्थिरता और शांति केवल फिलिस्तीनी मुद्दे के न्यायोचित समाधान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त दो-राज्य समाधान के कार्यान्वयन के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि इसलिए, इसकी आवश्यकता है 1967 से पहले की सीमाओं पर एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम होगी। एक बयान में, लीग ने जोर देकर कहा कि इन सहमत सिद्धांतों और स्थापित मानदंडों से कोई भी विचलन, जो अरब और अंतर्राष्ट्रीय आम सहमति का खंडन करेगा, लंबे समय तक चलेगा संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा तथा शांति और भी बिगड़ेगी। जिससे क्षेत्र के लोगों, विशेषकर फिलिस्तीनियों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। वक्तव्य में इस बात पर जोर दिया गया कि फिलिस्तीनियों को निर्वासन, विलय या अवैध यहूदी बस्तियों के विस्तार के माध्यम से विस्थापित करने के प्रयास लगातार विफल रहे हैं।

अरब लीग ने उन सभी देशों से आग्रह किया है जो शांति के मार्ग के रूप में द्वि-राज्य समाधान का समर्थन करते हैं कि वे इस समाधान को प्राप्त करने के लिए एक विश्वसनीय प्रक्रिया में तत्काल और लगन से शामिल हों तथा इसे जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करें। यह समाधान फिलिस्तीनियों, इजरायलियों और पूरे क्षेत्र के लिए सुरक्षा और शांति सुनिश्चित करने का एकमात्र व्यवहार्य तरीका है।

हज़रत आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई ने आज सुबह अशरा ए फ़ज्र के आगमन के मौके पर इमाम ख़ुमैनी र.ह. के मज़ार पर हाज़िरी दी फ़ातिहा पढ़ी और इस्लामी गणराज्य ईरान के संस्थापक को श्रद्धांजलि अर्पित की।

हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने आज सुबह अशरा-ए-फ़ज्र के आगमन के मौके पर इमाम ख़ुमैनी र.ह. के मज़ार पर हाज़िरी दी फ़ातिहा पढ़ी और इस्लामी गणराज्य ईरान के संस्थापक को श्रद्धांजलि अर्पित की।

रहबर-ए-इंक़लाब ने 30 अगस्त 1981 के आतंकी धमाके और 28 जून 1981 को प्रधानमंत्री कार्यालय में हुए आतंकी हमले में शहीद होने वालों की कब्रों पर भी हाज़िरी दी।

इस मौके पर उन्होंने शहीद आयतुल्लाह बहिश्ती, मोहम्मद अली रजाई और हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन बाहुनर सहित सभी शहीदों की याद को सम्मानपूर्वक किया।

हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने इस्लामी क्रांति, शहीद-ए-दिफ़ा-ए-मक़दस और मुदाफ़ेआन-ए-हरम (पवित्र स्थलों के रक्षक) के मज़ारों पर भी फ़ातिहा पढ़ी और उनके मर्तबे की बुलंदी के लिए दुआ की।

स्वीडन में कुरआन पाक को जलाने की कई घटनाओं में शामिल 38 वर्षीय इराकी शरणार्थी सलवान मोमिका गोलीबारी की एक घटना में मारा गया।

स्वीडन में कुरआन पाक को जलाने की कई घटनाओं में शामिल 38 वर्षीय इराकी शरणार्थी सलवान मोमिका गोलीबारी की एक घटना में मारा गया।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के पास स्थित सोडरटेल्जे शहर में हुई जहां एक सशस्त्र व्यक्ति ने मोमिका के निवास में घुसकर उन पर गोलियां चला दीं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

सूत्रों के अनुसार फायरिंग के समय मोमिका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टिकटॉक पर लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग कर रहा था। स्वीडिश पुलिस और न्यायिक अधिकारियों ने उनकी मौत की पुष्टि कर दी है और मामले की जांच जारी है।

सलवान मोमिका द्वारा कुरान जलाने की घटनाओं को लेकर मुस्लिम दुनिया में गहरा आक्रोश था और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई तथा शरणार्थी दर्जे की समाप्ति की मांग की जा रही थी। हालांकि उनकी अचानक मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं और स्वीडिश अधिकारी घटना से जुड़ी अधिक जानकारियां जुटा रहे हैं।

पूर्व राष्ट्रपति मरज़ूक़ी को मुख्य रूप से अरब बहार और ट्यूनीशियाई तानाशाह ज़ैनुल अबेदीन बिन अली को पद से हटाने के बाद देश की राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए जाना जाता है।

पूर्वी अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया के पूर्व राष्ट्रपति ने फिलिस्तीनियों को "अपनी पहली आज़ादी के लिए लड़ने वाले अंतिम अरब" कहा। लंदन में मेमो द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व राष्ट्रपति मोनसेफ मरज़ूक़ी ने कहा कि फिलिस्तीन "अपनी पहली आज़दी के लिए लड़ने वाला अंतिम अरब राष्ट्र है।" मंगलवार को लंदन के पी-21 गैलरी में बोलते हुए, मरज़ूकी ने ट्यूनीशिया और इस क्षेत्र में लोकतंत्र के लिए संघर्ष को फिलिस्तीनी संघर्ष से जोड़ने की कोशिश की और कहा कि अगर ट्यूनीशिया और मिस्र तानाशाही की ओर नहीं मुड़ते, तो ग़ज़्ज़ा पट्टी की चल रही नाकेबंदी खत्म हो जाती। यह टिकता नहीं. पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि मैं सीरिया और गाजा की वर्तमान स्थिति के बीच संबंध देखता हूं। वह कड़ी स्वतंत्रता की कड़ी है। अन्य अरब राष्ट्रों ने पश्चिमी उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता प्राप्त की और फिर उन्हें तानाशाही से मुक्ति के लिए दूसरी बार संघर्ष करना पड़ा, लेकिन फिलिस्तीन को अभी तक अपनी पहली आज़ादी प्राप्त नहीं हुई है।

मरज़ूक़ी ने कहा, "हमें ग़ज़्ज़ा पर गर्व है।" मेरा मानना ​​है कि इस युद्ध में ग़ज़्ज़ा की जीत हुई। उन्होंने कहा कि इजरायल का दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय नहीं रहा है। मरज़ूकी ने फिलीस्तीनी संघर्ष के बाद उभरे "मंडेला समाधान" के प्रति आशा व्यक्त की तथा दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला और अन्य हस्तियों के नेतृत्व में सशस्त्र प्रतिरोध की ओर भी इशारा किया। उन्होंने जोर देकर कहा, "मैं हिंसा से बहुत नफरत करता हूं, लेकिन अगर मुझे लड़ना पड़ा तो मैं लड़ूंगा।"

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हज़रत इमाम ख़ुमैनी (र) ने उसी समय इन परिवर्तनों पर गहरी नज़र डाली और वे इस मामले में चिंतित थे कि कहीं ऐसा न हो कि पूर्वी ब्लॉक का पतन पश्चिमी ब्लॉक की सफलता साबित हो और पूर्वी ब्लॉक के देश भी पश्चिम और अमेरिका की गोदी में चले जाएं और पश्चिमी पूंजीवादी व्यवस्था को आदर्श के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित हो जाएं।

दो दशको के दौरान इस्लामी क्रांति के प्रभाव और प्रतिक्रिया केवल ईरान के भीतर, मध्य पूर्व या मुस्लिम जगत तक सीमित नहीं थे, बल्कि ऐसा लगता है कि इस क्रांति ने क्षेत्र से परे, विशेषकर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर भी अपने प्रभाव डाले हैं।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि ईरान में इस्लामी क्रांति एक ऐसे समय में हुई, जब दुनिया पर द्विध्रुवीय व्यवस्था हावी थी और दुनिया दो ब्लॉकों, पूर्व और पश्चिम में विभाजित थी। दुनिया की दो बड़ी ताकतें, यानी अमेरिका और सोवियत संघ, इन दो ब्लॉकों की नेतृत्व कर रही थीं। हालांकि 1957 में 'तीसरी दुनिया' या 'गैर-संरेखित देशों' का एक गठबंधन अस्तित्व में आया था और धीरे-धीरे आकार ले रहा था, लेकिन यह गठबंधन द्विध्रुवीय व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं डाल सका।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद द्विध्रुवीय व्यवस्था के अस्तित्व में आने के समय से यह सवाल उठता रहा था और व्यवहार में इसका परीक्षण किया जा रहा था कि दुनिया में होने वाली हर घटना या परिवर्तन या विभिन्न देशों के सिस्टम में होने वाली कोई भी बदलाव एक ब्लॉक की ताकत के संतुलन में लाभ या नुकसान के रूप में परिवर्तन ला सकती है। इसलिए इन दोनों बड़ी शक्तियों का मुकाबला इस घटना के अस्तित्व में आने और इसके कार्यप्रणाली के दायरे में महत्वपूर्ण था। द्विध्रुवीय व्यवस्था का चालीस साल का ऐतिहासिक अनुभव इस सिद्धांत का समर्थन करता है।

1949 में चीन की क्रांति की सफलता, 1952 में कोरिया युद्ध, मध्य पूर्व के अरब देशों में सैनिक विद्रोह, हंगरी संकट, बर्लिन दीवार, क्यूबा मिसाइल संकट और इसी तरह वियतनाम युद्ध कुछ ऐसे घटनाएँ थीं जो इन दो बड़ी शक्तियों में से एक की सहायता से घटीं और टकराव का कारण बनीं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि ईरान में क्रांति से पहले होने वाली घटनाओं में भी इन दोनों बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए, इस संदर्भ में सोवियत सैनिकों के माध्यम से अजरबैजान पर कब्जा, तेल के राष्ट्रीयकरण की मुहिम 28 मर्दाद (19 अगस्त) की साजिश और 1950 के दशक की घटनाएँ उल्लेखनीय हैं। हालांकि 1953 में तख्तापलट की साजिश के बाद ईरान को पश्चिमी ब्लॉक के एक हिस्से के रूप में पहचाना गया था और पश्चिमी सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक समझौतों में सदस्यता प्राप्त करने के कारण यह उसका अभिन्न हिस्सा था, फिर भी ईरान की 2500 किलोमीटर लंबी सीमा पूर्वी शक्ति से साझा होने और असाधारण सैनिक परिस्थितियों के मद्देनजर सोवियत संघ की सरकार ईरान के मामलों के बारे में निश्चिंत नहीं रह सकती थी और सामान्यत: ईरान के बाहरी मामलों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करती थी।

इमाम खुमैनी (रह.) की नेतृत्व में इस्लामी आंदोलन की शुरुआत से 5 जून 1963 को इसके चरम तक पहुँचने के बावजूद इमाम (रह.) के हमलों का मुख्य निशाना अक्सर अमेरिका हुआ करता था, फिर भी यह तथ्य सोवियत संघ के लिए इस अमेरिका विरोधी आंदोलन के बारे में सकारात्मक रुख अपनाने का कारण नहीं बना। सोवियत संघ ने न केवल इस आंदोलन का समर्थन नहीं किया, बल्कि एक अजीब स्थिति में यह देखा गया कि इस जन क्रांति के खिलाफ अमेरिका के सहयोगी देशों की तरह उसने नकारात्मक रुख अपनाया। यह नीति दो कारणों से थी:

आंदोलन की धार्मिक और इस्लामी प्रकृति। पूर्व और पश्चिम की शक्तियों के बीच आपसी मतभेद होने के बावजूद, वे धार्मिक, विशेषकर इस्लामी आंदोलनों के खिलाफ समान रुख रखते थे।

इमाम खुमैनी (रह.) ने अपने आंदोलन की शुरुआत में ही इन दोनों बड़ी शक्तियों के बारे में अपनी स्थिति घोषित की थी और उनका प्रसिद्ध वाक्य था: "अमेरिका इंग्लैंड से बदतर है, इंग्लैंड अमेरिका से बदतर है और सोवियत संघ दोनों से बदतर है, ये सभी एक दूसरे से अधिक गंदे हैं, लेकिन आज हमारा काम इन दुष्टों से है, अमेरिका से है।" और या यह मतलब था कि "हम अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद से उतनी ही लड़ाई में हैं जितनी पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों से अमेरिका की नेतृत्व में हैं।"

इन वाक्यों में इन दोनों बड़ी शक्तियों के लिए यह संदेश था कि दोनों शक्तियाँ इस आंदोलन के बढ़ने और सफल होने से नुकसान उठा चुकी हैं और इस क्रांति ने वैश्विक व्यवस्था में उनकी श्रेष्ठता को चुनौती दी है।

1978 और 1979 में इस्लामी क्रांति के शिखर तक पहुँचने और "न पूर्व, न पश्चिम, इस्लामी लोकतंत्र" का नारा लगाने के बाद, दोनों बड़ी शक्तियों द्वारा शाह का समर्थन और इस्लामी क्रांति के शत्रुओं, विशेष रूप से इराकी सरकार द्वारा सामूहिक रूप से युद्ध में मदद करना यह साबित करता है कि इस्लामी क्रांति द्विध्रुवीय व्यवस्था के लिए अस्वीकार्य थी, बल्कि क्रांतिकारी मुस्लिमों द्वारा प्राप्त सफलता और जन सेना और स्वयंसेवकों की इराक-ईरान युद्ध के दौरान स्थिरता और दृढ़ता ने द्विध्रुवीय व्यवस्था की नींव की कमजोरी को साबित किया।

यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इस्लामी क्रांति की सफलता और इसकी दोनों बड़ी शक्तियों में से किसी एक पर निर्भर न होने की नीति द्विध्रुवीय व्यवस्था के पतन में प्रभावी थी।

मिखाइल गोर्बाचोव के कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सचिव और सोवियत संघ के राष्ट्रपति के रूप में सत्ता में आने और "पेरिस्ट्रोइका" और "ग्लासनोस्त" पर आधारित नीति पेश करने के परिणामस्वरूप, पूर्वी ब्लॉक और साथ ही द्विध्रुवीय व्यवस्था के पतन के संकेत दिखाई देने लगे।

इमाम खुमैनी (रह.) ने इसी समय में इन परिवर्तनों पर गहरी नजर डाली और वह इस बारे में चिंतित थे कि कहीं ऐसा न हो कि पूर्वी ब्लॉक का पतन पश्चिमी ब्लॉक की सफलता साबित हो और पूर्वी ब्लॉक के देश भी पश्चिम और अमेरिका की गोद में चले जाएं और पश्चिमी पूंजीवादी व्यवस्था को मॉडल के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए। उन्होंने गोर्बाचोव को भेजे गए अपने एक ऐतिहासिक पत्र में उसे इन खतरों से आगाह किया और पूर्वी ब्लॉक की असली समस्या, यानी भगवान से युद्ध, के बारे में उसे चेतावनी दी और पूरी ताकत से ऐलान किया कि इस्लाम का सबसे बड़ा और शक्तिशाली केंद्र, इस्लामी गणराज्य ईरान, सोवियत संघ के लोगों के धार्मिक शून्यता को भर सकता है।

विभिन्न रिवायतें स्पष्ट रूप से बताती हैं, कि हक़ और बातिल की जंग की तारीख़ में चार महत्वपूर्ण मोड़ ऐसे आए जिन पर शैतान ने आहें भरीं और विलाप किया,पहला, जब उसे अल्लाह के दरबार से निकाला,दूसरा,जब उसे ज़मीन पर उतारा गया,तीसरा,हज़रत पैगंबर मुहम्मद स.ल.की बेसत का दिन, जो इंसानियत की हिदायत का एक नया दौर था,और चौथा, ग़दीर का वाक़या जिसने नुबूवत के रास्ते को जारी रखने की गारंटी दी।दिलचस्प बात यह है कि अमीरुल मोमिनीन अ.स. इन निर्णायक पलों में से एक के गवाह थे,वह मुकाम जिसे पैगंबर स.ल. ने स्पष्ट रूप से तस्दीक किया।

हज़रत पैगंबर मुहम्मद स.ल.व.की नुबूवत के आरंभिक क्षणों की एक अद्भुत रिवायत बयान की गई है जिसमें अमीरुल मोमिनीन अली अ.स.व.ने वह समय देखा और सुना जब वह़ी नाज़िल हो रही थी और शैतान के नालों और विलाप की आवाज़ सुनाई दी।

यह आवाज़ उस समय शैतान की पराजय और हिदायत के नूर के सामने उसकी निराशा का प्रतीक थी रिवायत और उसकी व्याख्या इस प्रकार है।

 

रिवायत में आया है कि अमीरुल मोमिनीन अली अ.स. ने कहा,मैंने वह़ी के नुज़ूल (अवतरण) के समय शैतान के नाले की आवाज़ सुनी।

मैंने पूछा,या रसूलल्लाह स.ल. यह नाला कैसा था?

रसूल अल्लाह (स) ने जवाब दिया,यह शैतान है, जो अब अपनी इबादत से निराश हो चुका है और इस तरह नाला कर रहा है।

फिर रसूल अल्लाह स.ल.व. ने इमाम अली अ.ल.स.से फरमाया,निस्संदेह तुम वही सुनते हो जो मैं सुनता हूं और वही देखते हो जो मैं देखता हूं लेकिन तुम नबी नहीं हो बल्कि, तुम मेरे वज़ीर (सहयोगी) और मददगार हो और भलाई के रास्ते पर हो।

इमाम मुहम्मद बाक़िर अ.स.से एक अन्य रिवायत में आया है,इबलीस ने चार बार नाला किया।

जिस दिन उसे अल्लाह की बारगाह से निकाला गया।

जिस दिन उसे धरती पर उतारा गया।

जिस दिन मुहम्मद (स.ल.स.) को नुबूवत मिली।

जिस दिन ग़दीर का वाक़या पेश आया।

यह रिवायतें यह स्पष्ट करती हैं कि हक़ और बातिल (सत्य और असत्य) की जंग में चार अहम मोड़ आए जब शैतान ने नाला किया:

अल्लाह की बारगाह से निकाला जाना।

धरती पर उतार दिया जाना।

पैगंबर मुहम्मद स.ल.व. की नुबूवत, जो इंसानियत के लिए हिदायत का नया दौर था।

ग़दीर का वाक़या जिसने नुबूवत के रास्ते को जारी रखने की गारंटी दी।

दिलचस्प बात यह है कि अमीरुल मोमिनीन अली अ.ल. अपनी उच्च स्थिति और स्थान की वजह से इन निर्णायक क्षणों के गवाह थे यह वही स्थान है जिसे रसूल अल्लाह स.ल.व. ने स्पष्ट रूप से प्रमाणित किया।

संदर्भ:

नहजुल बलाग़ा, ख़ुतबा 190

अल-ख़िसाल, जिल्द 1, पृष्ठ