हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद हुसैन मोमनी ने शहीद सईद सामानलू की यादगार मजलिस में कहा कि दुश्मन दूसरे तमाम मंसूबों में नाकाम होने के बाद अब मोल-भाव की तरफ आया है, लेकिन हमें मोल-भाव के दौरान उनकी चालों से चौकन्ना रहना चाहिए, ताकि वे दोबारा मुल्क पर हमला न कर सकें।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद हुसैन मोमनी ने शहीद सईद सामानलू की यादगार मजलिस में कहा कि दुश्मन दूसरे तमाम मंसूबों में नाकाम होने के बाद अब मोल-भाव की तरफ आया है, लेकिन हमें मोल-भाव के दौरान उनकी चालों से चौकन्ना रहना चाहिए, ताकि वे दोबारा मुल्क पर हमला न कर सकें।
उन्होंने इलाही नेमतों को ज़ाहिर और पोशीदा हिस्सों में तक़सीम करते हुए कहा कि अल्लाह की ज़ाहिर नेमतों में से एक हमारे लिए इस्लामी निज़ाम और विलायत की नेमत है। हमारे शोहदा ने इस इलाही नेमत की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं, और हमें भी शोहदा की तरह पूरी जान-ओ-दिल से इस्लामी निज़ाम और विलायत की हिफ़ाज़त करनी चाहिए।
उन्होंने मुल्क में हालिया वाक़िआत और दहशतगर्दाना हमलों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अगर इन हादसों को ग़ौर से देखा जाए तो उनमें बेगानों, ख़ास तौर पर अमेरिका और इस्राईल का हाथ साफ़ नज़र आता है। खुद उन्होंने माना है कि उन्होंने लोगों को हथियार दिए ताकि ईरान के अंदर हिंसक कार्रवाइयाँ करें।
दुश्मन की सारी कोशिश इसी ज़ाहिर इलाही नेमत यानी इस्लामी निज़ाम और विलायत को ख़त्म करने की है, इसलिए हमें होशियार रहना होगा।
हौज़ा-ए-इल्मिया के उस्ताद ने कहा कि इंक़िलाब के खिलाफ़ दुश्मनी सिर्फ़ आज की नहीं है।
इंक़ेलाब के शुरू से अब तक दुश्मन जंग-ए-तहमीली, मआशी जंग और साक़ाफ़ती शुब्हात के ज़रिए अपने मंसूबों में नाकाम रहा है, और अब वह “जंग-ए-मुरक्कब” की तरफ आया है।
उन्होंने हालिया दहशतगर्दाना कार्रवाइयों का ज़िक्र करते हुए कहा कि हमने देखा कि किस तरह उपद्रवियों और दहशतगर्दों ने मस्जिदों, हुसैनियों, इमामज़ादगानों और क़ुरआन को आग लगाई। इन घटनाओं में दुश्मन ने अपना असली चेहरा दिखा दिया और खुलकर कहा कि उसे हमारे दीन से परेशानी है।
हुज्जतुल इस्लाम मोमनी ने सूरह बक़रा की आयत 120 का हवाला देते हुए कहा कि दुश्मन उस वक़्त तक राज़ी नहीं होगा जब तक लोग उसकी पैरवी न करें। उन्होंने सवाल किया,क्या कोई मुसलमान दुश्मन की तरह बनना पसंद करेगा? क्या कोई मुसलमान दुश्मन का रहन-सहन अपनाएगा?
अपने ख़िताब के दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि अफ़सोस की बात है कि कुछ लोग हालिया मारे जाने वालों के बहाने नीम-ए-शाबान की खुशियाँ मनाने से रुक गए हैं। उन्हें साफ़ करना चाहिए कि उनका इशारा किसकी तरफ है शोहदा की तरफ या दहशतगर्दों की तरफ?
उन्होंने कहा कि अगर उनका मतलब शोहदा हैं तो यह बड़ी नासमझी है, क्योंकि दुश्मन चाहता है कि हम दीन के शआइर से बेपरवाह हो जाएँ। और अगर उनका मतलब दहशतगर्द हैं, तो ये लोग दुश्मन की लाइन पर खेल रहे हैं। क्या इन्हें नहीं मालूम कि इस्लामी फ़िक़्ह में “मुहारिब” का हुक्म क्या है? क्या ये लोग दीन के साफ़ हुक्म की मुख़ालिफ़त करना चाहते हैं?
उन्होंने यह भी कहा कि अगर इन लोगों का पिछला रिकॉर्ड देखा जाए तो मालूम होगा कि इन्होंने इस्लामी निज़ाम के लिए कोई क़ुर्बानी नहीं दी ना जंग-ए-तहमीली में शरीक हुए और ना ही मुश्किल वक़्तों में निज़ाम की मदद की।
आख़िर में उन्होंने होशियारी पर ज़ोर देते हुए कहा कि दुश्मन मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से हमारे दीन को नुक़सान पहुँचाना चाहता है। जब वह मैदान-ए-जंग में हमें हरा नहीं सका, तो मोल-भाव की राह अपनाई हैं।