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इमाम ख़ुमैनी रह.अस्र-ए-हाज़िर और मौजूदा नस्ल के मालिक-ए-अश्तर थे

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इमाम ख़ुमैनी रह.अस्र-ए-हाज़िर और मौजूदा नस्ल के मालिक-ए-अश्तर थे

 आयतुल्लाह जवादी आमोली ने फ़रमाया,इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह न सिर्फ़ «फ़िक़्ह-ए-असग़र» में एक नामवर फ़क़ीह हैं, बल्कि «फ़िक़्ह-ए-अकबर» में भी मुमताज़ आरिफ़ और अज़ीम हकीम हैं।

 हज़रत आयतुल्लाहिल उज़मा जवादी आमोली ने अपनी एक तहरीर में इस बात की तरफ़ इशारा करते हुए कि इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह अस्र और हमारी मौजूदा नस्ल के मालिक-ए-अश्तर थे

उन्होने कहा,वह मर्द-ए-ख़ुदा जो हमारे ज़माने और नस्ल का मालिक-ए-अश्तर था और जिसने मौला-ए-मुवह्हिदीन हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम के फ़रमान को ख़ूब समझा और उसे ज़िंदा किया, वह इन्क़िलाब-ए-इस्लामी ईरान के अज़ीमुल मरतबत और जलीलुल-क़द्र रहबर हज़रत इमाम ख़ुमैनी क़ुद्दिस सिर्रहु हैं।

इस अज़ीम इलाही रहबर ने न सिर्फ़ अहकाम-ए-इलाही को वुसअत दी, बल्कि इलाही हिकमतों को भी वाज़ेह किया। इस नामवर इमामी फ़क़ीह और इस्लाम के अज़ीम हकीम का वह मक़ाला, जो उन्होंने पचास साल पहले तीस बरस की उम्र में «मिस्बाहुल हिदायह इला अल-ख़िलाफ़ह वल-विलायत» के नाम से तहरीर किया, इंतिहाई आला इर्फ़ानी मआरिफ़ से लबरेज़ है जो फ़लसफ़े से भी बुलंद हैं।

यह बात हैरत-अंगेज़ है कि एक इलाही इंसान ने तीस बरस की उम्र में इन अज़ीम मआरिफ़ को कैसे समझा और क़लम उठाकर उन्हें तहरीर करने की जुरअत की।

जी हाँ, वह हक़ीक़तन ऐसी शख़्सियत हैं जिनके बारे में कहा गया है: ज़ालिका फ़ज़्लुल्लाहि यूतीहि मन यशा» वह न सिर्फ़ «फ़िक़्ह-ए-असग़र» में एक नामवर फ़क़ीह हैं, बल्कि «फ़िक़्ह-ए-अकबर» में भी एक मुमताज़ आरिफ़ और अज़ीम हकीम हैं।

किताब: बुनियान-ए-मरसूस, इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह, बयान व बनान, स.358

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