नजफ अशरफ के इमाम जुमुआ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद सदरुद्दीन क़ब्बांची ने ईद-ए-ग़दीर के आगमन के अवसर पर विलायत के महत्व को रेखांकित करते हुए इसे इस्लामी शिक्षाओं का मूल स्तंभ बताया और मुस्लिम उम्माह से हफ्ता-ए-विलायत (विलायत सप्ताह) को भरपूर तरीके से मनाने की अपील की।
नजफ अशरफ के इमाम जुमुआ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद सदरुद्दीन क़ब्बांची ने ईद-ए-ग़दीर के आगमन के अवसर पर विलायत के महत्व को रेखांकित करते हुए इसे इस्लामी शिक्षाओं का मूल स्तंभ बताया और मुस्लिम उम्माह से हफ्ता-ए-विलायत को भरपूर तरीके से मनाने की अपील की।
उन्होंने कुछ खाड़ी अरब देशों में शियाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण रवैये और लेबनान पर इज़राइली हमलों पर भी गहरी चिंता व्यक्त की।
हुसैनिया-ए-आज़म फातिमिया, नजफ अशरफ में जुमुआ के खुत्बे के दौरान सैयद सदरुद्दीन क़ब्बांची ने यौम-ए-अरफ़ा के अवसर पर कर्बला-ए-मोअल्ला में ज़ाइरिन की भारी उपस्थिति को ईमान और अहल-ए-बैत (अ) से मोहब्बत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल हज में लगभग 17 लाख लोगों ने भाग लिया, जबकि प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार यौम-ए-अरफ़ा पर इमाम हुसैन (अ) के रौज़े-ए-मुबारक के ज़ाइरिन की संख्या 70 लाख से अधिक हो गई। उन्होंने इस सफल प्रबंधन के लिए जनता, स्वयंसेवी संगठनों और सरकारी संस्थानों का आभार व्यक्त किया।
अंतरराष्ट्रीय स्थितियों पर बात करते हुए नजफ अशरफ के इमाम-ए-जुमुआ ने कुछ अरब खाड़ी देशों में शियाओं के साथ किए जाने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि रिपोर्टों के अनुसार, हज़ारों पाकिस्तानी शिया केवल उनके मज़हब (संप्रदाय) के आधार पर निर्वासित किए गए और उनकी संपत्तियों को जब्त कर लिया गया, जो मानवाधिकारों और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि संविधान और कानून धार्मिक स्वतंत्रता और समानता की गारंटी देते हैं, तो ऐसे कदम किस आधार पर उठाए जा रहे हैं?
उन्होंने दक्षिणी लेबनान पर इज़राइली हवाई हमलों की भी निंदा की और कहा कि दर्जनों लोगों के शहीद होने और घायल होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चुप्पी दुखद है। उनका कहना था कि यदि दुनिया वास्तव में शांति की हिमायती है, तो उसे इज़राइल की लगातार आक्रामकता के खिलाफ प्रभावी रुख अपनाना चाहिए।
हुज्जतुल इस्लाम सैयद सदरुद्दीन क़ब्बांची ने दुआ-ए-अरफ़ा के कुछ आत्मा-पोषक वाक्यों की व्याख्या करते हुए बंदगी, विनम्रता और ईश्वर पर भरोसे के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ) की यह दुआ इंसान को अपनी कमजोरियों का एहसास कराती है और अल्लाह तआला की रहमत और करम की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
ईद-ए-ग़दीर की मुनासिबत पर उन्होंने इमाम मोहम्मद बाकिर (अ) की प्रसिद्ध हदीस का हवाला देते हुए कहा कि इस्लाम पाँच स्तंभों पर कायम है: नमाज, रोजा, ज़कात, हज और विलायत, और विलायत इन सभी कर्मों की आत्मा और कुंजी है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आने वाले दिनों में ग़दीर के संदेश — विलायत, एकता और धार्मिक समझ — का व्यापक रूप से प्रचार किया जाएगा।