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बहरैन में शिया उलेमा की गिरफ्तारियों और गुप्त मुकदमों पर मानवाधिकार संगठनों की चिंता

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बहरैन में शिया उलेमा की गिरफ्तारियों और गुप्त मुकदमों पर मानवाधिकार संगठनों की चिंता

बहरैन में शिया उलेमा के खिलाफ चल रही न्यायिक कार्रवाई पर मानवाधिकार विशेषज्ञों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि गुप्त सुनवाई, वकीलों से मुलाकात पर रोक और अन्य कानूनी अनियमितताओं ने इन मुकदमों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बहरैन में शिया उलेमा की गिरफ्तारियों और उनके खिलाफ चल रही न्यायिक कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इन मामलों में निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी की जा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, देश में 40 से अधिक शिया उलेमा जेलों में बंद हैं, जबकि सरकार ने उनमें से 19 उलेमा के खिलाफ गुप्त रूप से मुकदमों की सुनवाई शुरू कर दी है। इन उलेमा में सैयद मजीद अल-मशअल, शेख अली अल-सद्दी, शेख मोहम्मद सनकूर, शेख फाज़िल अल-ज़ाकी, शेख मोहम्मद अल-खरसी, शेख ईसा अल-मोमिन, सैयद मूसा अल-वदाई, शेख मोहम्मद जवाद अल-शहाबी, शेख मिर्ज़ा अल-मअतूक, शेख हामिद आशूर और शेख अय्यूब अल-बहरानी सहित अन्य लोग शामिल हैं।

मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, इन मुकदमों में कई गंभीर अनियमितताएँ सामने आई हैं। उनके मुताबिक सुनवाई गुप्त रूप से की जा रही है, हिरासत में बंद उलेमा को अपने वकीलों और परिवार वालों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई है, जबकि वकीलों को भी मुकदमों से संबंधित दस्तावेज़ों तक पहुँच नहीं दी गई है। यह भी कहा गया है कि अपने मुवक्किलों से मिलने का अनुरोध करने पर वकीलों पर दबाव डाला गया और उन्हें संभावित यातना की धमकियाँ भी दी गईं।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि आरोपियों को अदालत में पेश करने के बजाय वीडियो लिंक के माध्यम से सुनवाई की गई, जबकि परिवार वालों से होने वाली संक्षिप्त फोन बातचीत की निगरानी की जाती है और मुकदमे का ज़िक्र होते ही कॉल काट दी जाती है।

कानूनी कार्यकर्ताओं के अनुसार, हिरासत में बंद कुछ उलेमा ने अपने परिवार वालों को बताया है कि उनसे उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से संबंधित दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर कराए गए।

मानवाधिकार पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि न्यायिक प्रक्रिया बुनियादी कानूनी सुरक्षा और अधिकारों से वंचित हो, तो उसकी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर देश और विदेश दोनों जगह सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके अनुसार यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों के मुकदमों तक सीमित नहीं है, बल्कि बहरीन में कानून के शासन और न्यायिक व्यवस्था पर जनता के विश्वास की भी परीक्षा है।

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