स्कूल ए इल्मिया बानो अमीन (रह.) के सांस्कृतिक विभाग द्वारा आयोजित सहीफ़ा ए सज्जादिया की व्याख्या संबंधी बैठक में, जिसमें सहीफ़ा सज्जादिया की 20वीं दुआ यानी दुआ-ए-मकारिमुल-अख़लाक़ पर चर्चा हुई, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन अवानवी ने कुरआन और सहीफ़ा सज्जादिया के साथ वास्तविक और निरंतर जुड़ाव की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षाओं से जुड़ाव दो विशेषताओ इख़लास”और “रुचि”—के साथ होना चाहिए। कुरआन और सहीफ़ा ए सज्जादिया का अध्ययन या पाठ केवल सवाब हासिल करने अथवा दूसरों के सामने बातें प्रस्तुत करने के लिए नहीं, बल्कि ईश्वरीय शिक्षाओं को समझने और अल्लाह के निकट होने के उद्देश्य से होना चाहिए।
हौज़ा शोधकर्ता ने इमाम सज्जाद (अ.स.) की दुआओं के विषयों और कुरआन के बीच गहरे संबंध की ओर संकेत करते हुए कहा कि सहीफ़ा सज्जादिया की दुआओं को जीवन के व्यावहारिक पाठ के रूप में अपनाना चाहिए। साथ ही बैठकों में सीखी गई बातों का निरंतर पुनरावलोकन करना चाहिए, ताकि धार्मिक शिक्षाएं इंसान के विचार और व्यवहार में स्थायी रूप से स्थापित हो सकें।
उन्होंने दुआ-ए-मकारिमुल-अख़्लाक़ की इस पंक्ति “वَ أَجْرِ لِلنَّاسِ عَلَی یَدِیَ الْخَیْرَ وَ لَا تَمْحَقْهُ بِالْمَنِّ” की व्याख्या करते हुए कहा कि इंसान को अपने माध्यम से लोगों तक ईश्वरीय भलाई पहुंचाने का साधन बनना चाहिए। लोगों की सेवा करना तथा समाज की भलाई और सुरक्षा के लिए प्रयास करना इस शिक्षा का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने कहा कि सैन्य और सुरक्षा बल समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले लोगों के उदाहरण हैं।
हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन अवानवी ने सहीफ़ा ए सज्जादिया की 27वीं दुआ के कुछ अंशों का उल्लेख करते हुए समाज की आर्थिक वृद्धि और समृद्धि में सुरक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला और सुरक्षा बनाए रखने वाले कर्मचारियों के दिन-रात के प्रयासों की सराहना और उनके प्रति आभार व्यक्त करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
बैठक के एक अन्य हिस्से में मआलियुल-अख़्लाक़” यानी उच्च नैतिक गुणों की प्राप्ति और आत्म-सुधार में दुआ की भूमिका पर चर्चा की गई।
उन्होंने कहा कि नैतिक गुणों और सद्गुणों को हासिल करने के लिए इंसान को लगातार प्रयास करना पड़ता है। लेकिन चूंकि मनुष्य पर नफ़्स-ए-अम्मारा और शैतान के बहकावे का प्रभाव रहता है, इसलिए उसे अपने नफ़्स के सुधार और उच्च नैतिक गुणों की प्राप्ति के लिए अल्लाह से सहायता मांगनी चाहिए।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन अवानवी ने सब्र, धैर्य, क्रोध पर नियंत्रण और सांसारिक चिंताओं से मुक्त होने के महत्व की ओर संकेत करते हुए कहा कि मानसिक दबाव और जीवन की कठिन परिस्थितियों में इंसान को कुरआन और दुआ की ओर रुख करना चाहिए।