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तबर्रा; ईमान की तकमील और अहले बैत अ.स. से वफ़ादारी का तक़ाज़ा

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तबर्रा; ईमान की तकमील और अहले बैत अ.स. से वफ़ादारी का तक़ाज़ा

इस्लामी तालीमात में तवल्ला और तबर्रा ईमान और अक़ीदे के अहम और बुनियादी विषयों में शामिल हैं। जिस तरह अल्लाह तआला, रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि और अहले-बैत-ए-अतहार अलैहिमुस्सलाम से मोहब्बत और लगाव ईमान का तक़ाज़ा है, उसी तरह उनके दुश्मनों से बेज़ारी और दूरी रखना भी मोमिन की अक़ीदती पहचान का हिस्सा है। इसी बेज़ारी को दीन की इस्तिलाह में तबर्रा कहा जाता है।

1. तबर्रा की परिभाषा

तबर्रा, तवल्ला के मुक़ाबले में इस्तेमाल होने वाली एक कलामी इस्तिलाह है, जिसे ख़ास तौर पर शिया इमामिया के अक़ीदे में अहम मक़ाम हासिल है। यह लफ़्ज़ "बरिअ" से निकला है, जिसके मआनी बेज़ारी, दूरी और किसी चीज़ से बे-ताल्लुकी के हैं।

तबर्रा का मतलब महज़ किसी से ज़ाती नफ़रत या दुश्मनी नहीं है, बल्कि हक़ के ख़िलाफ़ अक़ीदों, विचारों और रास्तों से अक़ीदती और दिली तौर पर बेज़ारी रखना है। जिस तरह विलायत-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम मोमिन के ईमान को सही दिशा देती है, उसी तरह तबर्रा उसे बातिल से दूरी बनाए रखने का शऊर देता है।

2. क़ुरआन और रिवायतों में तबर्रा

तबर्रा की बुनियाद क़ुरआन-ए-करीम की तालीमात में मौजूद है। क़ुरआन की एक सूरह को सूरह-ए-बराअत (सूरह-ए-तौबा) कहा जाता है। इसकी शुरुआत अल्लाह तआला और उसके रसूल की तरफ़ से मुशरिकों से बेज़ारी के ऐलान से होती है। इससे यह बात साफ़ होती है कि इस्लाम में हक़ और बातिल के बीच फ़र्क़ करना और बातिल से बेज़ारी रखना बुनियादी अहमियत रखता है।

अहादीस-ए-नबवी और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की रिवायतों में भी तबर्रा की अहमियत पर ख़ास ज़ोर दिया गया है। रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि से मन्क़ूल एक हदीस में तबर्रा को ईमान की मज़बूत कड़ियों में शामिल किया गया है।

(वसाइलुश्शीआ, जिल्द 16, सफ़्हा 177)

इसी तरह इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक रिवायत में दीन-ए-ख़ुदा के मुख़ालिफ़ लोगों और ख़ुदा के दुश्मनों के दोस्तों से बेज़ारी को वाजिब बताया गया है।

(अल-एतेक़ादात फ़ी दीनिल इमामिया, सफ़्हा 86)

एक दूसरी रिवायत में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने तवल्ला और तबर्रा को हक़ीक़त-ए-ईमान बताया है। तवल्ला का मतलब अल्लाह तआला, रसूले अकरम और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से मोहब्बत और लगाव है, जबकि तबर्रा का मतलब उनके दुश्मनों से बेज़ारी और दूरी रखना है।

(बिहारुल अनवार, जिल्द 66, सफ़्हा 241)

इस तरह तबर्रा, तवल्ला की मुख़ालिफ़ चीज़ नहीं बल्कि उसका तकमीली पहलू है। क्योंकि अहले-हक़ से सच्ची मोहब्बत इंसान को उनके मुख़ालिफ़ रास्तों से दूरी रखने का एहसास भी देती है।

3. दुश्मनाने ख़ुदा से मुराद

दुश्मनाने ख़ुदा में वे लोग शामिल हैं जो अल्लाह तआला का इनकार करते हैं या उसके लिए किसी को शरीक ठहराते हैं। इसी तरह वे लोग भी इस दायरे में आते हैं जो आइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की इमामत और विलायत का इनकार करते हैं।

लेकिन तबर्रा के सही मतलब को समझना ज़रूरी है। इसका मक़सद ज़ाती दुश्मनी, बेवजह सख़्ती या अख़लाक़ी हदों से आगे बढ़ना नहीं है, बल्कि बातिल अक़ीदों और ग़लत विचारों से बेज़ारी और हक़ के साथ वफ़ादारी है। मोमिन का रवैया हमेशा शरीअत, अख़लाक़ और इस्लामी आदाब के मुताबिक़ होना चाहिए।

4. तबर्रा का वुजूब और ईमान की तकमील

दुश्मनाने ख़ुदा से तबर्रा करना वाजिब बताया गया है और इसे दीन के अहम अरकान में शामिल किया गया है।

(बदाएउल कलाम, सफ़्हा 264; मिरआतुल उक़ूल, जिल्द 8, सफ़्हा 259; वसाइलुश्शीआ, जिल्द 16, सफ़्हा 176; अत-तालीक़ा अलल-मकासिब, जिल्द 1, सफ़्हा 232)

इसी तरह तबर्रा को दीन के अहम अरकान में भी गिना गया है।

(मिरआतुल उक़ूल, जिल्द 12, सफ़्हा 114)

और इसे ईमान की तकमील का ज़रिया भी बताया गया है।

(अल-बयान, सफ़्हा 241)

इस लिहाज़ से तबर्रा कोई मामूली या सिर्फ़ तारीख़ी मसला नहीं है, बल्कि मोमिन की अक़ीदती पहचान से गहरा तअल्लुक़ रखने वाला विषय है। तवल्ला इंसान के दिल को अहले-हक़ से जोड़ता है और तबर्रा उसे बातिल की पैरवी से बचाता है।

यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम, यानी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा और अइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम के दुश्मन, दरअसल अल्लाह तआला के दुश्मन हैं। इस बात पर रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की अहादीस और सीरत गवाह हैं।

5. मुहतज़र और मय्यित को तबर्रा की तलक़ीन

तबर्रा की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी होता है कि मुहतज़र, यानी मौत के क़रीब व्यक्ति, और मय्यित को दी जाने वाली तलक़ीन में भी इसका ज़िक्र मिलता है।

(कश्फ़ुल ग़िता, जिल्द 2, सफ़्हा 251 और 289)

इससे पता चलता है कि विलायत और बराअत का अक़ीदा मोमिन की पूरी ज़िंदगी के साथ-साथ उसकी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों से भी जुड़ा हुआ है। इंसान की ज़िंदगी का ख़ात्मा भी उसके बुनियादी अक़ीदे की याद और तजदीद (ताज़गी) से ख़ाली नहीं होना चाहिए।

6. जुमा की रात और दिन में तबर्रा

जुमा की रात और दिन के आमाल में गुमराह लोगों और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के दुश्मनों से तबर्रा और बेज़ारी का भी ज़िक्र मिलता है।

(अल-काफ़ी फ़िल फ़िक़्ह, सफ़्हा 153)

जुमा इबादत, ज़िक्र और रूहानी पाकीज़गी का ख़ास मौक़ा है। ऐसे मुक़द्दस वक़्त में विलायत-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से अपने रिश्ते को मज़बूत करना और उनके दुश्मनों से बेज़ारी का इज़हार करना मोमिन के अक़ीदे को और पुख़्ता करता है।

तबर्रा दरअसल विलायत की हिफ़ाज़त और ईमान की पासबानी का नाम है। जिस दिल में अल्लाह तआला, रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि और अहले-बैत-ए-अतहार अलैहिमुस्सलाम की सच्ची मोहब्बत हो, वहाँ उनके दुश्मनों से बेज़ारी भी अक़ीदे के तक़ाज़े के तौर पर पाई जाती है।

मक्तब-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम हमें मोहब्बत भी सिखाता है और अपनी पहचान भी देता है। तवल्ला के ज़रिए अहले-हक़ से जुड़ने का रास्ता दिखाता है और तबर्रा के ज़रिए बातिल से दूरी बनाए रखने का शऊर देता है। इसी वजह से रिवायतों में तबर्रा को ईमान की मज़बूत कड़ी, दीन के अहम अरकान और ईमान की तकमील का ज़रिया बताया गया है।

इसलिए मकतब-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की सच्ची पैरवी करने वाले के लिए ज़रूरी है कि वह मोहब्बत-ए-मुहम्मद व आले-मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम को अपने अक़ीदे और किरदार में ज़ाहिर करे, हक़ के रास्ते पर क़ायम रहे और शरीअत व अख़लाक़ की हदों की पाबंदी करते हुए बातिल और दुश्मनाने हक़ से अपनी अक़ीदती और दिली बेज़ारी बरक़रार रखे।

यही तवल्ला और तबर्रा का संतुलित शऊर है, जो ईमान को मज़बूती, अक़ीदे को पुख़्तगी और ज़िंदगी को मकतब-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से सच्ची वफ़ादारी अता करता है।

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