Print this page

दुश्मन के लिए ‘उम्मत-ए-अहमद’ का संदेश मुसलमानों की एकता और आपसी एकजुटता है: मौलवी याकूबी

Rate this item
(0 votes)
दुश्मन के लिए ‘उम्मत-ए-अहमद’ का संदेश मुसलमानों की एकता और आपसी एकजुटता है: मौलवी याकूबी

सुन्नी धर्मगुरू मौलवी अलीरज़ा याकूबी ने कहा कि जब दुश्मन मुसलमानों के बीच मतभेद को इस्लामी दुनिया को नुकसान पहुंचाने का अवसर समझता है, तब मुसलमानों को किसी साझा मुद्दे पर एकजुट करने वाली हर बैठक केवल एक समारोह नहीं रहती, बल्कि एकता को मजबूत करने का माध्यम बन जाती है।

उन्होंने कहा कि ‘उम्मत-ए-अहमद’ इसी एकता को जीवित रखने का एक प्रयास है। इस तरह के समारोह और बैठकें मुसलमानों के बीच एकता को मजबूत करने के लिए आवश्यक हैं और इन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

मौलवी याकूबी ने पैग़म्बर हजरत मुहम्मद (स) को मुस्लिम जगत में एकता का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए कहा कि पैग़म्बर (स) इस्लामी दुनिया में एकता का आधार और केंद्र हैं। शिया और सुन्नी दोनों के पास पैग़म्बर (स) और उनके अहलेबैत (अ) के रूप में एकता का मजबूत आधार मौजूद है।

उन्होंने कुरआन की आयत ‘वअतसेमू बेहब्लिल्लाह’ का उल्लेख करते हुए कहा कि कुरआन अल्लाह की किताब को मजबूती से थामने को एकता का साधन बताता है। इसी के अंतर्गत पैग़म्बर (स) जैसी धार्मिक हस्तियां भी मुसलमानों के लिए एकता का केंद्र बन सकती हैं।

उन्होंने कहा कि शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच सबसे महत्वपूर्ण समानताओं में से एक यह है कि दोनों के पैग़म्बर एक ही हैं। यही साझा पैग़म्बर पूरी मुस्लिम उम्मत के लिए एकता का केंद्र बन सकते हैं।

मौलवी याकूबी ने मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा करने की दुश्मनों की कोशिशों का उल्लेख करते हुए कहा कि एकता केवल धार्मिक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि बुद्धि और तर्क की दृष्टि से भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि इस्लामी समाज और मुस्लिम उम्मत का जीवन एकता, आपसी सहयोग और भाईचारे पर आधारित है। यदि यह एकता दुश्मनों के भड़काऊ नारों और फूट डालने वाली साजिशों से प्रभावित होती है, तो इस्लाम की मजबूत इमारत कमजोर होगी और मुसलमानों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

सुन्नी धर्मगुरु ने शिया और सुन्नी उलेमा तथा इमामे जुमा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आज उलेमा और विशेष रूप से इमामे जुमा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी साझा दुश्मन के सामने एकजुट मुस्लिम उम्मत के विचार को मजबूत करना है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक आयतों, रिवायतों और इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर एकता और आपसी सहयोग का संदेश मुस्लिम उम्मत को दुश्मनों के सामने एक मजबूत दीवार की तरह खड़ा कर सकता है।

मौलवी याकूबी ने धार्मिक भावनाओं और पवित्र चीजों के प्रति सम्मान को शिया और सुन्नी मुसलमानों की साझा विशेषता बताया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज में लोग अपने धार्मिक विश्वासों और पवित्र प्रतीकों के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं और किसी को कुरआन, पैग़म्बर (स), काबा या अन्य धार्मिक पवित्रताओं का अपमान करने की अनुमति नहीं देते।

उन्होंने कहा कि यही धार्मिक भावना इस बात का प्रमाण है कि शिया और सुन्नी दोनों मुसलमान इस्लाम और उसकी शिक्षाओं की रक्षा के लिए एकजुट हैं।

यह पूछे जाने पर कि यदि पैग़म्बर हजरत मुहम्मद (स) आज मुस्लिम उम्मत के बीच मौजूद होते, तो वे मुसलमानों से क्या मांग करते, मौलवी याकूबी ने कहा कि पैग़म्बर (स) निश्चित रूप से मुसलमानों को अत्याचार और साम्राज्यवादी शक्तियों के सामने डटकर खड़े होने और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का मुकाबला करने की शिक्षा देते।

उन्होंने विशेष रूप से इजरायल का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि पैग़म्बर (स) आज हमारे बीच होते, तो अत्याचार और जबरदस्ती करने वाली शक्तियों के सामने खड़ा होना मुस्लिम उम्मत की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल होता।

मौलवी याकूबी ने अंत में कहा कि ‘उम्मत-ए-अहमद’ केवल एक समारोह या उत्सव नहीं है, बल्कि आज दुश्मन के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश मुसलमानों की एकता, आपसी सहयोग, भाईचारे और एकजुटता है।

उन्होंने कहा कि दुश्मन जिस चीज से सबसे अधिक डरता है, वह मुसलमानों की एकता और आपसी एकजुटता है। इसलिए रबीउल अव्वल के इन शुभ दिनों में आयोजित होने वाले ऐसे समारोहों और बैठकों का संदेश पूरी मुस्लिम दुनिया के लिए एकता का संदेश है और यही एकता दुश्मनों के लिए चिंता का कारण है।

Read 7 times