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सोशल मीडिया और झूठे प्रोपेगेंडे का खेल

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सोशल मीडिया और झूठे प्रोपेगेंडे का खेल

सोशल मीडिया के दौर में प्रोपेगेंडा फैलाना शायद पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। कोई घटना होती है, उसकी कुछ सेकंड की वीडियो सामने आती है और फिर बिना किसी जांच-पड़ताल के उसकी मनमाने ढंग से व्याख्या शुरू हो जाती है। जांच बाद में होती है, पोस्ट और शेयर पहले!

सोशल मीडिया के दौर में प्रोपेगेंडा फैलाना शायद पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। कोई घटना होती है, उसकी कुछ सेकंड की वीडियो सामने आती है और फिर बिना किसी जांच-पड़ताल के उसकी अपनी पसंद के मुताबिक व्याख्या शुरू हो जाती है। जांच बाद में होती है, पोस्ट और शेयर पहले!

हाल ही में भारत दौरे के दौरान ईरानी राष्ट्रपति डॉ. मसूद पिज़ेशकियान की एक छोटी-सी वीडियो भी सोशल मीडिया के इसी रवैये का शिकार हुई।

ईरानी राष्ट्रपति एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आए थे, जिसमें ईरान के अलावा चीन सहित कई अन्य देशों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे। सम्मेलन के समापन पर पत्रकारों, उलेमा, हिंदू धार्मिक नेताओं और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने उनसे मुलाकात की। कुछ लोगों ने उन्हें पत्र सौंपे और उनके प्रति समर्थन व एकजुटता भी व्यक्त की।

इसी दौरान ईरानी राष्ट्रपति के हाथ से एक पेन और कागज नीचे गिर गया। उन्हें उठाने के लिए वह झुके तो उनके पास खड़े एक हिंदू धार्मिक नेता भी उसी समय झुक गए।

बस, मामला इतना ही था!

लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसी कुछ सेकंड के दृश्य को काट-छांटकर इस तरह पेश किया, जैसे ईरानी राष्ट्रपति किसी धार्मिक व्यक्ति के कदमों में झुककर ऐसा कोई कार्य कर रहे हों, जिसका उनके अकीदे से संबंध हो। इसके बाद पोस्ट, टिप्पणियों और तरह-तरह के दावों का सिलसिला शुरू हो गया।

अफसोस की बात यह है कि बहुत से लोगों ने मूल वीडियो देखने की भी ज़हमत नहीं की और न ही यह सोचा कि कुछ क्षणों के एक दृश्य से इतना बड़ा निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है।

यही सोशल मीडिया के दौर की एक बड़ी समस्या है। वीडियो का एक हिस्सा पूरे घटनाक्रम की जगह ले लेता है, भावनात्मक शीर्षक वास्तविकता पर हावी हो जाता है और बिना जांच-पड़ताल के एक दावा हजारों लोगों तक पहुंच जाता है।

समस्या केवल गलतफहमी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस समय और गंभीर हो जाती है जब किसी घटना को जानबूझकर उसके वास्तविक संदर्भ से अलग करके पेश किया जाता है। ऐसी स्थिति में उद्देश्य सच्चाई जानना नहीं, बल्कि अपनी पसंद की एक धारणा कायम करना होता है।

यह घटना हमें एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण सबक देती है कि वीडियो देख लेना, सच्चाई जान लेने के बराबर नहीं है।

सोशल मीडिया पर किसी भी खबर, तस्वीर या वीडियो को आगे बढ़ाने से पहले पूरी वीडियो देखनी चाहिए, वास्तविक घटना की पृष्ठभूमि समझनी चाहिए और संभव हो तो विश्वसनीय स्रोतों से उसकी पुष्टि भी करनी चाहिए। हमें यह भी सोचना चाहिए कि कहीं हम अनजाने में किसी के झूठे प्रोपेगेंडे का हिस्सा तो नहीं बन रहे हैं।

आज के दौर में झूठ फैलाने के लिए लंबी कहानी या मजबूत तर्क की जरूरत नहीं है; कुछ सेकंड की कटी हुई वीडियो और कुछ भावनात्मक वाक्य ही काफी हैं। इसलिए एक जिम्मेदार नागरिक और जागरूक सोशल मीडिया यूज़र होने का तकाज़ा है कि शेयर करने से पहले जांच करें और भावनाओं से पहले सच्चाई को महत्व दें।

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