अम्बा चौक स्थित ख़ोजा शिया इस्ना अशरी जामा मस्जिद में 18 सितंबर 2026 को ख़ुत्बा-ए-जुमा के दौरान मौलाना सय्यद तहक़ीक़ हुसैन ने तक़वा, फ़राइज़ की पाबंदी, हराम से बचने और नफ़्स के ख़िलाफ़ जिहाद के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इंसान की असली कामयाबी केवल अधिक इबादत करने में नहीं, बल्कि फ़र्ज़ अदा करने, हराम से बचने और अपने चरित्र को सुधारने में है।
अम्बा चौक स्थित ख़ोजा शिया इस्ना अशरी जामा मस्जिद में 18 सितंबर 2026 को ख़ुत्बा-ए-जुमा के दौरान मौलाना सय्यद तहकीक हुसैन ने तक़वा, फ़राइज़ की पाबंदी, हराम से बचने और नफ़्स के ख़िलाफ़ जिहाद के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इंसान की असली कामयाबी केवल अधिक इबादत करने में नहीं, बल्कि फ़र्ज़ अदा करने, हराम से बचने और अपने चरित्र को सुधारने में है।
मौलाना ने इमाम हसन अस्करी (अ.) की एक रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि सबसे अधिक एहतियात करने वाला इंसान वह है जो शुबहात वाली चीज़ों और स्थानों से भी बचता है। जिस चीज़ के बारे में यह संदेह हो कि वह हराम है, उससे रुक जाना चाहिए और जिस स्थान के बारे में शंका हो कि वहां जाना सही है या नहीं, वहां जाने से भी बचना चाहिए। इंसान को संदेह वाली बातों में जल्दबाजी से फैसला नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सबसे अधिक आबिद इंसान वह है जो फ़राइज़ की पाबंदी करता है। केवल बहुत अधिक मुस्तहब नमाज़ें पढ़ना, ज़ियारत करना और मुनाजात करना पर्याप्त नहीं है, अगर इसके साथ कोई फ़र्ज़ छूट रहा हो। अगर कोई व्यक्ति नमाज़-ए-शब पढ़ता रहे और फ़र्ज़ नमाज़-ए-सुबह क़ज़ा करता रहे, तो ऐसी इबादत का क्या लाभ? मुस्तहब इबादत का सवाब तभी है जब इंसान फ़र्ज़ इबादतों की भी पाबंदी करे।
भावनगर के इमाम ए जुमा ने कहा कि फ़र्ज़ केवल पांच वक्त की नमाज़ तक सीमित नहीं हैं। माता-पिता की सेवा करना, पड़ोसियों के अधिकारों का ध्यान रखना और दूसरे लोगों के हक़ अदा करना भी हमारी ज़िम्मेदारियों में शामिल है। इसलिए सच्चा आबिद वही है जो सभी फ़राइज़ को पहचानकर उन्हें अदा करे।
ज़ाहिद कौन है?
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद तहक़ीक़ हुसैन ने कहा कि सबसे बड़ा ज़ाहिद वह है जो हराम को छोड़ दे। ज़ुह्द का अर्थ यह नहीं है कि इंसान दुनिया छोड़कर कहीं अलग हो जाए। इंसान दुनिया में रहते हुए, लोगों के बीच रहते हुए और अपनी ज़िम्मेदारियां निभाते हुए खुद को हराम से बचाए, यही वास्तविक ज़ुह्द है।
उन्होंने कहा कि कई बार इंसान मकरूह चीज़ों से बचने का तो बहुत ध्यान रखता है, लेकिन हराम से बचने में लापरवाही करता है। जबकि असल प्राथमिकता हराम को छोड़ना है। इसलिए सबसे बड़ा ज़ाहिद वह है जो अपने आपको हराम से बचा ले।
नफ़्स के ख़िलाफ़ जिहाद सबसे कठिन जिहाद
मौलाना ने कहा कि सबसे कठिन जिहाद वह है जिसमें इंसान अपने गुनाहों को छोड़ देता है। बाहर के दुश्मन से लड़ना आसान है, लेकिन अपने अंदर छिपे नफ़्स से लड़ना उससे कहीं अधिक कठिन है। बाहरी दुश्मन दिखाई देता है और उसकी ताक़त तथा हथियारों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, लेकिन नफ़्स जो छिपा हुआ दुश्मन है दिखाई नहीं देता। नफ़्स इंसान को पता नहीं चलने देता कि वह कब, किस दिशा से हमला करेगा और उससे कौन-सी गलती करवा देगा। इसलिए अपने नफ़्स पर नियंत्रण रखना और गुनाहों से बचना वास्तविक जिहाद है।
भावनगर के इमाम जुमा ने कहा कि अगर इंसान अपने फ़राइज़ अदा करता है, हराम से बचता है और गुनाहों को छोड़ देता है, तो वह अल्लाह की राह में जिहाद करने वालों में शामिल है। इसी संदर्भ में पैग़म्बर-ए-अकरम (स.) की रिवायत है: “जो व्यक्ति आले-मुहम्मद (स.) की मोहब्बत पर मरे, वह शहीद है।” शहादत का यह दर्जा मामूली नहीं है। अगर इंसान अपनी ज़िंदगी को फ़राइज़ की अदायगी, हराम से बचने और गुनाहों को छोड़ने में गुज़ारता है, तो उसकी मौत भी महान दर्जे का कारण बन सकती है।
तक़वा बेहतरीन नेमत है
मौलाना सय्यद तहकीक हुसैन ने दूसरे ख़ुत्बे में मोमिनों और स्वयं को तक़वा-ए-इलाही, इबादत और अल्लाह की इताअत की नसीहत करते हुए कहा कि तक़वा इंसान के लिए सबसे बेहतरीन नेमत है।
उन्होंने कहा कि क़ुरआन और तरबियत के सिलसिले में सूरा-ए-हुजरात की आयतों में हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण इस्लाही शिक्षाएं मौजूद हैं। सूरा-ए-हुजरात की दूसरी आयत में अल्लाह तआला ईमान वालों को निर्देश देता है कि वे अपनी आवाज़ नबी (स.) की आवाज़ से ऊंची न करें और न ही उनसे उस तरह ऊंची आवाज़ में बात करें, जिस तरह वे आपस में एक-दूसरे से बात करते हैं। ऐसा करने से उनके आमाल के बरबाद होने का खतरा है और उन्हें इसका एहसास भी नहीं होगा।
इस आयत से कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं।
1- नबी (स.) का अदब
मौलाना ने कहा कि पिछली आयत में पैग़म्बर (स.) से अमल के स्तर पर आगे बढ़ने से रोका गया था, जबकि इस आयत में बातचीत के दौरान उनके अदब और सम्मान का निर्देश दिया गया है। अर्थात एक मोमिन को न केवल अपने अमल से बल्कि अपनी ज़बान और व्यवहार से भी पैग़म्बर (स.) का सम्मान करना चाहिए।
2- धार्मिक रहनुमाओं का सम्मान
उन्होंने कहा कि इस आयत का संदेश केवल पैग़म्बर (स.) के ज़ाहिरी जीवन तक सीमित नहीं है। शिया मुफस्सिरीन के अनुसार, इसमें पैग़म्बर (स.) के इरशादात, फ़रमूदात, सुन्नत और उनके बरहक़ उत्तराधिकारियों के सम्मान का संदेश भी मौजूद है। जब अल्लाह पैग़म्बर (स.) के सामने आवाज़ ऊंची करने से रोकता है, तो उनके बरहक़ उत्तराधिकारियों और धार्मिक पेशवाओं के सामने भी अदब और सम्मान का व्यवहार होना चाहिए। अपने धार्मिक और रूहानी पेशवाओं से बातचीत करते समय लहजे में नरमी, सम्मान और शालीनता होनी चाहिए।
3- मोमिन की बातचीत में वक़ार
हुज्जतुल इस्लाम तहक़ीक़ हुसैन ने कहा कि मोमिन की बातचीत में गंभीरता, संजीदगी और वक़ार होना चाहिए। मोमिन चीख-चिल्लाकर बात नहीं करता, बल्कि विनम्रता के साथ अपनी बात रखता है। यह शिक्षा केवल धार्मिक पेशवाओं के लिए नहीं है। एक मोमिन दूसरे मोमिन से किस तरह बात करे, छोटा अपने बड़े से कैसे बात करे, छात्र अपने शिक्षक से किस तरह बात करे और बच्चे अपने माता-पिता से किस तरह बात करें—इन सभी मामलों में लहजे में सम्मान और गंभीरता होनी चाहिए।
4- केवल ज़बान से ईमान का दावा पर्याप्त नहीं
मौलाना ने कहा कि केवल ज़बान से ईमान का दावा करना पर्याप्त नहीं है। इंसान के व्यवहार, बातचीत और चरित्र में भी ईमानी गुण दिखाई देने चाहिए। अगर हमारा व्यवहार इलाही आदाब के अनुसार नहीं है, तो हमें अपने ईमान की वास्तविक स्थिति पर विचार करना चाहिए। मोमिन लगातार तरक़्क़ी करता है। उसकी तरक़्क़ी इबादत, व्यवहार, आध्यात्मिकता और नैतिकता—हर स्तर पर होती है। वह अपने पालनहार के अधिक करीब होता जाता है।
5- बेजा व्यवहार आमाल को बरबाद कर सकता है
मौलाना ने कहा कि मासूम रहबर के सामने अदब का ध्यान न रखना या अपनी राय को अनुचित रूप से प्राथमिकता देना इंसान के नेक आमाल को इस तरह बरबाद कर सकता है कि उसे इसका एहसास तक नहीं होता। इंसान यह समझता रह सकता है कि उसने बहुत नमाज़ें पढ़ीं, रोज़े रखे, ख़ुम्स और ज़कात अदा की, लेकिन कुछ ऐसे कर्म उसके नेक आमाल के प्रभाव को समाप्त कर सकते हैं जिनका उसे स्वयं एहसास भी नहीं होता।
आमाल के हब्त होने का अर्थ
मौलाना तहक़ीक़ हुसैन ने कहा कि क़ुरआन में आमाल के हब्त होने का उल्लेख किया गया है। हब्त का अर्थ है किसी चीज़ का प्रभाव समाप्त हो जाना या उसका बरबाद हो जाना। उदाहरण देते हुए मौलाना ने कहा कि अगर कोई कर्मचारी वर्षों तक ईमानदारी और मेहनत से काम करे और मालिक की नज़र में बहुत अच्छा बन जाए, लेकिन एक दिन ऐसी गंभीर गलती कर दे जिससे उसके वर्षों के अच्छे कामों पर पानी फिर जाए, तो यह हब्त की स्थिति को समझने का एक उदाहरण हो सकता है। इसके विपरीत, कोई व्यक्ति लंबे समय तक लापरवाह रहा हो, लेकिन किसी महत्वपूर्ण अवसर पर ऐसा अच्छा काम कर दे जिससे उसकी पिछली कमियों की भरपाई हो जाए, तो यह भी इंसानी कर्मों के प्रभाव को समझने का उदाहरण है।
भावनगर के इमाम जुमा ने कहा कि इसी तरह इंसान के आमाल में भी कुछ ऐसे गुनाह हैं जो उसके नेक आमाल के प्रभाव को समाप्त कर सकते हैं और कुछ नेकियां ऐसी हैं जो उसके पिछले गुनाहों की भरपाई का कारण बन सकती हैं।
आमाल को बरबाद करने वाली चीजे़
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना तहक़ीक़ हुसैन ने क़ुरआन की शिक्षाओं की रोशनी में आमाल के बरबाद होने के कुछ कारणों का उल्लेख किया।
1- शिर्क और कुफ्र
उन्होंने कहा कि शिर्क और कुफ्र इंसान के आमाल को बरबाद करने वाले सबसे गंभीर कारणों में हैं। सूरा-ए-मुहम्मद की आयत 32 में भी इस संबंध में चेतावनी दी गई है कि जो लोग कुफ्र अपनाते हैं, अल्लाह की राह से रोकते हैं और हिदायत स्पष्ट हो जाने के बाद पैग़म्बर से विरोध करते हैं, उनके आमाल बरबाद हो सकते हैं।
2- अल्लाह को नाराज़ करने वाले काम
इंसान को उन कार्यों से बचना चाहिए जो अल्लाह की नाराज़गी का कारण बनते हैं। अल्लाह की पसंद और उसकी इच्छा के विपरीत काम इंसान के सवाब को समाप्त करने का कारण बन सकते हैं।
3- निफ़ाक़ और दुनिया-परस्ती
मौलाना ने कहा कि निफ़ाक़ भी इंसान के आमाल के लिए नुकसानदेह है। इसी तरह अगर इंसान की पूरी सोच केवल दुनिया हासिल करने तक सीमित हो जाए और वह दीन को भी केवल दुनियावी लाभ के लिए अपनाए, तो यह उसकी आध्यात्मिक स्थिति के लिए गंभीर नुकसान है।
4- रियाकारी
भावनगर के इमाम जुमा ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति केवल लोगों को दिखाने के लिए कोई इबादत या नेक काम करता है, तो उसकी नेकी का असल उद्देश्य समाप्त हो जाता है और उसे उस अमल का अपेक्षित सवाब नहीं मिलता।
5- घमंड और अहंकार
मौलाना तहक़ीक़ हुसैन ने कहा कि घमंड भी इंसान के आमाल के लिए बहुत खतरनाक है। अगर इंसान यह समझने लगे कि उससे बड़ा कोई आबिद नहीं, उससे बड़ा कोई ज़ाहिद नहीं और उससे बड़ा कोई आलिम नहीं, तो उसका यह घमंड उसके नेक आमाल के प्रभाव को समाप्त कर सकता है।
6- अहलेबैत (अ.) से दुश्मनी और फ़र्ज़ इबादत छोड़ना
मौलाना ने कहा कि अहलेबैत (अ.) से दुश्मनी रखना और बिना किसी उचित कारण के फ़र्ज़ नमाज़ को छोड़ देना भी इंसान की आध्यात्मिक स्थिति के लिए गंभीर नुकसान का कारण है। इसी तरह बिना समझ और यक़ीन के अमल करना भी इंसान को नुकसान पहुंचा सकता है।
गुनाहों को मिटाने वाली नेकियां
भावनगर के इमाम जुमा मौलाना सय्यद तहक़ीक़ हुसैन ने कहा कि जिस तरह कुछ चीज़ें आमाल को बरबाद करती हैं, उसी तरह कुछ नेकियां गुनाहों को मिटाने का कारण बनती हैं।
इन नेकियों में ईमान, नेक अमल, तक़वा, ग़रीबों की छिपकर मदद करना, तौबा, गुनाहों से दूरी, नमाज़, ज़कात, क़र्ज़-ए-हसना, अल्लाह की राह में हिजरत और जिहाद जैसे कार्य शामिल हैं। ये ऐसे नेक अमल हैं जिनके माध्यम से इंसान अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत हासिल कर सकता है।
इमाम हसन अस्करी (अ.) की विलादत की मुबारकबाद
मौलाना सय्यद तहकीक हुसैन ने 10 रबीउस्सानी को ग्यारहवें इमाम, हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.) की विलादत के अवसर पर तमाम मोमिनों को पेशगी मुबारकबाद देते हुए कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ.) की ज़िंदगी हमारे लिए दीन की हिफाज़त, तक़वा, सब्र और कठिन परिस्थितियों में अपने ईमान पर क़ायम रहने का महत्वपूर्ण संदेश रखती है।
ईरानी जनता की दृढ़ता का उल्लेख
मौलाना ने मौजूदा परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए ईरानी जनता की दृढ़ता और एकजुटता की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ईरानी जनता 200 रातो से अपने देश और दीन के समर्थन में मैदान में डटी हुई है और लगातार अपने समर्थन का इज़हार कर रही है। मौलाना ने ईरानी जनता के ईमान, साहस और दृढ़ता को सलाम करते हुए कहा कि ऐसी दृढ़ता और अपने विश्वास पर क़ायम रहने की भावना से सीख लेने की जरूरत है।
यमन के हालात
यमन वाकेआन क्या कारनामा अंजाम दिया है अगर इन हालात और वाक़ेआत को देख कर भी इंसान की आंख न खुले कि जहा एक तरफवो कि जहा सऊदी अरब के साथ 9 देशो को समझौता जहा उसके पीछे अमेरिका भी खड़ा है और इजरायल भी खड़ा है और इन तमाम हालात और असबाब के होते हुए जिनके पास कुछ नही पैरो मे चप्पल और बदन पर लुंगी और हकीकत मे उस हिम्मत व ताक़त और दृढ़ता का प्रदर्शन किया है जिस से दुनिया को हैरान कर दिया है और एक चीज अर्ज़ कर दू इस ग़ैबत के ज़माने मे खबरदार रहो, होशियार रहो, आगाह रहो।
मौलाना ने यमन के हालात का उल्लेख करते हुए कहा आयतुल्लाह बहजत (र) फ़रमाते है कि देखो यमन के ऊपर निगाह रखना जितनी तेज़ी से यमन के हालात बदलेंग उतनी तेजी से इमाम का ज़ूहूर होगा इसलिए कि यमनीयो का क़याम ईमाम के ज़ूहूर की हत्मी अलामतो मे से है और ये जो इमाम की कौम निकलेगी वो इमाम की नुसरत मे निकलेगी इमाम की मदद मे निकलेगी
उन्होने अंत में कहा कि जब इंसान अल्लाह की राह में सच्चे इरादे के साथ आगे बढ़ता है और अपने उद्देश्य में अल्लाह पर भरोसा करता है, तो अल्लाह उसकी मदद और हिफाज़त का रास्ता पैदा करता है। मोमिनों को तक़वा, फ़राइज़ की पाबंदी, हराम से दूरी, गुनाहों को छोड़ने, नफ़्स के ख़िलाफ़ जिहाद करने, अहलेबैत (अ.) की शिक्षाओं पर अमल करने और आपसी एकता को मजबूत बनाने की नसीहत की।