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बातिल कितना भी ताकतवर हो, हमेशा ह़क की जीत होती हैं

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बातिल कितना भी ताकतवर हो, हमेशा ह़क की जीत होती हैं

इमाम ए जुमआ भादी शाहगंज जौनपुर मौलाना सय्यद मासूम रज़ा कैफ़ी ने जुमआ के ख़ुत्बे में कहां,हक़ और बातिल के बीच संघर्ष मानव इतिहास का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। इतिहास गवाह है कि जब भी सत्य और असत्य आमने-सामने आए, तो परिस्थितियां चाहे कितनी ही कठिन क्यों न रही हों, सत्य ने अपनी पहचान और प्रभाव बनाए रखा। हक़ का रास्ता इंसाफ, सच्चाई और मानवता पर आधारित होता है, जबकि बातिल का आधार अन्याय, झूठ और अत्याचार होता है।

इमाम ए जुमआ भादी शाहगंज;मौलाना सय्यद  मासूम रज़ा कैफी ने जुमआ के ख़ुत्बे में कहां,हक़ और बातिल के बीच संघर्ष मानव इतिहास का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। इतिहास गवाह है कि जब भी सत्य और असत्य आमने-सामने आए, तो परिस्थितियां चाहे कितनी ही कठिन क्यों न रही हों, सत्य ने अपनी पहचान और प्रभाव बनाए रखा। हक़ का रास्ता इंसाफ, सच्चाई और मानवता पर आधारित होता है, जबकि बातिल का आधार अन्याय, झूठ और अत्याचार होता है।

कुरआन मजीद ने भी हक़ और बातिल के संबंध में स्पष्ट संदेश दिया है। सूरह अल-इसरा में अल्लाह तआला फरमाता है,और कह दीजिए कि हक़ आ गया और बातिल मिट गया, निश्चय ही बातिल मिटने वाला है। (सूरह अल-इसरा, 17:81) यह आयत इस बात की ओर संकेत करती है कि असत्य की ताकत चाहे कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखाई दे, लेकिन उसका अस्तित्व स्थायी नहीं होता।

इस्लामी शिक्षाओं में हक़ पर कायम रहने को विशेष महत्व दिया गया है। इंसान के लिए केवल सत्य को पहचानना पर्याप्त नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी उसके साथ खड़ा रहना जरूरी है। इसके लिए धैर्य, ईमान, न्याय और सही सोच की आवश्यकता होती है। जब समाज के लोग सत्य और न्याय के सिद्धांतों को अपनाते हैं, तो अन्याय के खिलाफ सकारात्मक बदलाव की राह खुलती है।

कर्बला का इतिहास भी हक़ और बातिल के संघर्ष की एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और सत्य का साथ नहीं छोड़ा। कर्बला हमें यह संदेश देती है कि संख्या और सांसारिक शक्ति हमेशा सत्य की कसौटी नहीं होती; बल्कि सिद्धांतों पर दृढ़ रहना भी इतिहास में गहरी छाप छोड़ सकता है।

आज के दौर में हक़ का साथ देने का अर्थ जिम्मेदारी और इंसाफ के साथ खड़ा होना है। झूठी खबरों, गलत जानकारी और अन्याय के वातावरण में किसी भी बात को बिना जांचे स्वीकार या प्रसारित करने के बजाय सत्य की पुष्टि करना जरूरी है। अपने व्यवहार में ईमानदारी, दूसरों के अधिकारों का सम्मान और कमजोरों के साथ न्याय करना भी हक़ की राह पर चलने का हिस्सा है।

अंततः बातिल की चमक अस्थायी और हक़ की रौशनी स्थायी मानी जाती है। परिस्थितियां कितनी भी कठिन हों, सत्य, न्याय और इंसाफ के सिद्धांतों को मजबूती से अपनाना ही समाज को बेहतर दिशा दे सकता है। इसलिए हर व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपने जीवन में सत्य का समर्थन करे और अन्याय से दूर रहते हुए शांतिपूर्ण तथा जिम्मेदार तरीके से हक़ की राह को मज़बूत बनाए।

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