मदरसा-ए-इल्मिया फ़ातेमिया की प्रचारक ने क़ुरआन की आयतों और ऐतिहासिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए हस्द को इंसान की दुनिया और आख़िरत में नाकामी का कारण बताया और इससे बचने तथा इसे नियंत्रित करने के उपाय बताए।
मदरसा-ए-इल्मिया फ़ातेमिया महलात के सांस्कृतिक विभाग के प्रयासों से आज एक सार्वजनिक नैतिकता सभा आयोजित की गई। इसमें इसी मदरसे की प्रचारक सुश्री मुर्तज़ाई ने भाग लिया।
मुर्तज़ाई ने क़ुरआन और रिवायतों की रोशनी में हस्द के विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि क़ुरआन में हस्द का सात बार उल्लेख हुआ है। पहला हाबील और क़ाबील की घटना में, दूसरा हज़रत यूसुफ़ (अ) के भाइयों की घटना में, तीसरा कुछ मुशरिकों द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम (स) से हस्द के संदर्भ में और चौथे से सातवें स्थान तक यहूदियों और अहले-किताब द्वारा मोमिनों और मुसलमानों से हस्द के संदर्भ में।
उन्होंने क़ुरआन में हस्द के विशेष महत्व की ओर इशारा करते हुए कहा कि अल्लाह ने सूरह फ़लक में सभी बुराइयों और शर को एक ओर और हस्द को दूसरी ओर रखा है, जो इस बुरी आदत की गंभीरता और खतरे को दर्शाता है।
मदरसा-ए-इल्मिया फ़ातेमिया की प्रचारक ने ग़ैबत-ए-सुग़रा के दौर का एक ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि जब इमाम ज़माना (अज.) के दूसरे विशेष नायब, मुहम्मद बिन उस्मान मौजूद नहीं थे, तब अली बिन मुहम्मद शलमगानी उनके उत्तराधिकारी और लोगों तथा इमाम ज़माना (अज.) के बीच संपर्क का माध्यम थे।
वह इस उम्मीद में रहते थे कि इमाम के तीसरे नायब वही नियुक्त होंगे। लेकिन जब हुसैन बिन रूह को तीसरे नायब के रूप में नियुक्त किया गया तो शलमगानी अत्यधिक हस्द के कारण गुमराही की ओर चला गया और एक नया धर्म गढ़ने लगा। उसने बड़े-बड़े पापों को जायज़ ठहराया और धार्मिक मामलों को उलट-पुलट कर पेश किया।
मुर्तज़ाई ने कहा कि हस्द करने वाला व्यक्ति न दुनिया हासिल कर पाता है और न आख़िरत, क्योंकि वह लगातार असफलता और मानसिक बेचैनी में रहता है।
उन्होंने अंत में हस्द को नियंत्रित करने और उसका इलाज करने के कुछ उपाय बताए। इनमें क़ुनूत में सूरह हश्र की आयत 10 की तिलावत, अपने पास मौजूद नेमतों के प्रति विश्वास और संतुष्टि को मजबूत करना तथा दूसरों की हस्द से सुरक्षित रहने के लिए लगातार सूरह फ़लक और “फ़ल्लाहु ख़ैरुन हाफ़िज़ा” की तिलावत को प्रभावी बताया।
मुर्तज़ाई ने आगे कहा कि भले ही किसी व्यक्ति के प्रति हमारे मन में अच्छी भावना न हो, फिर भी हमें उसकी प्रशंसा और अच्छाइयों का ज़िक्र करना चाहिए। यानी अपने भीतर मौजूद हस्द के विपरीत व्यवहार करके उसका मुकाबला करना चाहिए, ताकि हस्द की भावना धीरे-धीरे दब सके।