Print this page

इंसान के सामाजिक संबंध सत्य और तक़वा की बुनियाद पर होने चाहिए।आयतुल्लाह तहरीरी

Rate this item
(0 votes)
इंसान के सामाजिक संबंध सत्य और तक़वा की बुनियाद पर होने चाहिए।आयतुल्लाह तहरीरी

तेहरान में मदरसा ए इल्मिया मरवी के मुतवल्ली आयतुल्लाह मुहम्मद बाक़िर तहरीरी ने कहा कि एक परहेज़गार इंसान को अपने दोस्तों, साथियों और दूसरे लोगों से संबंध बनाते समय सत्य, तक़वा और धार्मिक सिद्धांतों को मापदंड बनाना चाहिए। किसी के करीब जाना या उससे दूरी बनाना व्यक्तिगत लाभ, इच्छाओं या अहंकार की बुनियाद पर नहीं होना चाहिए।

 आयतुल्लाह मुहम्मद बाक़िर तहरीरी ने अपने दर्स-ए-अख़्लाक़ में हज़रत अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) के ख़ुत्बा-ए-मुत्तक़ीन की व्याख्या करते हुए कहा कि इंसान की बहुत-सी अच्छी और बुरी विशेषताएं उसके सामाजिक संबंधों में सामने आती हैं। इसलिए ज़रूरी है कि इंसान अपने संबंधों के प्रभाव को समझे और यह देखे कि किन लोगों की संगत उसके ईमान और तक़वा को मज़बूत करती है।

उन्होंने कहा कि अच्छे संबंध की बुनियादी निशानी यह है कि इंसान स्वयं भी धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने वाला हो और सामने वाला भी कम से कम वाजिब कार्यों को पूरा करने तथा हराम कामों से बचने का ध्यान रखता हो। इंसान के विश्वास भी उसके व्यवहार पर प्रभाव डालते हैं, इसलिए दोस्तों और साथियों का चयन करते समय उनके धार्मिक विचारों और व्यावहारिक चरित्र को भी ध्यान में रखना चाहिए।

आयतुल्लाह तहरीरी ने चेतावनी दी कि कुछ लोग देखने में धार्मिक रूप-रंग रखते हैं, लेकिन उनके भीतर गलत उद्देश्य, धोखा या व्यक्तिगत स्वार्थ हो सकते हैं। इसलिए केवल बाहरी रूप को मापदंड नहीं बनाना चाहिए, बल्कि इंसान के कार्यों और चरित्र को भी देखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि किसी से दूरी बनाना भी अहंकार, आत्ममुग्धता या दूसरों को तुच्छ समझने की वजह से नहीं होना चाहिए। मोमिन को असत्य और बातिल के मुकाबले मजबूत तथा ईमान वालों के प्रति नरम और दयालु होना चाहिए। कुरआन मजीद ने भी रसूले अकरम (स.ल.) के साथियों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह बताई है कि वे बातिल के मुकाबले दृढ़ और आपस में दयालु थे।

आयतुल्लाह तहरीरी ने बैअत-ए-रिज़वान और सुलह-ए-हुदैबिया का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्य के साथ जुड़ाव केवल ज़बानी दावा नहीं, बल्कि ईमान, वफ़ादारी, दृढ़ता और व्यावहारिक आज्ञापालन की मांग करता है। हज़रत अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) की आज्ञा का पालन और रसूले अकरम (स.ल.) के आदेश के सामने समर्पण इसकी स्पष्ट मिसाल है।

उन्होंने अंत में कहा कि नेक और सालेह लोगों की संगत इंसान की धार्मिक और नैतिक तरक्की का माध्यम बनती है। इसलिए इंसान को अपने पारिवारिक, दोस्ताना और सामाजिक संबंधों में हमेशा यह देखना चाहिए कि उसका संबंध अल्लाह की रज़ा और सत्य की बुनियाद पर है या व्यक्तिगत स्वार्थ और इच्छाओं के प्रभाव में।

Read 4 times