दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ के मोहतमिम, प्रसिद्ध धर्मशास्त्री, शिक्षक, साहित्यकार और लेखक मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी के निधन से शैक्षणिक और बौद्धिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उन्होंने अपने लंबे विद्वतापूर्ण जीवन को शिक्षा-प्रशिक्षण, अरबी साहित्य एवं पत्रकारिता तथा दारुल उलूम नदवतुल उलेमा की शैक्षणिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को निभाने में समर्पित किया। भारतीय उपमहाद्वीप के शैक्षणिक और धार्मिक परिदृश्य में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
लखनऊ में दारुल उलूम नदवतुल उलेमा के मोहतमिम, प्रसिद्ध धर्मशास्त्री, शिक्षक, साहित्यकार और लेखक मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी के निधन की खबर से शैक्षणिक और धार्मिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन को भारतीय उपमहाद्वीप के धार्मिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण विद्वान के निधन के रूप में देखा जा रहा है। मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी ने अपने लंबे विद्वतापूर्ण जीवन में शिक्षण, प्रशिक्षण, अरबी साहित्य, पत्रकारिता, लेखन तथा संस्थागत जिम्मेदारियों के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं दीं।
उनकी शख्सियत की प्रमुख विशेषता ज्ञान के साथ उसका व्यवहारिक अनुप्रयोग, शिक्षा के साथ प्रशिक्षण और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ कर्तव्यबोध था। दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से उनके लंबे जुड़ाव ने उन्हें संस्था की शैक्षणिक और बौद्धिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया था। वह नदवतुल उलेमा को केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि एक शैक्षणिक अमानत मानते थे और इसकी शैक्षणिक तथा प्रशासनिक जिम्मेदारियों को पूरी गंभीरता से निभाते रहे।
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी के शिक्षण व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू छात्रों की शैक्षणिक और व्यावहारिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देना था। उनकी कक्षा में प्रवेश करते ही छात्रों को ज्ञान के महत्व, शिक्षक के सम्मान और पाठ की गंभीरता का एहसास होता था। वह पाठ की शुद्धता, भाषा की बारीकियों, सही वर्तनी और शैक्षणिक सटीकता के मामले में विशेष रूप से सजग रहते थे। अरबी साहित्य, अलंकारशास्त्र और इस्लामी علوم के गूढ़ विषयों को वह अत्यंत ध्यान और एकाग्रता के साथ पढ़ाते थे। हालांकि उनका शिक्षण केवल किताब के पाठ तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि छात्रों के शैक्षणिक रुझान, भाषा, लेखन और बौद्धिक प्रशिक्षण पर भी प्रभाव डालता था।
छात्रों के व्यावहारिक प्रशिक्षण के मामले में भी उनका तरीका उल्लेखनीय था। वह लेखन और साफ-सुथरी लिखावट, सही वर्तनी, काम में व्यवस्थित ढंग, समय की पाबंदी और अपनी जिम्मेदारियों के एहसास पर विशेष जोर देते थे। उनके अनुसार एक छात्र और जिम्मेदार व्यक्ति के लिए केवल शैक्षणिक जानकारी पर्याप्त नहीं है, बल्कि अनुशासन, अच्छे आचरण और अपने कर्तव्यों का निर्वहन भी आवश्यक है।
समय की पाबंदी उनकी शख्सियत की प्रमुख विशेषता थी। जब तक उनके जिम्मे इमामत की जिम्मेदारी रही, वह नमाज के समय की पाबंदी का विशेष ध्यान रखते थे। नदवतुल उलेमा के हलकों में उनकी समय की पाबंदी के संबंध में यह बात मशहूर थी कि लोग उनके आने के समय से अपनी घड़ियां मिला लिया करते थे। जुमे के खुतबों में भी वह औपचारिक बातचीत के बजाय समय के महत्वपूर्ण मुद्दों और समाज की जरूरतों को विषय बनाते थे। उनकी बातचीत में सरलता के साथ सीधे प्रभाव पैदा करने की क्षमता थी।
अरबी साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ाव
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी के विद्वतापूर्ण व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू अरबी साहित्य और पत्रकारिता से उनका गहरा जुड़ाव था। मासिक पत्रिका अल-बअस अल-इस्लामी से उनकी लंबी संबद्धता और संपादन ने अरब जगत में नदवतुल उलेमा की शैक्षणिक गतिविधियों और बौद्धिक आवाज को पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके संपादकीय, लेख और अन्य साहित्यिक सेवाएं उनके लेखक व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करती हैं।
उनका विद्वतापूर्ण जीवन केवल शिक्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि लेखन, पत्रकारिता, भाषण और दावत के विभिन्न क्षेत्रों तक फैला हुआ था। अरबी साहित्य के क्षेत्र में उनकी सेवाओं के सम्मान में उन्हें 1994 में राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उनके जीवन और शैक्षणिक एवं साहित्यिक सेवाओं के विभिन्न पहलुओं पर एक विस्तृत शोध पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें उनके शिक्षण, साहित्यिक, पत्रकारिता और प्रशासनिक जीवन का जायजा लिया गया है।
दारुल उलूम नदवतुल उलेमा की जिम्मेदारी
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी ने दारुल उलूम नदवतुल उलेमा के मोहतमिम के रूप में भी लंबे समय तक जिम्मेदारियां निभाईं। पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से वह संस्था की प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़े रहे और नदवतुल उलेमा की शैक्षणिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई।
उनकी नजर में संस्था की जिम्मेदारी केवल प्रशासनिक कार्यों को पूरा करने का नाम नहीं थी, बल्कि उसके शैक्षणिक माहौल, शिक्षण परंपरा और छात्रों के प्रशिक्षण को बनाए रखना भी इस जिम्मेदारी का हिस्सा था। यही कारण है कि उनकी शख्सियत में शिक्षक, प्रशिक्षक और प्रशासक के विभिन्न पहलू एक साथ दिखाई देते थे।
मौलाना सैयद सादिक हुसैनी ने जताया शोक
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी के निधन पर मुस्सिसा तकरीब-ए-मज़ाहिब-ए-हिंद के अध्यक्ष हज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद सादिक हुसैनी ने गहरा दुख व्यक्त किया है।
उन्होंने कहा कि दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ के मुदीर और मोहतमिम मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी का निधन भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों के लिए एक बड़ा शैक्षणिक नुकसान है। उनकी शैक्षणिक, सांस्कृतिक और प्रशिक्षण संबंधी सेवाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण विरासत हैं।
मौलाना सैयद सादिक हुसैनी ने कहा कि इस्लामी भाईचारे और उम्मत के बीच एकता के लिए मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी के प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने बताया कि इन विषयों पर उनकी मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी से कई बार बातचीत हुई थी। वह उम्मत के बीच विभाजन और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर गहरी चिंता और पीड़ा व्यक्त करते थे।
मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी के निधन से शैक्षणिक, शिक्षण और साहित्यिक क्षेत्रों में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ है, जिसे लंबे समय तक महसूस किया जाएगा। उनकी शिक्षण सेवाएं, अरबी साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ाव, छात्रों का प्रशिक्षण तथा दारुल उलूम नदवतुल उलेमा की जिम्मेदारियों का निर्वहन उनके विद्वतापूर्ण जीवन के महत्वपूर्ण अध्यायों के रूप में याद किया जाएगा।
संक्षिप्त जीवन परिचय
मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी का जन्म 14 मई 1934 को मऊ, आज़मगढ़ में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा तथा आलिमियत और फ़ज़ीलत की पढ़ाई उन्होंने जामिया मिफ्ताहुल उलूम, मऊ से पूरी की, जबकि उच्च धार्मिक शिक्षा और विशेषज्ञता दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ से हासिल की। उच्च शिक्षा के लिए वह बगदाद विश्वविद्यालय, इराक गए।
1955 से वह दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ से शिक्षण के क्षेत्र में जुड़े रहे और कई दशकों तक अध्यापन की जिम्मेदारियां निभाईं। बाद में उन्होंने संस्था की प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी संभालीं और 25 वर्षों से अधिक समय तक मोहतमिम के रूप में सेवाएं दीं। अरबी साहित्य के क्षेत्र में उनकी सेवाओं के सम्मान में उन्हें 1994 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
