Print this page

सच्चाई ईमान की पहचान और झूठ समाज की बर्बादी का कारण बनता है।

Rate this item
(0 votes)
सच्चाई ईमान की पहचान और झूठ समाज की बर्बादी का कारण बनता है।

इमाम ए जुमआ भादी शाहगंज जौनपुर हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद मासूम रज़ा कैफ़ी ने जुमआ के ख़ुत्बे में कहां, क़ुरआने मजीद की आयत «کُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ» (सच्चे लोगों के साथ हो जाओ) की रौशनी में सच्चाई और ईमानदारी की अहमियत बयान की। उन्होंने कहा कि सच्चा मोमिन वही है जिसकी ज़बान, दिल और अमल में एकरंगता हो। अहलेबैत (अ.स.) की तालीमात का तक़ाज़ा है कि इंसान झूठ, ख़यानत, ग़ीबत और बेबुनियाद इल्ज़ाम से बचे तथा अपनी ज़िंदगी में सच्चाई इंसाफ़ और अमानतदारी को अपनाए।

इमाम ए जुमआ भादी शाहगंज;मौलाना सय्यद  मासूम रज़ा कैफी ने 16 अक्टूबर 2026 को जुमआ के ख़ुत्बे में कहां,
قال الله تعالى في كتابه الكريم:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ

ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ। (सूरह अत-तौबा, 9:119)

यानी सच्चे लोगों के साथ रहो। अल्लाह तआला ने इस आयत में पहले तक़वा का हुक्म दिया और उसके बाद सादिक़ीन की सोहबत इख़्तियार करने का आदेश दिया। इससे मालूम होता है कि सच्चाई और परहेज़गारी का आपस में गहरा रिश्ता है। सच्चाई केवल ज़बान से सच बोलने का नाम नहीं, बल्कि दिल, ज़बान, किरदार और अमल में एकरंग होने का नाम है। जो इंसान अल्लाह से डरता है, वह अपने फ़ायदे के लिए झूठ नहीं बोलता, किसी का हक़ नहीं मारता और हक़ को पहचानने के बाद उससे मुँह नहीं मोड़ता। लिहाज़ा हमें देखना चाहिए कि हमारी ज़िंदगी में सच्चाई कितनी है और हम किन लोगों की सोहबत इख़्तियार कर रहे हैं।

सच्चे लोग कौन हैं?

अज़ीज़ाने गिरामी! सच्चे लोग वह हैं जिनकी ज़बान और अमल में फ़र्क़ नहीं होता, जो वादा करके निभाते हैं, अमानत में ख़यानत नहीं करते और मुश्किल हालात में भी सच का दामन नहीं छोड़ते। क़ुरआने मजीद सूरह अल-अहज़ाब की आयत 23 में इरशाद होता है:

مِنَ الْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَيْهِ

मोमिनों में ऐसे लोग हैं जिन्होंने अल्लाह से किए हुए अपने अहद को सच्चा करके दिखाया।

सच्चाई की सबसे रौशन मिसाल रसूले अकरम (स.ल.) और अहलेबैत (अ.स.) की पाक ज़िंदगी है। हज़रत अली (अ.स.) ने अपनी ज़िंदगी में इंसाफ़, वफ़ादारी और हक़ की पैरवी को अहमियत दी। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से मंसूब तालीमात में भी सच्चाई और अमानतदारी को मोमिन के किरदार की बुनियाद बताया गया है।

एक मोमिन की पहचान केवल उसकी इबादत, ज़ाहिरी लिबास या धार्मिक बातों से नहीं होती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह लोगों के साथ कैसा बर्ताव करता है। अगर कोई शख़्स नमाज़ पढ़ता है, मजलिस में जाता है और अहलेबैत (अ.स.) की मोहब्बत का दावा करता है, तो उसके लिए ज़रूरी है कि वह अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी सच्चाई और इंसाफ़ को अपनाए।

सच्चाई ईमान की पहचान और झूठ समाज की बर्बादी का कारण बनता है।

झूठे लोगों की पहचान और अहलेबैत (अ.स.) की हदीस:

झूठा कौन है? वह जो जानते हुए ग़लत बात कहे, वादाख़िलाफ़ी करे, झूठी गवाही दे, दूसरों पर बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाए या अपने फ़ायदे के लिए हक़ को छिपाए। कभी-कभी इंसान अपनी ग़लती छिपाने के लिए झूठ बोलता है और कभी किसी दूसरे को नुक़सान पहुँचाने के लिए। मगर याद रखिए, झूठ इंसान के किरदार और एतमाद को नुक़सान पहुँचाता है।

इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से रिवायत है:

إِنَّ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ لَمْ يَبْعَثْ نَبِيًّا إِلَّا بِصِدْقِ الْحَدِيثِ وَأَدَاءِ الْأَمَانَةِ إِلَى الْبَرِّ وَالْفَاجِرِ

बेशक अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ने हर नबी को सच्ची बात कहने और नेक व बद, हर तरह के लोगों की अमानत अदा करने की तालीम के साथ भेजा।

इस रिवायत का मज़मून शिया हदीसी तालीमात में सच्चाई और अमानतदारी की अहमियत को बयान करता है। (अल-काफ़ी, किताब अल-ईमान वल-कुफ़्र, बाब अस-सिद्क़ व अदाइल-अमानह; रिवायत के अरबी अल्फ़ाज़ के संस्करण की जाँच ज़रूरी है।) इससे हमें सबक़ मिलता है कि सच्चाई केवल अपने दोस्तों के साथ नहीं, बल्कि हर इंसान के साथ ज़रूरी है। अमानतदार होना केवल माल की हिफ़ाज़त करना नहीं, बल्कि किसी की इज़्ज़त, राज़ और ज़िम्मेदारी की हिफ़ाज़त करना भी है।

कर्बला और सच्चाई की अज़ीम मिसाल:

जब हम सच्चाई, वफ़ा और हक़ पर साबित-क़दमी का ज़िक्र करते हैं, तो हमारी निगाह कर्बला की तरफ़ जाती है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने क़ियाम के ज़रिए यह पैग़ाम दिया कि इंसान को बातिल के सामने झुकने के बजाय हक़ का साथ देना चाहिए। कर्बला हमें सिखाती है कि सच्चाई का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता, मगर हक़ पर क़ायम रहना मोमिन की ज़िम्मेदारी है।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के साथी अपने अहद और वफ़ा पर क़ायम रहे और उन्होंने अपने इमाम का साथ नहीं छोड़ा। हमें इस सीरत से यह सबक़ लेना चाहिए कि सच्चाई केवल ज़बान से किसी बात की तस्दीक़ करने का नाम नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उस पर अमल करने का नाम भी है।

अगर हम इमाम हुसैन (अ.स.) से मोहब्बत करते हैं, तो हमें अपने घर, कारोबार और समाज में झूठ, ज़ुल्म, ख़यानत और नाइंसाफ़ी से बचना चाहिए। मोहब्बत-ए-अहलेबैत (अ.स.) का तक़ाज़ा है कि हमारा किरदार भी उनकी तालीमात के मुताबिक़ हो।

सच्चाई और समाज की इस्लाह:

समाज की इस्लाह उस वक़्त तक मुमकिन नहीं, जब तक हम अपनी ज़बान और अपने अमल की इस्लाह नहीं करते। अगर माँ-बाप बच्चों के सामने झूठ बोलेंगे, तो बच्चों से सच्चाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है? अगर कारोबारी नाप-तौल में कमी करेगा, अगर कोई शख़्स झूठी ख़बर फैलाएगा या किसी पर बग़ैर सबूत इल्ज़ाम लगाएगा, तो समाज में भरोसा कैसे बाक़ी रहेगा? क़ुरआने करीम सूरह अल-हज्ज की आयत 30 में फ़रमाता है:

وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ

और झूठी बात से बचो।

हमें चाहिए कि सुनी-सुनाई बात को बग़ैर तहक़ीक़ आगे न बढ़ाएँ, ग़ीबत और तोहमत से बचें, किसी की इज़्ज़त को नुक़सान न पहुँचाएँ और अपने फ़ायदे के लिए किसी का हक़ न मारें। सच्चे लोगों का साथ देने का मतलब यह भी है कि हम हक़ के मामले में अपने और पराए के बीच फ़र्क़ न करें। अगर हमारा अपना क़रीबी ग़लती करे, तो उसे भी मोहब्बत और हिकमत के साथ सही रास्ता दिखाएँ। यही वह अख़लाक़ है जो एक नेक समाज की बुनियाद बनता है।

दुआ, तौबा और सच्चाई पर चलने का अहद:

आख़िर में तमाम मोमिनीन से गुज़ारिश है कि हम अपना मुहासबा करें। क्या हमारी ज़बान सच बोलती है? क्या हम अपने वादे पूरे करते हैं? क्या हम अमानत की हिफ़ाज़त करते हैं? क्या हम दूसरों के हक़ का ख़याल रखते हैं? अगर हमसे ग़लती हुई है, तो अल्लाह की बारगाह में तौबा करें और जिसकी हक़तलफ़ी की है, उसका हक़ अदा करने की कोशिश करें। आइए, हम अहद करें कि झूठी गवाही नहीं देंगे, बेबुनियाद इल्ज़ाम नहीं लगाएंगे, किसी की अमानत में ख़यानत नहीं करेंगे और हर हाल में हक़ का साथ देंगे।

اللَّهُمَّ اجْعَلْنَا مِنَ الصَّادِقِينَ، وَوَفِّقْنَا لِاتِّبَاعِ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ، وَطَهِّرْ أَلْسِنَتَنَا مِنَ الْكَذِبِ، وَقُلُوبَنَا مِنَ النِّفَاقِ، وَأَعْمَالَنَا مِنَ الرِّيَاءِ.

ऐ अल्लाह! हमें सच्चे लोगों में शामिल फ़रमा, हमें मुहम्मद व आले-मुहम्मद (अ.) की पैरवी की तौफ़ीक़ अता फ़रमा, हमारी ज़बानों को झूठ से, हमारे दिलों को निफ़ाक़ से और हमारे आमाल को रियाकारी से पाक रख।

Read 33 times