हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन गुलाम अली सफ़ाई बुशहरी ने कहा कि कुरान की दृष्टि में क़िसास समाज में जीवन की रक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
ईरान के बुशहर प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन गुलाम अली सफ़ाई बुशहरी ने राष्ट्रीय कुरान विकास परिषद के 70वें सत्र में सूरह अल-बक़रा की आयत 178 और 179 की व्याख्या करते हुए क़िसास को अल्लाह के निश्चित आदेशों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि यह व्यक्तिगत और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने कहा कि पवित्र कुरान में अल्लाह तआला का फरमान «وَلَكُمْ فِي الْقِصَاصِ حَيَاةٌ» (और तुम्हारे लिए क़िसास में जीवन है) इस बात पर जोर देता है कि क़िसास समाज में जीवन की रक्षा करता है और असुरक्षा को फैलने से रोकता है।
हुज्जतुल इस्लाम सफ़ाई बुशहरी ने कुरान में अल्लाह के संबोधन की शैली का उल्लेख करते हुए कहा कि जब इंसान ईमान की दुनिया में प्रवेश करता है, तो कई स्थानों पर अल्लाह का संबोधन किसी एक व्यक्ति के बजाय पूरे ईमान वाले समुदाय के लिए होता है। इसलिए «يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا» यानी ‘ऐ ईमान वालो!’ का संबोधन सभी मोमिनों के लिए है, न कि किसी विशेष व्यक्ति के लिए।
उन्होंने सूरह अल-बक़रा की आयत 178 में आए शब्द «كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِصَاصُ» की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘तुम पर क़िसास निर्धारित किया गया है’ का अर्थ अल्लाह के आदेश की पुष्टि और उसके महत्व को स्पष्ट करना है। इससे पता चलता है कि ईश्वरीय कानून में इस आदेश का विशेष स्थान है।
क़िसास के शाब्दिक अर्थ पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ अपराध के अनुरूप जवाबी कार्रवाई करना है। इस आयत में इसका संबंध हत्या और अन्य गंभीर अपराधों के मामले में निर्धारित दंड से है।
उन्होंने सभ्यता के निर्माण और उसके स्थायित्व में सुरक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी सभ्यता के विकास के लिए सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक है। इसमें व्यक्तिगत सुरक्षा के साथ-साथ समाज के विभिन्न क्षेत्रों की सुरक्षा भी शामिल है। इसलिए अपराधों से निपटने वाले ईश्वरीय आदेशों को समाज के जीवन और सुरक्षा की रक्षा के संदर्भ में समझना चाहिए।
बुशहर के इमाम ए जुमा ने कहा कि इस्लाम में क़िसास के आदेश के साथ माफ़ी और क्षमा का विकल्प भी मौजूद है। पवित्र कुरान क़िसास का उल्लेख करने के साथ-साथ शरीयत के निर्धारित नियमों के अंतर्गत क्षमा और दंड में रियायत की गुंजाइश को भी स्वीकार करता है।
उन्होंने सूरह अल-बक़रा की आयत 179 का उल्लेख करते हुए कहा:
«وَلَكُمْ فِي الْقِصَاصِ حَيَاةٌ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ»
अर्थात, ‘ऐ बुद्धिमानो! तुम्हारे लिए क़िसास में जीवन है, ताकि तुम परहेज़गारी अपनाओ।
उन्होंने कहा कि यह आयत साहित्यिक और भाषाई दृष्टि से भी विशेष महत्व रखती है। इसमें क़िसास और जीवन के बीच संबंध स्थापित करके सामाजिक जीवन की रक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सच्चाई को स्पष्ट किया गया है।
हुज्जतुल इस्लाम सफ़ाई बुशहरी ने कहा कि पहली नजर में क़िसास को किसी व्यक्ति के जीवन के अंत के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन गहराई से विचार करने पर पता चलता है कि क़ानून के अनुसार क़िसास का कार्यान्वयन हत्या और अपराधों की पुनरावृत्ति को रोकने में मदद कर सकता है। इसका निवारक प्रभाव समाज में शांति और सुरक्षा बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि क़िसास का सामाजिक उद्देश्य सामूहिक जीवन की रक्षा करना और अपराधों की पुनरावृत्ति को रोकना है। यह विषय समाज की सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण है और ईश्वरीय आदेशों की बुद्धिमत्ता को समझने की आवश्यकता को उजागर करता है।
अंत में, बुशहर प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि ने आयत में प्रयुक्त शब्द «يَا أُولِي الْأَلْبَابِ» यानी ‘ऐ बुद्धिमानो!’ की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि कुरान बुद्धिमान लोगों को क़िसास के सामाजिक प्रभावों पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह आदेश तक़वा, सामाजिक जीवन की रक्षा और सामूहिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।