बेमिना बडगाम स्थित आयतुल्लाह यूसुफ इमामबाड़े में आगा सैयद मोहम्मद फ़ज़लुल्लाह मूसवी सफवी की बरसी के अवसर पर संबोधित करते हुए आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने समाज सुधार, कुरआन और अहलेबैत से जुड़ाव तथा मुसलमानों की एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विद्वानों और धर्म प्रचारकों को सामाजिक बुराइयों और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए उम्मत के सुधार में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
बेमिना बडगाम स्थित आयतुल्लाह यूसुफ इमामबाड़े में आयोजित मजलिस को आयतुल्लाह सैयद यूसुफ मेमोरियल ट्रस्ट के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने संबोधित किया। उन्होंने कुरआन की इस आयत को अपने भाषण का आधार बनाया:
“और आपका रब ऐसा नहीं है कि बस्तियों को अन्याय के कारण नष्ट कर दे, जबकि उनके निवासी सुधार करने वाले हों।”
इस आयत की व्याख्या करते हुए उन्होंने समाज सुधार और सामूहिक जिम्मेदारी के महत्व पर प्रकाश डाला।
स्वर्गीय आगा सैयद मोहम्मद फ़ज़लुल्लाह मूसवी सफवी को श्रद्धांजलि
मजलिस की शुरुआत में आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने स्वर्गीय हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आगा सैयद मोहम्मद फ़ज़लुल्लाह मूसवी सफवी की बरसी पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उनकी शैक्षिक एवं धार्मिक सेवाओं को याद किया। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय आगा साहब धर्म के लिए किए जाने वाले प्रत्येक कार्य में निष्ठा को बुनियादी शर्त मानते थे। उन्होंने कुरआन के ज्ञान, पवित्र शरीअत और इस्लामी न्याय के प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था।
उन्होंने कहा कि विद्वानों और धर्म प्रचारकों की जिम्मेदारी है कि वे समाज की परिस्थितियों पर गहरी नजर रखें और उसके सुधार के लिए अपनी भूमिका निभाएं। उनके अनुसार, जो विद्वान समाज में बुराई देखकर भी खामोश रहता है और अपने ज्ञान के माध्यम से सुधार की कोशिश नहीं करता, वह अपनी जिम्मेदारी से बेखबर है।
नेक इंसान होने के साथ समाज सुधारक बनना भी जरूरी
आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने कुरआन की इस आयत की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी समाज में केवल नेक लोगों और विद्वानों की मौजूदगी उसके अस्तित्व को बनाए रखने की गारंटी नहीं है, बल्कि उसमें सुधार करने वालों का होना भी जरूरी है। नेकी और ज्ञान तभी समाज के लिए मुक्ति का साधन बनते हैं, जब उनके माध्यम से समाज सुधार का दायित्व निभाया जाए।
उन्होंने अमीरुल मोमिनीन हजरत अली (अ) की इमाम हसन मुज्तबा (अ) के नाम लिखी वसीयत का हवाला देते हुए कहा कि इंसान को दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, जैसा वह अपने लिए पसंद करता है। उसे दूसरों के लिए भी वही भलाई चाहनी चाहिए, जो वह अपने लिए चाहता है।
एक मोमिन अपने समाज से अलग-थलग नहीं रह सकता। उसे नेकी का आदेश देने, बुराई से रोकने और समाज सुधार से संबंधित धार्मिक दायित्वों को ध्यान में रखते हुए अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने कहा कि एक मोमिन को दूसरे मोमिन के लिए आईने की तरह होना चाहिए, ताकि उसकी कमियों की ओर ध्यान दिलाकर हिकमत और शरीअत के सिद्धांतों के अनुसार सुधार किया जा सके। उनके अनुसार, यही पैगंबरों और इमामों की सीरत है। इंसान जितना अधिक ज्ञान प्राप्त करता है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है।
सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने पर जोर
उन्होंने समाज में प्रचलित कुछ अन्यायपूर्ण व्यवहारों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि विशेष रूप से विरासत के बंटवारे के समय कुछ परिवारों में शरीअत के आदेशों का पालन नहीं किया जाता, जिससे बच्चों और उत्तराधिकारियों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
उनके अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में कोई मोमिन, विद्वान या धर्म प्रचारक खामोश नहीं रह सकता। उसे समाज को धार्मिक आदेशों के पालन और लोगों के अधिकारों की अदायगी की ओर ध्यान दिलाना चाहिए।
अमीरुल मोमिनीन (अ): महान समाज सुधारक और इस्लाम के रक्षक
आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने ग़दीर की हदीस “मन कुंतु मौलाहु फ़अलीयुन मौलाहु” का हवाला देते हुए कहा कि यह हदीस जहां अमीरुल मोमिनीन हजरत अली (अ) की महानता और श्रेष्ठता को बयान करती है, वहीं उम्मत के मार्गदर्शन और उसके सुधार की जिम्मेदारी की ओर भी संकेत करती है।
उन्होंने कहा कि अमीरुल मोमिनीन (अ) ने इस्लाम और पैगंबर-ए-अकरम (स) की सहायता के लिए तलवार उठाई और इस्लाम की खातिर ही कई अवसरों पर तलवार म्यान में रखी। उनके अनुसार, मौला अली (अ) का उद्देश्य कभी भी व्यक्तिगत हित नहीं था, बल्कि इस्लाम की रक्षा और उम्मत का सामूहिक हित हमेशा उनके सामने रहा।
इसी कारण उन्होंने मतभेदों के बावजूद इस्लाम की खातिर उम्मत के सामूहिक मामलों में अपनी भूमिका निभाई।
उम्मत की एकता समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता
आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने मुसलमानों की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मुस्लिम समाजों में आपसी मतभेदों ने उनकी सामूहिक शक्ति को कमजोर कर दिया है। उन्होंने भारत की कुछ प्राचीन मस्जिदों से जुड़े घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि मुसलमानों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर अपने धार्मिक और सामूहिक हितों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दुश्मन मुसलमानों के आपसी मतभेदों से लाभ उठाता है। इसलिए वर्तमान समय में ईमान पर आधारित एकता, भाईचारा और आपसी सहमति की अत्यंत आवश्यकता है। मुसलमानों को एक-दूसरे को कमजोर करने के बजाय इस्लामी समाज की उन्नति और सुरक्षा के लिए मिलकर काम करना चाहिए।
कुरआन और अहलेबैत से जुड़ाव ही मुक्ति का मार्ग
आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने हदीस-ए-सक़लैन का हवाला देते हुए कहा कि मुसलमानों को कुरआन और रसूल (स) के अहलेबैत को अपने जीवन का आदर्श बनाना होगा। उन्होंने खुत्बा-ए-फ़दक में हजरत फ़ातिमा ज़हरा (स) के संदेश की ओर संकेत करते हुए कहा कि पैगंबर-ए-अकरम (स) के निधन के बाद उम्मत का आपसी मतभेदों और बिखराव का शिकार होना अत्यंत चिंताजनक था।
आगा सैयद मोहम्मद हादी मूसवी सफवी ने स्पष्ट किया कि हजरत फ़ातिमा ज़हरा (स) का खुत्बा केवल अपने व्यक्तिगत अधिकार की मांग तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें उम्मत को कुरआन, पैगंबर (स) की सीरत और धार्मिक सिद्धांतों से जुड़े रहने, सत्य और असत्य के बीच अंतर करने तथा अपनी सामूहिक जिम्मेदारियों से बेखबर न होने का संदेश भी दिया गया है।
उन्होंने कहा कि हजरत फ़ातिमा ज़हरा (स) ने उम्मत को सचेत किया था कि पैगंबर-ए-अकरम (स) के निधन के बाद यदि मुसलमान कुरआन और अहलेबैत की शिक्षाओं से दूर हो जाएंगे, तो उम्मत मतभेद, बिखराव और आपसी विवादों का शिकार हो सकती है।
उन्होंने कहा कि आज भी हजरत फ़ातिमा ज़हरा (स) के इस संदेश को समझने की जरूरत है। मुसलमानों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर कुरआन और अहलेबैत से जुड़े रहना चाहिए तथा इस्लामी समाज के सुधार और उन्नति के लिए एकजुट होकर अपनी भूमिका निभानी चाहिए।