इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत

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इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत

सात ज़िलहिज्जा ११४ हिजरी क़मरी वह दिन  है जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम शहीद हुए थे।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम अज्ञानता और अन्याय के काल में ज्ञान का सूरज बनकर चमके और इस्लाम की उच्च शिक्षाओं में दोबारा प्राण फूंक दिया।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत की ख़बर सुनकर उनके एक साथी जाबिर बिन यज़ीद जोअफ़ी बहुत दुःखी थे। जाबिर ने इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के पावन मुख से जो पहली सिफारिश सुनी थी वह हमेशा उन्हें याद थी। जब उन्होंने पहली बार इमाम से मस्जिद में मुलाक़ात की थी तो इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने फरमाया था “ज्ञान प्राप्त करो क्योंकि ज्ञान प्राप्त करना भला कार्य है। अंधकार में ज्ञान तुम्हारा मार्गदर्शक और कठिनाइयों में तुम्हारा सहायक और इंसान के लिए मूल्यवान दोस्त है।“

  

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की यह सिफ़ारिश इस बात का कारण बनी कि जाबिर ज्ञान एवं इमाम मोहम्मद बाक़िर की शास्त्रार्थ की सभाओं में भाग लेते और उससे लाभान्वित होते थे। जाबिर इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के वियोग में उनके प्रेमपूर्ण व्यवहार को याद करके बहुत रोते थे और उन्हें इमाम की दूसरी सिफारिशें भी याद आती थीं। वह इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के उस वाक्य को याद करते थे जिसमें इमाम ने फ़रमाया था हे जाबिर जिस अस्तित्व में ईश्वर की याद का स्वाद समा गया हो उसका दिल दूसरे प्रेम में व्यस्त नहीं होगा। ईश्वर से प्रेम करने वाले इस दुनिया पर भरोसा नहीं करते और दुनिया से दिल नहीं लगाते। तो जो कुछ ईश्वर ने धर्म और अपनी तत्वदर्शिता को तुम्हारे पास अमानत के रूप में रखा है उसकी सुरक्षा करो।“

  

पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों की एक चिंता लोगों का मार्गदर्शन था। अतः इन महान हस्तियों में से हर एक ने अपने समय और परिस्थिति के अनुरूप भिन्न शैली अपनाई ताकि यह उद्देश्य व्यवहारिक हो सके। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की इमामत १९ वर्षों तक रही और उस समय की स्थिति इस प्रकार थी कि इमाम अपनी गतिविधियों के एक भाग को इस्लाम धर्म की उच्च व जीवनदायक शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष करें। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की सबसे प्रसिद्ध उपाधि “बाक़िरुल उलूम” है जिसका अर्थ है ज्ञान की गुत्थियों को सुलझाने वाला यह उपाधि पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें दी थी। इस बात का उल्लेख शीया और सुन्नी रवायतों में बहुत किया गया है। शीया किताब जैसे बिहारुल अनवार, अमालीये सदूक़, उयूनुल अख़बार जबकि सुन्नी किताब तारीखे इब्ने असाकिर और तज़केरतुल ख़वास में बयान किया गया है। जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी नामक पैग़म्बरे इस्लाम के एक साथी कहते हैं एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम ने मुझसे फ़रमाया मेरे बाद तुम मेरे कुटुम्ब के एक व्यक्ति को देखोगे कि उसका नाम मेरा नाम होगा और वह मेरी तरह होगा। वह ज्ञान की गुत्थियों को सुलझाएगा और लोगों की तरफ ज्ञान का द्वार खोल देगा।“

  

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम दूसरों को ज्ञान सिखाने और ज्ञान के प्रचार- प्रसार पर बहुत ध्यान देते थे। वास्तव में इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम इस्लामी जगत के शैक्षिक व सांस्कृतिक अभियान की आधारशिला रखने वाले हैं। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने ज्ञान के विभिन्न विषयों को एक दूसरे से अलग किया। इस्लामी इतिहासकारों के अनुसार इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने अपने अनथक प्रयासों ने इस्लाम की उच्च शिक्षाओं में नई जान डाल दी। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने अपने समय के विद्वानों से बहस और शास्त्रार्थ के परिप्रेक्ष्य में इस्लामी शिक्षाओं को बयान किया। शास्त्रार्थ वह बेहतरीन शैली है जिसके माध्यम से इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने इस्लामी शिक्षाओं को लोगों तक पहुंचाया। शास्त्रार्थ के बारे में इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं विद्वानों को चाहिये कि वे कहने की अपेक्षा सुनने के लिए अधिक आतुर रहें।

 

उन्हें चाहिये कि अच्छी तरह बोलने की कला के अतिरिक्त अच्छी तरह सुनने की कला को भी मज़बूत करें।“ इसी प्रकार इमाम ने फ़रमाया  जब विद्वान के पास बैठो तो बोलने से अधिक सुनने पर ध्यान दो और अच्छी तरह सुनने की कला सीखो जिस तरह तुम अच्छी तरह बात करना सीखते हो उसी तरह किसी की बात को न काटो।“ इसी कारण इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम जब विभिन्न मतों यहां तक कि अपने विरोधियों के साथ बहस की सभाओं में बैठते थे तो इस्लामी शिक्षाओं को विस्तृत रूप से बयान करते थे। दूसरे शब्दों में इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम न केवल इस्लामी जगत में नई शैली की आधार शिला रखने वाले हैं बल्कि इस्लामी इतिहास में नये दौर का आरंभ करने वाले हैं। ज्ञान को विस्तृत करने के लिए इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के अनथक प्रयासों को इसी दिशा में देखा जा सकता है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के अनथक परिश्रम का एक परिणाम इस्लामी ज्ञानों के विश्व विद्यालय की स्थापना और विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सारे मेधावी व प्रतीभाशाली शिष्यों का प्रशिक्षण है। इतिहास में उनके शिष्यों की संख्या ४६५ बताई गयी है जिनमें से हर एक हज़ारों हदीसों अर्थात कथनों को याद रखता और उसे संकलित करता था।

  

 हर कार्य का आधार विचार होता है। अतः अगर यह चाहते हैं कि समाज में ज्ञान प्रचलित हो तो सबसे पहले ज्ञान अर्जित करने के महत्व, विद्वानों का महत्व, ज्ञान अर्जित करने का उद्देश्य और इसके मार्ग में आने वाली रुकावटों के बारे में विचार किया जाना चाहिये। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने ज्ञान अर्जित करने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम उठाया।

  

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने ज्ञान अर्जित करने के लिए प्रोत्साहित करने के संदर्भ में फरमाया” ज्ञान खज़ाना है और प्रश्न उसकी कुंजी है तो प्रश्न करो ताकि ईश्वर तुम पर अपनी कृपा करे क्योंकि पूछना कारण बनता है कि इसका बदला चार लोगों को मिले। पूछने वाले को, शिक्षक को, सुनने वाले को और जवाब देने वाले को।“

  

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का एक प्रयास यह भी है कि उन्हों ने धार्मिक शिक्षाओं को लिखित रूप देकर भूरक्षित किया। लिखने की संस्कृति के प्रभाव व परिणाम उनके बाद इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम के शैक्षिक अभियान और उनके बाद की शताब्दियों में स्पष्ट हुए। इसी प्रकार इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने ज्ञान को बनी उमय्या के वर्चस्व से मुक्त कराने के लिए प्रयास किया और ज्ञान की दरबार निर्भरता को कम करने का प्रयास किया। इस बात को नहीं भूलना चाहिये कि बनी उमय्या के शासकों की चेष्टा ज्ञान के अभियान को अपने नियंत्रण में रखने की थी परंतु इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शैली इससे पूर्णतः भिन्न थी और उनका प्रयास समस्त इस्लामी समुदाय के बीच ज्ञान के आधारों को मज़बूत करना था। ज्ञान के आधारों के मज़बूत होने के साथ- साथ अनुवाद की भी भूमि प्रशस्त हो गयी। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ज्ञान के अभियान में जिस चीज़ पर ध्यान देते थे वह ज्ञान का प्रचार-प्रसार था।

 

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फरमाते थे “ज्ञान की ज़कात उसे ईश्वर के बंदों को सिखाना है।“इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने शैक्षिक अभियान के साथ समाज के मामलों के सुधार का बहुत प्रयास किया। इस बीच अमवी शासकों में हेशाम बिन अब्दुल मलिक था जो इमाम के साथ बहुत कड़ाई से पेश आया। यहां तक कि उसने मजबूर करके इमाम को अपनी सत्ता के केन्द्र शाम अर्थात वर्तमान सीरिया बुला लिया और वहां पर उसने इमाम पर कड़ी निगरानी की। इसी प्रकार उसने इमाम को कुछ समय के लिए कारावास में बंद भी रखा।

  

हेशाम बिन अब्दुल मलिक ने जब यह देख लिया कि उसके इस कार्य का कोई परिणाम नहीं निकल रहा है और उसके कार्यों के उसके लिए उल्टे परिणाम निकल रहे हैं तो उसने दोबारा इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को पवित्र नगर मदीना भेज दिया। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम चमकते प्रकाश की भांति लोगों को जागरुक बना रहे थे और शिक्षित कर रहे थे अतः हेशाम बिन अब्दुल मलिक इतिहास के दूसरे अत्याचारी शासकों की भांति यह सोचता था कि उसकी सत्ता लोगों की निरक्षरता में इसलिए वह इमाम के पावन अस्तित्व से चिंतित था। इसी कारण उसने एक षड़यंत्र के अंतर्गत इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को ज़हर देकर शहीद करवा दिया।

  

पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों ने लोगों के मध्य ईश्वरीय धर्म इस्लाम की उच्च मानवीय व नैतिक शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए अनथक प्रयास किये। वे अपने अनुयाइयों के व्यवहार को सुधारने पर बहुत ध्यान देते थे। यहां पर हम इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की कुछ सिफारिशों को बयान कर रहे हैं। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं हमारे अनुयाइ पहचाने नहीं जाते किन्तु विनम्रता और नर्म व्यवहार से। वे अमानतदार होते हैं और वे ईश्वर को बहुत अधिक याद करते हैं।

 

नमाज़ पढ़ते हैं और रोज़ा रखते हैं और अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं। वे अपने निर्धन पड़ोसियों की सहायता करते हैं और अनाथों एवं संकटग्रस्त लोगों की चिंता में रहते हैं। मेरे अनुयाइ सच बोलते हैं। वे दूसरों को बुरा-भला कहने से अपनी ज़बान को सुरक्षित रखते हैं। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने  एक दिन अपने कुछ अनुयाइयों के हाथ अपने दूसरे अनुयाइयों के लिए संदेश भेजा और फरमाया कि मेरे संदेश को इस प्रकार पहुंचाओ। मेरे अनुयाइयों को मेरा सलाम कहना और उन लोगों से तक़वे अर्थात ईश्वर से डरने भय की सिफारिश करो और उनसे कहो कि उनमें से धनी, निर्धनों का हाल- चाल पूछने जायें और निर्धनों के बीमारों को देखने जायें और उनकी शव यात्रा में शामिल  हों और एक दूसरे को देखने के लिए जायें क्योंकि यह आवा-जाही हमारे आदेशों व शिक्षाओं के जीवित होने का कारण बनेगी।

 

ईश्वर उस पर दया करे जो हमारे आदेशों को जीवित करे और उसमें से बेहतरीन पर अमल करे और उनसे कहो कि प्रलय के दिन सबसे अधिक वह व्यक्ति पछतायेगा जो अच्छे कार्यों की सिफ़ारिश तो दूसरे लोगों से करे परंतु स्वयं उसका उल्टा करे।“

 

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