हज़रत मासूमा क़ुम का शुभ जन्म दिसव।

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पहली ज़ीक़ादा सन 173 हिजरी क़मरी को हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की सुपत्री और हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत फ़ातेमा का जन्म हुआ।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम हज़रत फ़ातेमा मासूमा के पिता थे।  उनकी माता का नाम हज़रत नज्मा ख़ातून था।  इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम, फ़ातेमा मासूमा के बड़े भाई थे।  हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम, हज़रत फ़ातेमा मासूमा के बारे में कहते हैं कि ईश्वर का हरम मक्का में है, उसके पैग़म्बर का हरम मदीना में है, हज़रत अली का हरम कूफ़ा में है जबकि हम अहलेबैत का हरम, क़ुम है।  जान लो कि स्वर्ग के आठ दरवाज़े हैं जिनमें से तीन का रुख़, क़ुम की ओर है।  मेरे ही वंश की एक महिला का क़ुम में मज़ार होगा।  वह हमारे मानने वालों की शिफ़ाअत करेगी जिसके कारण वे लोग स्वर्ग में जाएंगे।  श्रोताओ, मासूमा क़ुम के शुभ जन्म दिवस के अवसर पर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं।

हज़रत मासूमा क़ुम वह महान महिला हैं जो अपनी निष्ठा, उपासना, पवित्रता और ईशावरीय भय के माध्यम से परिपूर्णता के शिखर पर पहुंचीं।  मुसलमान महिलाओं के मध्य वे एक आदर्श महिला बन गईं। ज्ञान और ईमान के क्षेत्र में हज़रत फ़ातेमा मासूमा की सक्रिय उपस्थिति, इस्लामी संस्कृति व इतिहास में महिला के मूल्यवान स्थान की सूचक है।  इस्लाम ने महिलाओं को हर क्षेत्र में प्रगति करने का अवसर प्रदान किया है।  इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ महान महिलाएं, पुरुषों के लिए आदर्श बन गईं जिनमें से एक हज़रत मासूमा क़ुम हैं।

हज़रत फ़ातेमा मासूमा की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उन्हें इस्लामी ज्ञान की भरपूर जानकारी थी।  वे दूसरों को भी उसे बताया करती थीं। इस्लामी विद्वानों और इतिहासकारों का मानना है कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की बेटियों में हज़रत फ़ातेमा मासूमा को एक विशेष स्थान प्राप्त रहा।  जब इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम घर पर मौजूद नहीं होते थे तो हज़रत फ़ातेमा मासूमा, लोगों के प्रश्नों का उत्तर देतीं और उनकी भ्रांतियों को दूर किया करती थीं।

हज़रत फ़ातेमा की कुछ प्रसिद्ध उपाधियां हैं जैसे मासूमा, मोहद्देसा, ताहिरा और हमीदा आदि। इनमें से हर उपाधि हज़रत फ़ातेमा मासूमा के सदगुणों के एक भाग की ओर संकेत करती है। यह उपाधियां इस बात की सूचक हैं कि हज़रत मासूमा विद्वान, वक्ता, दक्ष शिक्षक, उपासना और दूसरे समस्त सदगुणों से सुसज्जित थीं।  हज़रत फ़ातेमा मासूमा ने अपने पिता हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम और अपने बड़े भाई इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के मार्गदर्शन की छत्रछाया में अपने जीवन को महान ईश्वर की याद में बिताया और इस प्रकार उन्होंने ज्ञान और तक़वा के शिखर को प्राप्त किया।  आध्यात्मिक पवित्रता के कारण ही हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपनी बहन को मासूमा की उपाधि दी थी।  उन्होंने कहा था कि जो भी क़ुम में मासूमा की ज़ियारत करेगा वह उस व्यक्ति की भांति है जिसने हमारी ज़ियारत की है।

जैसाकि हमने आपको बताया कि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत मासूमा, सदगुणों की स्वामी थीं।  उन्होंने यह गुण और विशेषताएं, अथक प्रयासों और ईश्वर की उपासना से हासिल किये थे।  उनके भीतर ईश्वरीय भय पाया जाता था जिसके माध्यम से उन्होंने आध्यात्मक के उच्च चरणों को प्राप्त किया।  बहुत से इस्लामी विद्धानों का कहना है कि एक आम इन्सान भी ईश्वर की उपासना करके आध्यात्म के उच्च चरणों को प्राप्त कर सकता है।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि आध्यात्मक के उच्च चरणों तक पहुंचने का सबसे अच्छा मार्ग ईश्वरीय भय है।

इस्लाम में श्रेष्ठता का मापदंड तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय व सदादारिता है। इसी प्रकार ज्ञान और ईमान भी श्रेष्ठता का मापदंड हैं। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि ज्ञान और ईमान के कारण ही इंसान में ईश्वर के प्रति भय उत्पन्न होता है। जिस इंसान के पास न तो ज्ञान हो और न ही ईमान तो कभी भी उसके अंदर ईश्वरीय भय उत्पन्न नहीं होगा। पवित्र क़ुरआन एक इंसान की दूसरे इंसान पर हर प्रकार की श्रेष्ठता का इंकार करते हुए कहता है कि किसी को किसी पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है।  हां जिसमे तक़वा या ईश्वरीय भय अधिक हो वह दूसरों पर श्रेष्ठता रखता है। दूसरे शब्दों में महान ईश्वर के निकट सबसे अधिक प्रतिष्ठित वही व्यक्ति वही है जिसका तक़वा सबसे अधिक हो।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ईश्वरीय भय या तक़वे के बाद जिस विशेषता का नंबर आता है उसे “इबरत” कहते हैं अर्थात विगत की बातों से पाठ लेना।  इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि देखो उन लोगों का क्या हुआ जो सांसारिक मायामोह में फंसे हुए थे।  देखों उन लोगों का अंजाम क्या रहा जो केवल धन-दौलत बटोरने में लगे रहे।  याद रखो दुनिया ने किसी के साथ भी वफा नहीं की।  एसे में केवल वे ही लोग सफल रहेंगे जिन्होंने दुनिया पर नहीं बल्कि ईशवर पर भरोसा किया।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हमें यह देखना चाहिए कि हमसे पहले वालों का क्या हुआ? उन्होंने कौन से एसे काम किये जिसके कारण वे तबाह हो गए और उनका भविष्य अंधकारमय हो गया।  हमको एसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसके कारण हमारे साथ भी वैसा ही हो।  वे कहते हैं कि हमें अपनी आंतरिक इच्छाओं का दास नहीं बनना चाहिए।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कहना है कि मनुष्य को चाहिए कि वह आंतरिक इच्छाओं के मुक़ाबले में अडिग रहे, उनके सामने आत्मसमर्पण न करे।

इमाम अली कहते हैं कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के मार्ग में धैर्य को भी विशेष स्थान प्राप्त है।  वे कहते हैं कि जीवन में कठिनाइयों का मुक़ाबला हमें धैर्य से करना चाहिए।  हज़रत अली का कहना है कि धैर्य करना कोई सरल काम नहीं है लेकिन इसमें परिणाम बहुत अच्छे होते हैं।  उनका कहना है कि धैर्यवान व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर उचित ढंग से नियंत्रण प्राप्त कर सकता है।  ऐसे व्यक्ति का अपने मन-मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रहता है।  यही विशेषाधिकार उसे अपने जीवन में सफलता के शिखर की ओर ले जाता है।  हज़रत अली कहते हैं कि मनुष्य की आंतरिक इच्छाएं, बेलगाम घोड़े की तरह होती हैं।  इन अनियंत्रित इच्छाओं की लगाम धैर्य या सब्र है।  मनुष्य को धैर्य के माध्यम से अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करते रहना चाहिए क्योंकि इनके नियंत्रण की स्थिति में ही मनुष्य संसार में सफल जीवन व्यतीत कर सकता है।

विद्धवानों का कहना है कि हज़रत मासूमा क़ुम की विशेषताओं में से एक विशेषता, शिफाअत है जो बहुत बड़ी विशेषता है।  यह विशेषता पैग़म्बरे इस्लाम (स) से ही विशेष है।  पवित्र क़ुरआन मे भी इस विशेषता का उल्लेख मिलता है।  पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के बाद इस विशेषता की स्वामी हज़रत मासूमा क़ुम हैं जिनके बारे में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि मेरे ही वंश की एक महिला का क़ुम में मज़ार होगा।  वह हमारे मानने वालों की शिफ़ाअत करेगी जिसके कारण वे लोग स्वर्ग में जाएंगे।

आपको बताते चलें कि मासूमा क़ुम, अपने भाई इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात के लिए पवित्र नगर मदीना से मर्व जा रही थीं।  23 रबीउल अव्वल 201 हिजरी क़मरी को वे पवित्र नगर क़ुम पहुंची। जब हज़रत फ़ातेमा मासूमा क़ुम पहुंचीं तो इस नगर के लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) तथा उनके परिजनों से श्रृद्धा रखने वाले लोग उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े।  मासूमा क़ुम, 17 दिनों तक क़ुम में बीमारी की स्थिति में रहीं।  बाद में 27 साल की उम्र में पवित्र नगर क़ुम में उनका स्वर्गवास हो गया। क़ुम नगर में ही उनका मज़ार है।  ईरान के पवित्र नगर क़ुम में हज़रत फ़ातेमा मासूमा का रौज़ा, आज भी लाखों श्रृद्धाओं की आध्यात्मिक शांति का केन्द्र बना हुआ है। ईरान ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने से श्रृद्धालु वहां दर्शन के लिए जाते हैं।  उनके शुभ जन्म दिवस के अवसर पर हम आप सबकी सेवा में पुनः बधाई प्रस्तुत करते हैं।

 

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