हज़रत ख़दीजा का स्वर्गवास

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पवित्र रमज़ान की दस तारीख़, पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की धर्मपत्पनी हज़रत ख़दीजा के स्वर्गवास का दिन है।

यह वह दिन है जब "उम्मुल बनीन" हज़रत ख़दीजा ने इस नश्वर संसार से विदा ली।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) अपने कई कथनों में हज़रत ख़दीजा को संसार की महान एवं परिपूर्ण महिला बता चुके हैं।  हज़रत अबूतालिब के स्वर्गवास के कुछ ही समय के बाद "उम्मुल बनीन" हज़रत ख़दीजा का स्वर्गवास हो गया।

25 वर्षों तक संयुक्त जीवन व्यतीत करने के बाद हिजरत के दसवें साल रमज़ान की दस तारीख़ को हज़रत ख़दीजा का स्वर्गवास हुआ।  आपके स्वर्गवास से पैग़म्बरे इस्लाम (स) को बहुत दुख हुआ।  हज़रत अबूतालिब के स्वर्गवास के थोड़े ही अंतराल से "उम्मुल बनीन" हज़रत ख़दीजा का स्वर्गवास हो गया।  इन दोनों लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम बहुत चाहते थे इसीलिए उन दोनों के स्वर्गवास से वे बड़े दुखी हुए।  यही कारण है कि जिस वर्ष हज़रत अबूतालिब और "उम्मुल बनीन" हज़रत ख़दीजा का स्वर्गवास हुआ उस साल का नाम पैग़म्बरे इस्लाम ने "आमुल हुज़्न" अर्थात दुख वाला वर्ष रखा था।  श्रोताओ हज़रत ख़दीजा के स्वर्गवास की बरसी पर आप सबकी सेवा में श्रंद्धांजलि अर्पित करते हैं।

हज़रत ख़दीजा, इस्लाम की सबसे महान महिला थीं।  वे ऐसी पहली महिला थीं जिन्होंने महिलाओं में सबसे पहले इस्लाम स्वीकार किया था।  पैग़म्बरे इस्लाम के पीछे नमाज़ पढने वाली पहली महिला भी हज़रत ख़दीजा ही थीं।  वे पवित्र, बुद्धिमान और दूरदर्शी महिला थीं।  आपके भीतर पाई जाने वाली कुछ स्पष्ट विशेषताएं इस प्रकार हैं- पवित्रता, दान-दक्षिणा, मेहरबानी, वफ़ादारी, लोगों के साथ अच्छा व्यवहार और दूरदर्शिता आदि।  जिस प्रकार से इस्लाम के आने और क़ुरआन के नाज़िल होने से पहले ही पैग़म्बरे इस्लाम, अमीन अर्थात अमानतदार मश्हूर हो गए थे इसी प्रकार हज़रत ख़दीजा को भी क़ुरैश की सबसे पवित्र महिला कहा जाता था।

हज़रत ख़दीजा ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के साथ 25 वर्षों तक पारिवारिक जीवन व्यतीत किया।  यह काल बहुत ही उतार-चढ़ाव से भरा हुआ था।  आप बहुत ही धनवान महिला थीं और उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, इस्लाम के प्रचार व प्रसार में ख़र्च कर दी।  आपको "मलिकतुल बतहा" अर्थात अरब जगत की महारानी कहा जाता था।  हज़रत ख़दीजा ने अपनी सारी संपत्ति पैग़म्बरे इस्लाम के चरणों में अर्पित कर दी थी जिससे वे निर्धनों की सहायता, क़र्ज़दारों के क़र्ज़ अदाकरने, बीमारों का इलाज कराने और इसी प्रकार के कार्य किया करते थे।  हज़रत ख़दीजा की क़ुर्बानी इतनी अधिक और निष्ठा से ओतप्रोत थी कि इसका ईश्वर ने भी आभार व्यक्त किया है।

हज़रत ख़दीजा, पैग़म्बरे इस्लाम (स) को ईश्वर के अन्तिम दूत के रूप में देखती थीं और इसपर उनका ईमान था।  उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के साथ जीवन के दौरान सदैव ही यह प्रयास किया कि वे उनके लिए शांति का कारण बनें।  ऐसे समय में कि जब पैग़म्बरे इस्लाम को हर प्रकार से सताया जा रहा था, उस समय घर में आप उनको ढारस देती थीं।  इतिहास में मिलता है कि एक बार मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने पैग़म्बरे इस्लाम पर पत्थर फेंके जिससे वे घायल हो गए।  बाद में वे आपका पीछा करते हुए उनके घर तक आए।  बाद में उन्होंने पैग़म्बर के घर पर भी पत्थर फेंके।  इसपर हज़रत ख़दीजा घर से बाहर आ गईं और उन्होंने पत्थर फेंकने वालों को संबोधित करते हुए कहा कि तुमको पता नहीं है कि तुम ऐसी महिला के घर पत्थर फेंक रहे हो जो तुम्हारी जाति की सबसे पवित्र महिला है।  आपकी यह बात सुनकर वे लोग बहुत लज्जित हुए और वहां से चले गए।  बाद में उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के घाव की मरहम पट्टी की।  इसी घटना के बाद आपने हज़रत ख़दीजा को उनके लिए स्वर्ग में ज़मर्रूद के महल की सूचना दी।

हज़रत ख़दीजा के पास बहुत अधिक धन-संपत्ति थी।  उनका सामाजिक (स्टेटस) भी बहुत ऊंचा था।  उनकी ख्याति अरब जगत के कोने-कोने तक फैली थी।  इसके बावजूद वे पैग़म्बरे इस्लाम के साथ बहुत ही विन्रमता पूर्ण जीवन गुज़ारती थीं और उनके भीतर बिल्कुल भी घमण्ड नहीं था।  वे जानती थीं कि पैग़म्बरे इस्लाम को उपासना से बहुत लगाव है इसलिए वे हर उस काम से बचती थीं जिससे आपकी उपासना में विघ्न पड़ता हो।  बेसत से पहले पैग़म्बरे इस्लाम पाबंदी से महीने में कई बार हिरा नामक गुफा जाकर उपासना किया करते थे।  रमज़ान के पवित्र महीने के दौरान वे अपना अधिकांश समय वहीं पर गुज़ारते थे।  हज़रत ख़दीजा, पैग़म्बरे इस्लाम के लिए वहां पर खाना भेजती थीं और कभी-कभी स्वयं भी वहां पर जाती थीं।

उन्होंने अपनी सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का अच्छा प्रशिक्षण किया था।  आपके प्रशिक्षण की यह विशेषता थी कि हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के साथ ही उनकी संतान ने भी अपनी नानी के प्रशिक्षण और उनके अस्तित्व पर गर्व किया है।  एक बार इमाम हसन अलैहिस्सलाम जब मोआविया से शास्त्रार्थ कर रहे थे तो उन्होंने मोआविया के पथभ्रष्ट होने और अपने सौभाग्यशाली होने के लिए जो तर्क पेश किया उसमें हज़रत ख़दीजा का भी उल्लेख किया था।  इमाम हसन ने मोआविया को संबोधित करते हुए कहा था कि तुम्हारी मां, "हिंदा" थी और दादी "नसीला" थी।  यह दोनों अपने ज़माने की बदनाम औरतें थीं।  तुम एसे परिवार से संबन्ध रखते हो जबकि मेरी मां फ़ातेमा ज़हरा और मेरी नानी ख़दीजतुल कुबरा थीं।  इसी प्रकार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने भी करबला के मैदान में दस मुहर्रम को यज़ीद के सैनिकों को संबोधित करते हुए अपने परिचय में कहा था कि तुम जान लो कि मेरी नानी ख़दीजा थीं जो ऐसी पहली महिला थीं जिन्होंने इस्लाम स्वीकार किया था।  इसके अतिरिक्त उन्होंने इस्लाम के लिए बहुत बलिदान दिया था।

हज़रत ख़दीजा हालांकि बहुत पैसेवाली थीं किंतु उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के साथ जीवन में बहुत से दुख सहन किये।  अनेकेश्वरवादियों की ओर से लगाए जाने वाली आर्थिक प्रतिबंधों का आपने भी समाना किया था।  हिजरत के सावतें साल अनेकेश्वरवादियों ने मुसलमानों पर अधिक दबाव डालने के उद्देश्य से एक समझौता किया जिसके आधार पर किसी को भी मुसलमानों के साथ व्यापार करने और शादी करने का अधिकार नहीं था।  इसी विषय के दृष्टिगत मुसलमान शाबे अबुतालिब नामक घाटी में एकत्रित हुए।  वहां पर वे 3 वर्षों तक सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करते रहे।  यहां पर रहने वाले मुसलमानों को भूखा और प्यासा रहना पड़ता था क्योंकि उनके साथ सभी लोगों ने लेन-देन बंद करके उनका बायकाट कर दिया था।  शाबे अबूतालिब की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए एक अरब लेखक लिखते हैं कि इन लोगों में हज़रत ख़दीजा भी शामिल थीं। उस समय उनकी आयु ऐसी नहीं थी कि वे इस प्रकार की कठिनाइयां सहन कर पातीं किंतु उन्होंने मरते समय तक कठिनाइयों का डटकर मुक़ाबला किया।

जिस समय हज़रत ख़दीजा बीमार हुईं तो पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने उनसे कहा था कि हे ख़दीजा! क्या तुमको पता है कि ईश्वर ने स्वर्ग में भी तुमको मेरी पत्नी बनाया है।  जब हज़रत ख़दीजा की बीमारी बढ़ने लगी तो आपने पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहा था कि अगर मैंने ऐसा काम किया हो जो आपको अच्छा न लगा हो तो आप मुझको क्षमा कर दीजिए।  इसपर हज़रत मुहम्मद (स) ने कहा था कि नहीं तुमने कभी कोई ऐसा काम नहीं किया।  उन्होंने कहा कि तुमने मेरे घर में बहुत परेशानिया सहन कीं और अपनी सारी संपत्ति इस्लाम के मार्ग में ख़र्च की।

हज़रत ख़दीजा के स्वर्गवास के बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने आपको ग़ुस्ल व कफ़न दिया।  जब आप ग़ुस्ल दे रहे थे तो उसी समय जिब्रील, स्वर्ग से कफ़न लेकर आए और कहा कि हे पैग़म्बरे, ईश्वर आप पर सलाम भेजता है।  वह कहता है कि ख़दीजा ने मेरे मार्ग में अपनी सारी संपत्ति ख़र्च कर दी ऐसे में उनके कफ़न की ज़िम्मेदारी हम पर हैं।  इस्लामी इतिहास में एक मश्हूर वाक्य मिलता है कि इस्लाम, पैग़म्बरे इस्लाम के शिष्टाचार, हज़रत अली की तलवार और हज़रत ख़दीजा की दौलत का आभारी है और रहेगा।

 

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