इमाम ज़ैनुलआबेदीन की शहादत पर विशेष कार्यक्रम

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एक कथन के अनुसार यह दिन, पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र, इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम का शहादत दिवस है। इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे हैं जो कर्बला की महात्रासदी में मौजूद थे किंतु बीमारी के कारण उन्होंने युद्ध में भाग नहीं लिया और ईश्वर ने उन्हें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए जीवित रखा। इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम को  सन 94 हिजरी क़मरी में उमवी शासक हिशाम बिन अब्दुलमलिक की साज़िश के अंतर्गत, ज़हर दे दिया गया  और वे शहीद हो गये।

 

इस्लामी इतिहास के आरंभ में जब ओहद नामक युद्ध के दौरान पैगम्बरे इस्लाम के माथे पर एक पत्थर लगा और खून बहने लगा तो उनके दुश्मनों ने शोर मचा दिया कि पैगम्बरे  इस्लाम मारे गये। इस अफवाह के फैलने से दुश्मन का हौसला बढ़ा और बहुत से मुसलमान निराश हो गये और मैदान छोड़ कर भाग गये और कुछ, दुश्मन के कमांडरों से बात चीत करने की जुगत में लग गये लेकिन इन गिने चुने लोगों के सामने वह मुसलमान खड़े हो गये जो यह पुकार पुकार कर कह रहे थे कि अगर मुहम्मद न भी रहें तो भी मुहम्मद का रास्ता और मुहम्मद का ईश्वर तो है, भागो न । कुरआने  मजीद के सूरए आले इमरान की आयत नंबर 144  में इस बारे में कहा गया हैः मुहम्मद, ईश्वरीय दूत के अलावा कुछ नहीं हैं, उनसे पहले भी रसूल आए तो क्या कोई अगर मर जाए या मार दिया जाए तो अतीत में चले जाओगे तो जो भी पीछे की तरफ जाएगा जो वह ईश्वर को कोई नुक़सान नहीं पहुंचा पाएगा और ईश्वर जल्द ही शुक्र करने वालों को प्रतिफल देगा।

 

यह पीछे लौटने की जो स्थिति है वह पैगम्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद सामने आयी। इसी वजह से कर्बला की घटना हुई। निश्चित रूप से कर्बला कोई सैन्य विद्रोह नहीं था जो अचानक हो गया हो बल्कि यह घटना, आधी सदी पहले से आरंभ हुई थी और एेसी छोटी छोटी घटनाओं से आरंभ हुई थी जो मुसलमानों की नज़र में महत्वपूर्ण नहीं थीं लेकिन धीरे धीरे इन घटनाओं की गंभीरता बढ़ती गयी और धीरे धीरे पूरे समाज के लिए खतरा बन गयीं। यह स्थिति सन 61 हिजरी क़मरी में अपनी चरम पर पहुंच गयी थी जिसकी वजह से इस्लाम अपने अस्त के निकट पहुंचता प्रतीत हो रहा था। यही वजह थी कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आंदोलन चलाया और कर्बला की घटना हुई और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने बहत्तर साथियों के साथ शहीद हो गये। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के साथ ही इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम की इमामत का काल आरंभ हो गया।

 

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम का काल इस्लामी इतिहास में अत्याधिक घुटन भरा और काला युग था। यद्यपि उस से पूर्व भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इस्लामी सरकार, सत्ता में मुआविया के पहुंचने से तानाशाही सरकार में बदल चुकी थी किंतु चौथे  इमाम इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम का युग उससे पहले के युगों से इस लिए भिन्न था कि उनके काल में शासक, बिना किसी संकोच व लज्जा के इस्लामी आस्थाओं का अपमान करते और खुले रूप में इस्लामी सिद्धान्तों को पैरों तले रौंदते यद्यपि वे इस्लामी शासक कहे जाते थे । वे इतने अत्याचारी थे कि उनके भय से कोई तनिक भी आपत्ति का साहस नहीं करता था। मुआविया ने इस्लाम का रूप बिगाड़ने के लिए, पैगम्बरे इस्लाम के नाम पर कथन अर्थात हदीस गढ़ने के लिए पूरी एक टीम बनायी थी जो रात दिन यही काम करती थी। इसके साथ ही पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों पर आरोप लगाए जाते और पूरे इ्सलामी समाज में उनकी छवि खराब की जाती। इसके साथ ही मुआविया एेसे लोगों को महिमामंडन कराता जो कभी पैगम्बरे इस्लाम के निकट लोगों में शामिल ही नहीं रहे इस तरह से धीरे धीरे इस्लामी समाज में पैगम्बरे इस्लाम की दुश्मनी के बीज बोए गये जो धीरे धीरे बड़े वृक्ष में बदल गयी। पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के विरुद्ध प्रचार की स्थित जानने के लिए आप का यही जान लेना काफी है कि लगभग 80 वर्षों तक इस्लामी जगत की हर मस्जिद के हर मेंबर से अर्थात जहां भी जुमा की नमाज़ पढ़ी जाती वहां जुमा के भाषण का एक हिस्सा निश्चित रूप  से हज़रत अली अलैहिस्सलाम को बुरा भला कहने पर आधारित होता  था और यह हर इमामे जुमा का कर्तव्य था।

इन हालात में इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम के लिए लोगों के मार्गदर्शन का काम अत्याधिक कठिन था। सब से पहले उनके लिए आवश्यक था कि वह लोगों को पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के बारे में बताएं और उन्हें पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों से प्रेम व श्रद्धा का पाठ सिखाएं। इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम ने सब से पहले यज़ीद के दरबार में अपने बंधे हाथों के साथ जो भाषण दिया उसमें उन्होंने मुसलमानों के बचे हुए ईमान को ध्यान में रख कर अपनी बात आरंभ की। उस दौर में पथभ्रष्टता के बावजूद लोग काबे का सम्मान करते थे  और हर साल हज के अवसर पर उसकी परिक्रमा करते थे। इसी लिए उन्होंने अपनी बात वहीं से शुरु की।

 

इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद के दरबार में अपने भाषण का आरंभ अपने परिचय से किया  और अपने परिचय में बताया कि वह पैगम्बरे इस्लाम के बेटे हैं, वही पैगम्बर जिसके धर्म का तुम लोग अनुसरण कर रहे हो। इसके बाद इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम ने अपना परिचय इस प्रकार करायाः हे लोगोः मैं मक्के का सपूत और मेना का बेटा और ज़मज़म व सफा का लाल हूं।  मैं सबसे उत्तम इंसान का पुत्र हूं, मैं उसका बेटा हूं जिसे मेराज की रात मस्जिदुल हराम से मस्जिदुल अक़सा ले जाया गया। मैं उसका बेटा हूं जिसने बड़े बड़े घमंडियों को नाक रगड़ने पर मजबूर कर दिया और उसका बेटा हूं जो पैगम्बरे इस्लाम के साथ दो तलवारों  और दो भालों से दुश्मनों के खिलाफ लड़ता था और जिसने दो पर बैअत की और दो बार पलायन किया और बद्र व हुनैन के युद्धों में नास्तिकों से युद्ध किया और उसका बेटा हूं जिसने पलक झपकने तक की अवधि  के लिए भी ईश्वर का इन्कार नहीं किया।

 

यज़ीद के दरबार में लोग आंखे फाड़ कर इमाम ज़ैनुलआबेदीन को देख रहे थे। इमाम ने आगे कहा मैं कुरैश क़बीले के सर्वश्रेष्ठ हस्ती का बेटा हूं और उसका बेटा हूं जिसने सब से पहले ईश्वर और उसके दूत के निमंत्रण को स्वीकार किया, काफिरों का सर्वनाश किया,जो ईश्वरीय ज्ञान का स्वामी था।इसके बाद इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम ने नाम लेना आरंभ किया और कहा कि हां वह मेरे दादा अली इब्ने अबी तालिब हैं , हसन व हुसैन के पिता । फिर कहा कि हां मैं जगत की सर्वश्रेष्ठ महिला फातिमा ज़हरा का बेटा हूं। यह सुन कर लोगों में हलचल मच गयी और अचेतना की उनकी नींद टूटने लगी किंतु वर्षों से सोए हुए लोगों को जगाना इतना आसान भी नहीं था।

 

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के काल में इस्लामी समाज विभिन्न प्रकार की वैचारिक व आस्था संबंधी पथभ्रष्टताओं में फंसा हुआ था। लोग, पैगम्बरे इस्लाम की सही शिक्षाओं और उनके परिजनों से दूर हो गये थे और उमवी शासन का प्रयास था कि उन्हें अनावश्यक मुद्दों में व्यस्त रखे। उमवी शासकों द्वारा भोग- विलास और निर्रथक खेलों को प्रचलित करने से भी इस्लामी समाज के लिए बहुत से खतरे पैदा हो गये थे। एश्वर्य पूर्ण जीवन उस काल में सामान्य सी बात हो गयी थी जबकि इस्लाम में इसकी कड़ी मनाही है। बहुत से लोगों ने अत्याधिक धन और संपत्ति जमा कर ली थी और उनके पास सैंकड़ों दास और दासियां थीं । उनमें बहुत सी दासियों को विशेष रूप से गाने बजाने के लिए प्रशिक्षित किया गया होता था। फिर धीरे धीरे यह चलन मध्यमवर्ग के लोगों में भी आम हो गया था और यज़ीद के शासन काल में यह चलन इतना आम हुआ कि इससे इस्लाम के लिए अत्याधिक पवित्र नगर, मक्का और मदीना भी अछूते नहीं रहे। प्रसिद्ध इतिहासकार, मसऊदी ने इस संदर्भ में लिखा है कि यज़ीद का भ्रष्टाचार और नैतिक पतन उसके आस पास रहने वालों को भी प्रभावित कर रहा था और उसके काल में मक्का और मदीना में गीत संगीत का चलन आम हुआ और गीत संगीत तथा शराब पीने के लिए विशेष बैठकों का आयोजन किया जाने लगा। गाने बजाने में दक्ष लोग दमिश्क से इ्सलामी नगरों में भेजे जाते और विलासता की महफिले सजतीं ।

 

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम एसी परिस्थितियों में मार्गदर्शन का कठिन काम कर रहे थे। उन्हें उस काल की संवेदनशील परिस्थितियों का भली भांति ज्ञान था इसी लिए उन्होंने मार्गदर्शन के लिए एसी शैली का चयन किया जिससे न केवल यह कि उन्होंने उमवी शासन में भुला दी जाने वाली इस्लामी शिक्षाओं को नवजीवन प्रदान किया बल्कि उसके प्रसार व प्रचार का वातावरण भी बनाया। उन्होंने विशेष शिष्यों को प्रशिक्षण देकर अपने विचारों और इस्लामी शिक्षाओं से लोगों को परिचित कराया और इस प्रकार से बाद में जाफरी मत से प्रसिद्ध होने मत के लिए भूमिका प्रशस्त की। उन्होंने शिष्यों के प्रशिक्षण के साथ ही दासों को इस्लामी ज्ञान देकर और फिर उन्हें स्वतंत्र करके भी समाज में इस्लामी शिक्षाओं का प्रचार किया। जैसा कि इतिहासकारों ने उल्लेख किया कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने ईश्वर की राह में एक हज़ार दासों को स्वतंत्र किया। वे दासों को खरीदते थे और उन्हें शिक्षा दीक्षा देते। वह दास, इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के साथ रह कर उनके जीवन से प्रभावित होते और जब इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम उन्हें स्वतंत्र करते तो वे एक सही धार्मिक व ज्ञानी मनुष्य में बदल चुके होते। जितने समय यह दास इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के पास रहते उसके दौरान वे इमाम से इतने निकट हो जाते कि जब इमाम उन्हें स्वतंत्र करते तो भी वे इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के पास से जाना स्वीकार नहीं करते।

 

इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने इसी प्रकार अपने युग के लोगों के मार्गदर्शन के लिए दुआ की शैली चुनी और दुआओं द्वारा समाज को शिक्षित किया और इ्सलामी मूल्यों से अवगत कराया। अन्ततः 35 वर्षों तक अथक संघर्ष के बाद उन्हें हेशाम बिन अब्दुल मलिक के उकसावे पर वलीद बिन अब्दुलमलिक ने विष दिलवा दिया और इसी विष से उनकी शहादत हो गयी। उनकी क़ब्र वर्तमान सऊदी अरब के मदीना नगर के जन्नतुल बक़ीअ क़ब्रिस्तान में है जहां उनके चचा इमाम हसन अलैहिस्सलाम की भी कब्र है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम का पूरा जीवन संघर्ष दुखों और विपदाओं से भरा है किंतु इसके बावजूद एक क्षण के लिए भी वे मार्गदर्शन के अपने ईश्वरीय कर्तव्य को अनदेखा नहीं किया और पूरा जीवन समाज के मार्गदर्शन के लिए समर्पित कर दिया।

 

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