इमाम सज्जाद अ.स. की नज़र में माँ बाप की अहमियत

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इमाम सज्जाद अ.स. की नज़र में माँ बाप की अहमियत

इमाम सज्जाद अ.स. की विलादत के समय इमाम अली अस ज़ाहिरी हुकूमत थी आपने इमाम अली अ.स. की ख़ेलाफ़त के तीन साल और इमाम हसन अ.स. की ख़ेलाफ़त के कुछ महीने देखे हैं, ज़ाहिरी खिलाफत के अलावा आपने इमाम अली अ स और इमाम हसन और इमाम हुसैन अ स के साथ ज़िन्दगी गुज़ारी और आप 61 हिजरी में आशूर के दिन कर्बला में भी मौजूद थे और इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के बाद अपने शियों की सरपरस्ती को क़ुबूल करते हुए इमामत की ज़िम्मेदारी संभाली।

जिस दौर में इमाम सज्जाद अ.स. ज़िंदगी गुज़ार रहे थे उस वक़्त हुकूमत की पूरी कोशिश थी कि मज़हब की बुन्यादों को बदल दिया जाए और इस्लामी अहकाम इब्ने ज़ियाद, हज्जाज और मरवान जैसे बे दीनों के हाथ का खिलौना बनते जा रहे थे, ऐसे माहौल में अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि लोगों की नैतिकता (अख़लाक़) कितनी गिर चुकी होगी और लोग कितने ज़्यादा जेहालत के अंधेरों में खोए होंगे, बनी उमय्या के इन बे दीन हाकिमों ने मदीने और आस पास के इस्लामी शहरों के दीनी माहौल को इतना ख़राब कर दिया था कि दो अहम ख़तरे सामने खड़े दिखाई दे रहे थे, पहला इस्लामी माहौल और संस्कृति की जगह ग़ैर इस्लामी माहौल और संस्कृति, दूसरे ऐश और आराम की ज़िंदगी।

जिस समय ज़ुल्म और सितम,अत्याचार अपनी सारी हदों को पार कर चुका था, उस वक़्त की बनी उमय्या की हुकूमत के बे दीन हाकिम शराफ़त और आज़ादी को पैग़म्बर स.अ. के शहर से छीन रहे थे, हक़ की आवाज़ उठाने वालों और पैग़म्बर स.अ. की सुन्नत को ज़िंदा रखने वालों को मिटाने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही थी ऐसे हालात और ऐसे माहौल में इमाम सज्जाद अ.स. ने अपनी दुआओं के ज़रिए दीनी मआरिफ़ को मिटने से बचाया और  समाज जो लगभग मुर्दा हो चुका था दोबारा उसमें रूह फूक दी जिससे एक बार फिर लोग नमाज़ इबादत और अल्लाह से क़रीब होने लगे।

हदीस विशेषज्ञों का कहना है कि इमाम सज्जाद अ.स. से नक़्ल होने वाली 254 दुआएं मौजूद हैं जिसमें सहीफ़ए सज्जादिया के अलावा हुक़ूक़ नामी रिसाला और ज़ोह्द नामी रिसाला भी मौजूद है।

मां का हक़ इमाम सज्जाद अ स की नज़र में

क़ुर्आन और हदीस में वालेदैन के साथ नेक बर्ताव करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है, जिसकी ओर इमाम सज्जाद अ.स. ने भी हुक़ूक़ नामी रिसाले में इशारा किया है, आपने रिश्तेदारों के हुक़ूक़ को जहां बयान किया वही वहां मां के हक़ को इस तरह बयान किया है कि तुम पर मां का हक़ यह है कि उसने तुमको 9 महीने पेट में इस तरह रखा कि कोई दूसरा इस काम पर तैय्यार नहीं हो सकता, मां ही वह है जिसने तुमको दिल का लहू दूध की शक्ल में पिलाया यह भी केवल मां ही है जो अपने बच्चे के लिए कर सकती है, उसने पूरे ध्यान से अपनी आंख, कान, नाक, हाथ, पैर और बदन के हर हिस्से से तुम्हारा ख़्याल रखा, और ऐसा भी नहीं कि इस काम के लिए उसको किसी तरह की लालच या ज़ोर ज़बर्दस्ती हो बल्कि हंसी ख़ुशी शौक़ के साथ ऐसा किया, उसने जब तुम पेट में थे हर तरह के दर्द, तकलीफ़, मुश्किल और बीमारी को केवल तुम्हारे लिए सहन किया तब कहीं अल्लाह ने तुम्हें मां के पेट से निकाल कर इस दुनिया में भेजा।

यही वो मां थी जो ख़ुद तो भूखी रही लेकिन तुमको कभी भूखा नहीं रखा, ख़ुद प्यासी रही लेकिन तुम्हें जब जब प्यास लगी उसने तेरी प्यास बुझाई, वह ख़ुद तो धूप में बैठी लेकिन तुमको हमेशा चिलचिलाती गर्मी से बचाया, उसने हर वह काम किया जिससे तुम्हारी ज़िंदगी में ख़ुशियां और आराम आ सके, उसकी भरपूर कोशिशों से तुमको चैन की नींद आती रही है।

उसका पेट तुम्हारा घर उसकी गोद तुम्हारा झूला उसका वजूद तुम्हें हर परेशानी और कठिनाइयों से बचाने का में मददगार था, उसने दुनिया की सर्दी और गर्मी को बर्दाश्त किया ताकि तुम सुकून सो जी सको, इसलिए तुम हमेशा मां का उतना ही शुक्रिया अदा करो जितना उसने तुम्हारे लिए तकलीफ़ें और कठिनाइयां झेली हैं, और याद रहे तुम अल्लाह की मदद और तौफ़ीक़ के बिना मां का शुक्रिया नहीं अदा कर सकते।

बाप का हक़ इमाम सज्जाद अ स की नज़र में

आपने बाप के हक़ के बारे में फ़रमाया, ध्यान रहे कि तुम बाप ही की वजह से दुनिया में हो अगर वह न होते तो तुम भी न होते, इसलिए हमेशा ख़्याल रहे जब भी किसी नेमत और अच्छाई के मिलते समय दिल में घमंड पैदा हो तो तुरंत यह सोंचना कि इस नेमत और अच्छाई में तुम्हारे वालिद का हाथ है क्योंकि तुम उनकी वजह से ही दुनिया में हो, और फिर ख़ुदा की बारगाह में बाप जैसी नेमत मिलने पर उसका शुक्रिया अदा करो।

वालेदैन के हक़ में दुआ

इस बारे में सहीफ़ए सज्जादिया की 24वीं दुआ में मिलता है कि ख़ुदाया हमारे वालेदैन को विशेष सम्मान दे और अपनी ख़ास रहमत हमेशा उन पर नाज़िल कर....

ख़ुदाया! वालेदैन का सम्मान करना जैसा तू चाहता है वैसे ही करने की तौफ़ीक़ दे, हमें हमेशा वालेदैन के हक़ को अदा करने की तौफ़ीक़ दे.....

ख़ुदाया! मेरे दिल में मेरे वालेदैन की वैसी ही हैबत तारी कर दे जैसे बादशाहों की हैबत लोगों के दिलों में होती है, और मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं उनके साथ ऐसा रवैया अपनी सकूं जैसा एक मां अपने बच्चे के साथ अपनाती है.....

ख़ुदाया! अगर मेरे वालेदैन मुझ पर कम मेहेरबान हों तो तू उसे मेरी निगाह में ज़्यादा कर दे, और अगर उनके लिए मेरे अधिक सम्मान को मेरी निगाह में हमेशा कम दिखा.....

ख़ुदाया! मेरी मदद कर ताकि उनके सामने मैं हमेशा धीमी आवाज़ में बात करूं और हमेशा उनके लिए मेरा दिल नर्म रहे......

ख़ुदाया! मेरे बचपन में जिस तरह उन्होंने मेरी तरबियत की और मुझे सम्मान दिया तू उन्हें सम्मान दे और इसका उनको बेहतरीन सवाब दे, और जिस तरह उन्होंने मेरे बचपन में मुझे हर तकलीफ़ से बचाया तू उन्हें पूरी उम्र हर तकलीफ़ और मुसीबत से महफ़ूज़ रख.....

ख़ुदाया! अगर मेरे वालेदैन ने कभी मेरे साथ बुरा बर्ताव किया हो या मेरा हक़ पूरा न किया हो या मेरी तरबियत में कोई कमी की हो तो मैंने उनको माफ़ किया क्योंकि मैं इनमें से किसी काम के लिए उनको दोष नहीं दूंगा बल्कि इन सब में मेरी ही कमी है उनके एहसान और उनके हक़ मुझ पर बहुत अधिक है, मैं उनके बर्ताव को ले कर तेरी बारगाह में शिकायत कर ही नहीं सकता, ख़ुदाया तू उनके साथ नर्मी और मोहब्बत के साथ बर्ताव कर......

ख़ुदाया! अगर तू ने मुझसे पहले मेरे वालेदैन के गुनाहों को माफ़ कर दिया तो उनको मेरी शफ़ाअत की अनुमति देना और अगर मुझे उन से पहले माफ़ कर दिया तो मुझे उनकी शफ़ाअत की अनुमति देना, ताकि हम साथ में तेरी रहमत, करम और मोहब्बत को हासिल कर सकें इसलिए कि तू बड़ा मेहेरबान है और तू ही नेमतें देने वाला और रहम व करम वाला है।

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