हज़रत सकीना (स) कर्बला की ख़ामोश सदा और मज़लूमियत-ए-हुसैन(अ)की अबदी सनद

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हज़रत सकीना (स) कर्बला की ख़ामोश सदा और मज़लूमियत-ए-हुसैन(अ)की अबदी सनद

हज़रत इमाम हुसैन (अ.) को हज़रत सकीना (स.अ.) से बेहद मोहब्बत थी। यह मोहब्बत सिर्फ़ एक बाप की फ़ितरी शफ़क़त नहीं थी, बल्कि रूहानी उन्स, क़ल्बी वाबस्तगी और अहल-ए-बैत (अ.) के पाकीज़ा ख़ानदानी माहौल का ख़ूबसूरत मज़हर थी। कुछ मुअतबर माख़ज़ में इस मोहब्बत की तर्जुमानी करते हुए ये अश्आर इमाम हुसैन (अ.) की तरफ़ मंसूब किए गए हैं:

लेखक: मौलाना तक़ी अब्बास रिज़वी कलकत्तवी
 हज़रत सकीना बिन्त इमाम हुसैन (अ.) हज़रत रबाब बिन्त इमरुल-क़ैस के बतन से थीं। तारीख़ में आपका नाम आमिना, अमीना और उमैमा भी बयान हुआ है, लेकिन “सकीना” आपका वह मशहूर लक़ब है जो आपकी शख्सियत के सुकून, वक़ार, मुतानत और क़ल्बी इत्मीनान की अक्कासी करता है। कहा जाता है कि आपकी वालिदा ने आपके पुरसुकून और बाअदब मिज़ाज को देखकर आपको “सकीना” के लक़ब से पुकारना शुरू किया, और यही लक़ब तारीख़ में आपकी पहचान बन गया।
तारीखी किताबों में आपकी तारीख़-ए-विलादत वाज़ेह तौर पर मौजूद नहीं, अलबत्ता इतना ज़रूर बयान किया गया है कि आप अपनी बहन हज़रत फ़ातिमा बिन्त अल-हुसैन (अ.) से छोटी थीं।
हज़रत इमाम हुसैन (अ.) को हज़रत सकीना (स.अ.) से बेहद मोहब्बत थी। यह मोहब्बत सिर्फ़ एक बाप की फ़ितरी शफ़क़त नहीं थी, बल्कि रूहानी उन्स, क़ल्बी वाबस्तगी और अहल-ए-बैत (अ.) के पाकीज़ा ख़ानदानी माहौल का ख़ूबसूरत मज़हर थी। कुछ मुअतबर माख़ज़ में इस मोहब्बत की तर्जुमानी करते हुए ये अश्आर इमाम हुसैन (अ.) की तरफ़ मंसूब किए गए हैं:
لَعَمْرُكَ إِنَّنِي لَأُحِبُّ دَارًا تَكُونُ بِهَا سُكَيْنَةُ وَالرَّبَابُ
أُحِبُّهُمَا وَأَبْذُلُ جُلَّ مَالِي وَلَيْسَ لِعَاتِبٍ عِنْدِي عِتَابُ
अनुवाद: “तुम्हारी जान की क़सम! मैं उस घर से मोहब्बत करता हूँ जिसमें सकीना और रबाब हों। मैं इन दोनों से मोहब्बत करता हूँ और अपने माल का बड़ा हिस्सा उन पर खर्च करता हूँ, और इस मामले में किसी मलामत करने वाले की मलामत की मुझे कोई परवाह नहीं।”
ये अश्आर सिर्फ़ एक बाप के जज़्बात नहीं, बल्कि इमाम-ए-मज़लूम के क़ल्ब-ए-अतहर की लताफ़त, रहमत और अहल-ए-ख़ाना से बेपनाह मोहब्बत की रोशन दलील हैं। हज़रत सकीना (स.अ.) और हज़रत रबाब (स.अ.) इमाम हुसैन (अ.) के नज़दीक घर की हक़ीक़ी रौनक़, सुकून-ए-दिल और मोहब्बत व उन्स का मरकज़ थीं। यही वह पाकीज़ा फ़िज़ा थी जिसे करबला के ज़ुल्म ने उजाड़ दिया, मगर उस मोहब्बत की ख़ुश्बू आज भी तारीख़ के सफ़हात और अहल-ए-दिल के क़ुलूब में ज़िंदा है।
करबला की तारीख़ में कुछ किरदार ऐसे हैं जिन्होंने तलवार नहीं उठाई, मगर उनकी ख़ामोशी ने तारीख़ के ऐवानों को हिला दिया। कुछ चेहरे ऐसे हैं जिन्होंने ख़ुत्बे नहीं दिए, मगर उनके आँसू सदियों पर मुहीत एक एहतेजाज बन गए। हज़रत सकीना बिन्त अल-हुसैन (स.अ.) उन्हीं अज़ीम किरदारों में से एक हैं। एक मासूम बच्ची, एक नन्ही असीर, एक ख़ामोश शहीदा, मगर ऐसी शहीदा जिसकी मज़लूमियत ने वाक़िआ-ए-आशूरा को एक दाइमी और ज़िंदा तारीखी तहरीक में तब्दील कर दिया।
हज़रत सकीना (स.अ.) की अज़मत को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि वह सिर्फ़ एक शहीदा बच्ची नहीं, बल्कि ख़ानदान-ए-इमामत व विलायत की मज़लूमियत की ज़िंदा सनद हैं। उनकी मासूम शहादत ने बनी उमय्या के ज़ुल्म, बेदिनी और बेचेहरगी को तारीख़ के सामने बेनक़ाब कर दिया। गोया इमाम हुसैन (अ.) ने शाम में अपनी एक ऐसी निशानी छोड़ दी, ताकि आने वाली नस्लें कभी इस हक़ीक़त का इंकार न कर सकें कि अहल-ए-बैत-ए-रसूल (स.) को असीर बनाया गया था, और उस क़ाफ़िले में नन्ही बच्चियाँ भी शामिल थीं।
वाक़िआ-ए-आशूरा सिर्फ़ मैदान-ए-करबला तक महदूद नहीं। आशूरा के बाद क़ाफ़िला-ए-असीर, इमाम सज्जाद (अ.) के ख़ुत्बे और हज़रत ज़ैनब (स.अ.) की बेदारगर सदाओं ने नहज़त-ए-हुसैनी को ज़िंदा रखा। इसी सिलसिले की एक दर्दनाक मगर फ़ैसलाकुन कड़ी हज़रत सकीना (स.अ.) की शहादत है। शाम, जो मुआविया की हुकूमत और बनी उमय्या की सियासत का मरकज़ था, वहीं एक मासूम बच्ची की आह ने ज़ुल्म के ऐवानों को लरज़ा दिया।
हुज्जतुल-इस्लाम रूहुल्लाह रहमानी मेहर ने एक बेहद रक़्क़तअंगेज़ मंज़र नक़्ल किया है। वह फ़रमाते हैं कि हज़रत सकीना (स.अ.) अपने नन्हे हाथों से इमाम हुसैन (अ.) का सज्दा-गाह बिछातीं, अपने बाबा का इंतज़ार करतीं और उनके रुकूअ व सुजूद को देखकर ख़ुश होतीं। ज़ुहर-ए-आशूरा के दिन भी वह हमेशा की तरह सज्दा-गाह बिछाकर अपने बाबा की राह तकती रहीं, मगर इस इंतज़ार का जवाब तलवारों और ज़ुल्म ने दिया। जब शिम्र ख़ैमे में दाख़िल हुआ और उस मासूम बच्ची ने अपने बाबा के बारे में पूछा तो उसने जवाब में तमाचा मारा। यह सिर्फ़ एक बच्ची पर हाथ उठाना नहीं था, बल्कि इंसानियत, शफ़क़त और हुरमत-ए-अहल-ए-बैत (अ.) पर हमला था।
हमारा लाखों सलाम उस मासूमा पर जो आशूरा के दिन ढलने तक अपने से छोटे बच्चों को यह कहकर दिलासा देती रही कि “अभी अम्मू अब्बास (अ.) पानी लेकर आएँगे।” हमारा लाखों सलाम उस नन्ही शहज़ादी पर जो शाम-ए-ग़रीबाँ से लेकर अपनी आख़िरी साँस तक वतन लौटने, अपने बाबा के आने और उनकी आग़ोश में फिर से सोने की उम्मीद लिए बैठी रही, यहाँ तक कि इंतज़ार की थकन ने उसे शाम के क़ैदख़ाने में हमेशा के लिए सुला दिया।
सलाम हो उस मासूम बच्ची पर जो कभी अपने नन्हे हाथों से इमाम हुसैन (अ.) का सज्दा-गाह बिछाती, बाबा का इंतज़ार करती और उनके रुकूअ व सुजूद को देखकर ख़ुश होती थी। ज़ुहर-ए-आशूरा के दिन भी वह हमेशा की तरह सज्दा-गाह बिछाकर अपने बाबा की राह तकती रही, मगर इस इंतज़ार का जवाब तलवारों, ज़ुल्म और संगदिली ने दिया।
हज़रत सकीना (स.अ.) एक नन्ही सफ़ीर-ए-करबला हैं। उन्होंने अपने छोटे-छोटे हाथों से तारीख़-ए-करबला का ऐसा सुनहरा बाब रक़्म किया जिसके हर हरफ़ में वफ़ादारी, सब्र, इस्तिक़ामत और अहल-ए-बैत (अ.) से बेमिसाल मोहब्बत झलकती है। उनकी शहादत ख़ानदान-ए-रिसालत के सब्र व शकीबाई की रोशन तजल्ली है; वह ख़ानदान जो उम्मत को जहालत, ज़ुल्म और गुमराही से निकालने के लिए हर मुसीबत को ख़ंदा-पेशानी से क़ुबूल करता है।
ख़राबा-ए-शाम में बहने वाले उनके आँसू सिर्फ़ बाबा की जुदाई के आँसू नहीं थे। वह उन इंसाननुमा ज़ालिमों के ख़िलाफ़ ख़ामोश एहतेजाज थे जिनके चेहरों पर मर्दानगी थी मगर दिल इंसानियत से ख़ाली थे। इसी लिए हज़रत सकीना (स.अ.) को मज़लूमियत-ए-हुसैन (अ.) की अबदी आवाज़ कहा जाता है। उनकी मासूम फ़रियाद ने यज़ीदी ज़ुल्म के चेहरे से नक़ाब नोच लिया और रहती दुनिया तक हक़ के चराग़ को रोशन कर दिया।
आयतुल्लाह मिर्ज़ा जवाद तबरीज़ी (रह.) के मुताबिक़, हज़रत सकीना (स.अ.) का मज़ार इस बात की अज़ीम गवाही है कि क़ाफ़िला-ए-असीर में कमसिन बच्चियाँ भी थीं। यह मज़ार सिर्फ़ एक क़ब्र नहीं, बल्कि असारत-ए-अहल-ए-बैत (अ.) की नाक़ाबिले-तरदीद तारीखी शहादत है। शायद यही वजह है कि शाम में उनका रौज़ा आज भी दिलों को झकझोर देता है, गुमराह दिलों को विलायत की तरफ़ मुतवज्जेह करता है और मज़लूमियत को इबादत में बदल देता है।
हुसैन (अ.) के सीना-ए-अतहर पर सोने वाली यह मासूम बच्ची जब शाम के ज़िंदान में शहीद हुई तो बज़ाहिर एक बच्ची दुनिया से रुख़्सत हुई, मगर हक़ीक़त में एक ऐसी सदा जन्म ले गई जो कभी ख़ामोश नहीं हो सकती। उसकी शहादत ने साबित कर दिया कि करबला सिर्फ़ एक दिन का हादसा नहीं, बल्कि हक़ और बातिल के दरमियान हमेशा जारी रहने वाली जद्दोजहद का नाम है।
सलाम हो उन मासूम आँखों पर जो बाबा की राह तकते-तकते बंद हो गईं। सलाम हो उस नन्हे दिल पर जो प्यास, असारत, जुदाई और ग़म के पहाड़ उठाकर भी अहल-ए-बैत (अ.) की मज़लूमियत की अबदी दास्तान बन गया।
आज भी हज़रत सकीना (स.अ.) का रौज़ा इस हक़ीक़त की गवाही देता है कि ज़ुल्म की उम्र मुख़्तसर होती है, मगर मज़लूमियत की सदा हमेशा ज़िंदा रहती है। तारीख़ ने बहुत से बादशाहों के नाम मिटा दिए, मगर एक मासूम बच्ची के आँसू महफ़ूज़ रखे। यज़ीद का तख़्त मिट्टी हो गया, मगर सकीना (स.अ.) की फ़रियाद ज़िंदा है।
यही करबला का मोजिज़ा है, यही अहल-ए-बैत (अ.) की मज़लूमियत की ताक़त है, और यही हज़रत सकीना (स.अ.) का अबदी पैग़ाम है कि हक़ कभी तनहा नहीं मरता, और मज़लूमियत कभी ख़ामोश नहीं होती।
और हमारा लाखों सलाम उस शहज़ादी पर जिसने अपने ख़ामोश आँसुओं से यज़ीदी ज़ुल्म के ऐवानों को हिला दिया, अपने मासूम इंतज़ार से इंसानियत को जगा दिया, और रहती दुनिया तक हक़ के चराग़ को रोशन कर दिया।

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