इमाम-ए-ज़माना (अ) की इमामत का आरंभ और ग़ैबत का दौर

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इमाम-ए-ज़माना (अ) की इमामत का आरंभ और ग़ैबत का दौर

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ) की शहादत के बाद वर्ष 260 हिजरी में हज़रत इमाम ज़माना (अ) इमामत के पद पर आसीन हुए। इमाम हसन अस्करी (अ.) की ओर से अपने पुत्र हज़रत इमाम महदी (अ) की इमामत के बारे में तमाम हिदायतों और वसीयतों के बावजूद जाफ़र कज़्ज़ाब ने इमामत का दावा किया।

यहाँ जाफ़र बिन कज़्ज़ाब के सामने हज़रत इमाम महदी (अ) के ज़ाहिर होने की दो घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। मुहम्मद बिन सालेह कहते हैं कि इमाम हसन अस्करी (अ) की शहादत के बाद जब जाफ़र कज़्ज़ाब विरासत के मामले में विवाद कर रहा था, तो साहिबुल-अम्र (अ) एक अज्ञात स्थान से जाफ़र के सामने ज़ाहिर हुए और फ़रमाया: "ऐ जाफ़र! तुम हमारे अधिकारों में क्यों हस्तक्षेप कर रहे हो?" जाफ़र हैरान और स्तब्ध रह गया। इसके बाद इमाम (अ) उसकी नज़रों से ओझल हो गए। जाफ़र ने लोगों के बीच उन्हें तलाश किया, लेकिन वे दिखाई नहीं दिए।

इसी तरह जब इमाम हसन अस्करी (अ) की माता, अर्थात इमाम महदी (अ) की दादी का निधन हुआ और उन्होंने कहा कि उन्हें उसी घर में दफ़न किया जाए, तो जाफ़र ने उनसे विवाद किया और कहा: यह मेरा घर है और इसमें किसी को दफ़न नहीं किया जाएगा। उसी समय इमाम महदी (अ) ज़ाहिर हुए और फ़रमाया: "ऐ जाफ़र! क्या यह घर तुम्हारा है?" इसके बाद वे फिर लोगों की निगाहों से ओझल हो गए और जाफ़र ने दोबारा उन्हें नहीं देखा। (1)

गुप्तकाल की शुरुआत

हज़रत इमाम महदी (अ) ने अपने पिता के पार्थिव शरीर पर नमाज़ पढ़ने और जाफ़र के झूठे दावे को अस्वीकार करने के बाद लोगों की निगाहों से ख़ुद को छिपा लिया। इसी समय से इमाम (अ) की प्रारंभिक ग़ैबत का दौर शुरू हुआ, जिसे ग़ैबत-ए-सुग़रा कहा जाता है।

इमाम जाफ़र सादिक (अ) से शियो तक पहुँची एक रिवायत के अनुसार, उन्होंने इमाम ज़माना (अ) की ग़ैबत को दो हिस्सों में बताया और फ़रमाया:

"साहिबुल-अम्र की दो ग़ैबतें हैं। उनमें से एक इतनी लंबी होगी कि कुछ लोग कहेंगे कि उनका निधन हो गया है, कुछ कहेंगे कि उन्हें क़त्ल कर दिया गया है और कुछ कहेंगे कि वे चले गए हैं। यहाँ तक कि उनके बहुत कम अनुयायियों के अलावा कोई भी उनके अस्तित्व और ज़ुहूर पर विश्वास रखने वाला नहीं रहेगा। उनके स्थान की जानकारी न उनकी संतान को होगी और न किसी अन्य को, सिवाय उस अल्लाह के जिसके हाथ में उनका ज़ुहूर है।" (2)

ग़ैबत-ए-सुग़रा वर्ष 260 हिजरी से शुरू हुई और इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 329 हिजरी तक जारी रही।

यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इससे पहले ही आइम्मा-ए-हुदा (अ) ने अलग-अलग तरीकों से लोगों को इमाम ज़माना (अ) की ग़ैबत के दौर के लिए तैयार किया था। इसी संबंध में मसऊदी ने "इस्बातुल-वसिय्या" में इमाम अली नक़ी (अ) से एक रिवायत बयान की है:

"जब इमामत की ज़िम्मेदारी इमाम हसन अस्करी (अ) को सौंपी गई, तो वे अपने विशेष शियो और अन्य लोगों से पर्दे के पीछे से बातचीत करते थे।" (3)

इमाम हसन अस्करी (अ) और उनके पिता की ओर से इस प्रकार व्यवहार करने का उद्देश्य इमाम महदी (अ) की ग़ैबत के लिए पहले से वातावरण तैयार करना था, ताकि शिया इस विषय से परिचित हो जाएँ, इमाम के ग़ैबत में चले जाने का इनकार न करें और लोगों को इमाम के पर्दे में रहने की स्थिति की आदत हो जाए।

एक अन्य रिवायत में आया है कि वर्ष 260 हिजरी में इमाम हसन अस्करी (अ) ने अपने शियो से फ़रमाया:

"हमने तुम्हें आदेश दिया था कि अंगूठी दाहिने हाथ में पहनो। ऐसा इसलिए था क्योंकि हम तुम्हारे बीच मौजूद थे। अब हम तुम्हें आदेश देते हैं कि अंगूठी बाएँ हाथ में पहनो, क्योंकि हम तुम्हारी निगाहों से छिपने वाले हैं।"

इसके बाद उन्होंने फ़रमाया कि जब तक अल्लाह हमारे और तुम्हारे मामले को स्पष्ट न कर दे, यह स्थिति रहेगी और यह अहले-बैत (अ) के प्रति तुम्हारी निष्ठा की एक अच्छी निशानी होगी। इसके बाद सभा में उपस्थित सभी लोगों ने अपनी अंगूठियाँ दाहिने हाथ से निकालकर बाएँ हाथ में पहन लीं। (4)

इमाम-ए-अस्र (अ) की ग़ैबत-ए-सुग़रा वर्ष 329 हिजरी तक जारी रही। इस अवधि में इमाम (अ) अपने विशेष प्रतिनिधियों के माध्यम से लोगों के संपर्क में रहे। लेकिन उस समय के राजनीतिक दमन और कठिन परिस्थितियों ने ग़ैबत-ए-कुबरा की भूमिका तैयार कर दी।

कुलैनी ने "अल-काफ़ी" में ग़ैबत-ए-कुबरा के आरंभ के संबंध में लिखा है कि बनी फ़ुरात एक शिया क़बीला था और उनमें से कई लोग अब्बासी शासन में मंत्री के पद तक पहुँचे। उनमें से एक अबू अल-फ़त्ह जाफ़र बिन फ़ुरात था, जो अब्बासी ख़लीफ़ा मुक़्तदिर का मंत्री था और बाद में मुहम्मद बिन जाफ़र का भी मंत्री बना। कहा गया है कि इन्हीं परिस्थितियों में से एक परिस्थिति ग़ैबत-ए-कुबरा के आरंभ के कारणों में शामिल थी, जो वर्ष 329 हिजरी में शुरू हुई। (5)

इमाम महदी (अ) की ग़ैबत की हिकमत और कारण

ग्यारह मासूम इमामों की तीन सौ से अधिक वर्षों तक मौजूदगी के बाद, जो अल्लाह की ओर से इंसानों की हिदायत के लिए आए थे, आख़िरी इमाम का ग़ैबत में जाना निश्चित रूप से किसी हिकमत पर आधारित है। इस संबंध में मासूम इमामों से विश्वसनीय रिवायतें भी मौजूद हैं।

इस विषय में अल्लामा मजलिसी ने किताब बिहारुल अनवार में विभिन्न रिवायतों के आधार पर इमाम की ग़ैबत के कुछ कारण इस प्रकार बताए हैं:

1. हत्या का ख़तरा

किताब कमालुद्दीन में ज़ुरारा से रिवायत है कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने फ़रमाया: उस नौजवान के क़याम से पहले उसके लिए ग़ैबत होगी। मैंने पूछा: क्यों? फ़रमाया: उन्हें अपनी जान से डर है कि कहीं उन्हें क़त्ल न कर दिया जाए।(6)

बेशक यह डर उस समय है जब अल्लाह की ओर से उनके ज़ुहूर का आदेश नहीं हुआ है। अन्यथा वे भी अपने महान पूर्वजों की तरह अल्लाह की राह में क़त्ल होने से नहीं डरते। इसी विषय में एक दूसरी रिवायत में ज़ुरारा बिन आयुन कहते हैं कि मैंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) को फ़रमाते हुए सुना: वह नौजवान क़याम करने से पहले ग़ैबत करेगा। मैंने पूछा: वह ग़ैबत क्यों करेगा? फ़रमाया: उसे अपनी जान का डर है। यह कहते समय इमाम ने अपने पेट और गर्दन की ओर इशारा किया। (7)

2. किसी की बैअत का ज़िम्मेदार न होना

रिवायतों में इमाम की ग़ैबत का एक और कारण यह बताया गया है कि ज़ुहूर से पहले किसी व्यक्ति या शासक की बैअत इमाम की गर्दन पर न हो।

हसन बिन फ़ज़्ज़ाल अपने पिता से और वे इमाम रज़ा (अ) से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फ़रमाया: ऐसा लगता है कि मैं अपने शियों को उस समय देख रहा हूँ जब वे मेरे चौथे वंशज को खो देंगे। वे उसे तलाश करने के लिए मैदानों और जंगलों में भटकेंगे, लेकिन उसे नहीं पाएँगे।

मैंने पूछा: ऐ रसूलुल्लाह के बेटे! ऐसा क्यों होगा?

उन्होंने फ़रमाया: इसलिए कि उनका इमाम उनकी निगाहों से ग़ायब हो जाएगा।

मैंने पूछा: वह ग़ायब क्यों होगा?

फ़रमाया: ताकि जब वह तलवार के साथ क़याम करे तो किसी की बैअत उसकी गर्दन पर न हो। (8)

3. शियों की परीक्षा और छटाई

इमाम-ए-अस्र (अ) की ग़ैबत का एक अन्य कारण यह है कि लोग अल्लाह की ओर से परीक्षा और आज़माइश में पड़ें, ताकि सच्चे और वफ़ादार शिया अलग होकर सामने आएँ और वे शुद्ध सोने की तरह बाक़ी रहें।

अब्दुल्लाह बिन अबी यअफ़ूर इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फ़रमाया: अरब के सरकश लोगों पर आने वाली मुसीबत के कारण अफ़सोस है।

मैंने पूछा: मैं आप पर क़ुर्बान हो जाऊँ, अरब में कितने लोग क़ाइम के साथ होंगे?

इमाम ने फ़रमाया: बहुत थोड़े।

मैंने कहा: अल्लाह की क़सम! अरब में इस विचार को मानने वाले बहुत अधिक लोग हैं।

इमाम ने फ़रमाया: लोगों का अवश्य परीक्षण और परीक्षा होगी और उनकी आध्यात्मिक छंटाई होगी। उस समय अधिकांश अशुद्ध लोग छंटकर अलग हो जाएँगे। (9)

जाबिर जुअफ़ी कहते हैं कि मैंने इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से पूछा: आपके फ़रज का समय कब आएगा?

उन्होंने फ़रमाया: बहुत दूर है, बहुत दूर है। हमारा फ़रज उस समय तक नहीं आएगा जब तक तुम लोगों की परीक्षा न हो जाए। फिर परीक्षा होगी और फिर परीक्षा होगी।

इमाम ने यह बात तीन बार दोहराई, यहाँ तक कि गंदगी और अशुद्धता दूर हो जाए और केवल पवित्रता बाक़ी रह जाए। (10)

इमाम-ए-ज़माना (अ) के चार विशेष प्रतिनिधि

ग़ैबत-ए-सुग़रा के लगभग 69 या 74 वर्षों के दौरान शिया समुदाय के चार महान व्यक्तियों ने इमाम-ए-अस्र (अ.) के विशेष प्रतिनिधि के रूप में ज़िम्मेदारी निभाई। उनके नाम इस प्रकार हैं:

1. अबू अम्र, उस्मान बिन सईद

उन्होंने ग्यारह वर्ष की आयु से ही पिछले इमामों (अ) की सेवा करना शुरू कर दिया था। वे इमाम हादी (अ) और इमाम हसन अस्करी (अ) के विश्वसनीय साथियों में से थे।

उस्मान बिन सईद को अस्करी भी कहा जाता था, क्योंकि वे सामर्रा के ‘अस्कर’ नामक स्थान से थे। उन्हें ‘सम्मान’ भी कहा जाता था, क्योंकि इमाम-ए-ज़माना (अ) की विशेष प्रतिनिधित्व को छिपाने के लिए वे तेल बेचने का काम करते थे।

शिया लोग इमाम हसन अस्करी (अ) के लिए जो माल लेकर आते थे, वह उन्हें दे देते थे। वे सरकारी लोगों के डर से उस माल को तेल के मश्कों में छिपाकर इमाम के घर तक पहुँचा देते थे।

उन्होंने 260 से 267 हिजरी तक इमाम-ए-ज़माना (अ) के प्रतिनिधि का पद संभाला। (11)

2. अबू जाफ़र मुहम्मद बिन उस्मान

वे इमाम-ए-अस्र (अ) के पहले प्रतिनिधि, उस्मान बिन सईद के बेटे थे। उन्होंने 267 से 305 हिजरी तक विशेष नायबी की ज़िम्मेदारी निभाई। (12)

जब मुहम्मद बिन उस्मान का देहांत हुआ तो इमाम की नायबी हुसैन बिन रूह को सौंप दी गई।

3. अबुल क़ासिम हुसैन बिन रूह नौबख्ती

मुहम्मद बिन उस्मान के बाद इमाम-ए-ज़माना (अ) का प्रतिनिधित्व हुसैन बिन रूह को दी गई।

उनकी विश्वसनीयता के बारे में अबुल हसन अली बिन बिलाल से एक रिवायत मिलती है। वे कहते हैं कि मुहम्मद बिन उस्मान (रज़ि.) के बग़दाद में दस वकील थे, जिनमें अबुल क़ासिम हुसैन बिन रूह भी शामिल थे। हालाँकि अन्य वकील मुहम्मद बिन उस्मान के अधिक क़रीबी थे, फिर भी उन्होंने हुसैन बिन रूह को अपना उत्तराधिकारी बनाया। (13)

इस महान विद्वान ने 305 से 326 हिजरी तक, लगभग 21 वर्षों तक इमाम-ए-अस्र (अ) के प्रतिनिधि की ज़िम्मेदारी निभाई।

4. अबुल हसन अली बिन मुहम्मद समुरी

उन्होंने लगभग तीन वर्षों तक, अर्थात 326 से 329 हिजरी तक, इमाम-ए-ज़माना (अ) के विशेष नायब के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी निभाई।

जब अबुल हसन समुरी की मृत्यु का समय निकट आया तो कुछ शिया उनकी बीमारी के दिनों में उनके पास पहुँचे और पूछा: ऐ अबुल हसन! आपके बाद इमाम-ए-ज़माना (अ) का प्रतिनिधित्व किसे सौंपा जाएगा और आपका उत्तराधिकारी कौन होगा?

अली बिन मुहम्मद ने कहा: इस विषय में मुझे कोई अनुमति नहीं मिली है और मैं उनकी अनुमति के बिना किसी को उनका प्रतिनिधि नहीं बना सकता। निश्चित रूप से इस मामले में वही इमाम स्वयं व्यवस्था करेंगे और यह बात तुम लोगों के सामने स्पष्ट हो जाएगी। (14)

इस प्रकार समुरी के देहांत के बाद पूर्ण ग़ैबत, अर्थात ग़ैबत-ए-कुबरा, का दौर शुरू हुआ और आज तक जारी है।

ग़ैबत-ए-कुबरा और विशेष प्रतिनिधियो की समाप्ति

ग़ैबत-ए-कुबरा शुरू होने और इमाम के विशेष प्रतिनिधियो का प्रतिनिधित्व समाप्त होने के बाद, शेख़ सदूक़ ने अपनी किताब इकमाल में, शेख़ तूसी ने किताब ग़ैबत में और तबरीसी ने किताब अल-इहतिजाज में सही सनद के साथ इमाम-ए-ज़माना (अ) से रिवायत की है कि उन्होंने इसहाक़ बिन याक़ूब के सवालों के जवाब में लिखा:

“और जो घटनाएँ और समस्याएँ तुम्हारे सामने आएँ, उनमें हमारी हदीसों के वर्णन करने वालों की ओर रुजू करो। वे मेरी ओर से तुम पर हुज्जत हैं और मैं अल्लाह की हुज्जत हूँ। فارجعوا الى‏ رواة حديثنا فانهم حجتى عليكم و انا حجة اللّه” (15)

ग़ैबत-ए-सुग़रा के समय इमाम के विशेष नायब उनकी अनुपस्थिति में कई महत्वपूर्ण कार्य करते थे। इनमें इमाम-ए-ज़माना (अ) के जन्म के बारे में लोगों के संदेह और परेशानी को दूर करना, इमाम को ख़तरों से बचाने के लिए उनके स्थान को गुप्त रखना, लोगों के फ़िक़्ही और अक़ीदती सवालों का जवाब देना, झूठे नायब होने का दावा करने वालों का मुकाबला करना, लोगों को ग़ैबत-ए-कुबरा स्वीकार करने के लिए तैयार करना, ज़रूरतमंदों की मदद करना और शरई माल तथा धार्मिक धन को योग्य लोगों तक पहुँचाना शामिल था।

ग़ैबत के दौर में शियों की ज़िम्मेदारियाँ

यह बात स्पष्ट है कि वली-ए-अस्र (अ) की ग़ैबत के समय शियों की वही ज़िम्मेदारियाँ हैं जो इमाम-ए-मासूम की मौजूदगी के समय होती हैं। इसलिए यह देखना चाहिए कि मासूम इमामों (अ) ने अलग-अलग परिस्थितियों में अपने साथियों और अनुयायियों को क्या निर्देश दिए हैं और शियों को भी उन्हीं का पालन करना चाहिए।

इस विषय में अल्लामा मजलिसी ने नुमानी से बयान किया है:

“इमामों की शैली और उनके दिए हुए निर्देशों को देखो। यह देखो कि वे कठिन परिस्थितियों में किस प्रकार धैर्य रखते थे, स्वयं को और अपने शियों को ख़तरों से बचाते थे और फ़रज की प्रतीक्षा करते थे। वे कहते थे कि जो लोग इस मामले में जल्दबाज़ी करते हैं, वे हलाक और गुमराह हो जाते हैं, और जो जल्दबाज़ी के साथ उसकी इच्छा करते हैं, वे झूठे हैं।

देखो कि उन्होंने उन लोगों की प्रशंसा कैसे की जो परिस्थितियों के सामने समर्पित रहते हैं, इमामों के आदेश का पालन करते हैं, आले-मुहम्मद के फ़रज की प्रतीक्षा करते हैं, धैर्य और स्थिरता से काम लेते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को सफल बताया और उनकी तुलना ऐसी मज़बूत चट्टान से की जो अपनी नींव पर दृढ़ रहती है। इसलिए ऐ पढ़ने वालों! तुम भी उनका अनुसरण करो, उनके आदेश के सामने समर्पित रहो और उनकी राह से अलग न हो।”

नुमानी ने अपनी किताब ग़ैबत में अबू बसीर के माध्यम से इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से भी रिवायत की है कि उन्होंने फ़रमाया: “ग़ैबत के समय शियों की ज़िम्मेदारियाँ वही हैं जो मासूम इमाम की मौजूदगी के समय इमामों ने बताई हैं।” (16)

ग़ैबत के समय शियों की कुछ ज़िम्मेदारियाँ इस प्रकार हैं:

1-तक़य्या करना

हुसैन बिन ख़ालिद कहते हैं कि इमाम रज़ा (अ) ने फ़रमाया: “जिस व्यक्ति में परहेज़गारी नहीं है, उसका कोई धर्म नहीं है और जो तक़य्या नहीं करता, उसका कोई ईमान नहीं है। तुममें अल्लाह के निकट सबसे सम्मानित वह है जो सबसे अधिक तक़य्या करता है।”

लोगों ने पूछा: ऐ फ़रज़ंदे रसूल! यह कब तक रहेगा?

इमाम ने फ़रमाया: उस निश्चित समय तक, जो हमारे अहलेबैत के क़ायम के ज़ूहूर का दिन है। जो व्यक्ति हमारे क़ाइम के ज़ुहूर से पहले तक़य्या छोड़ देगा, वह हममें से नहीं है।

लोगों ने पूछा: ऐ फ़रजदे रसूल! आपके अहलेबैत के क़ायम कौन हैं?

इमाम ने फ़रमाया: वह मेरी संतान में चौथे व्यक्ति हैं और कनीज़ों की सरदार के बेटे हैं। अल्लाह उनके माध्यम से धरती को हर अत्याचार से पाक करेगा और हर अन्याय से मुक्त करेगा। वही वह व्यक्ति हैं जिनके जन्म के बारे में लोग संदेह करेंगे। वही वह हैं जो अपने ज़ुहूर से पहले ग़ैबत में रहेंगे। जब वे ज़ुहूर करेंगे तो धरती उनके प्रकाश से रोशन हो जाएगी और लोगों के बीच न्याय का तराज़ू स्थापित करेंगे, फिर कोई व्यक्ति दूसरे पर अत्याचार नहीं करेगा।

वे ऐसे होंगे कि धरती उनके लिए सिमट जाएगी और उनके लिए कोई छाया नहीं होगी। आसमान से एक पुकारने वाला उन्हें उनके नाम से पुकारेगा और उनकी ओर लोगों को बुलाएगा। धरती के सभी लोग उस आवाज़ को सुनेंगे। वह पुकारेगा:

“सुनो! अल्लाह की हुज्जत ख़ान-ए-काबा के पास जूहूर कर चुकी है, इसलिए उसका अनुसरण करो, क्योंकि सत्य उसके साथ है और उसी में है।الا إنّ حجّه اللَّه قد ظهر عند بیت اللَّه فاتّبعوه فإنّ الحقّ معه و فیه”

यही अल्लाह तआला के सूरह शुअरा, आयत 4  की ओर संकेत है:

“अगर हम चाहें तो आसमान से उनके लिए एक निशानी उतार दें, फिर उनकी गर्दनें उसके सामने झुकी हुई रह जाएँ।” إِنْ نَشَأْ نُنَزِّلْ عَلَیْهِمْ مِنَ السَّماءِ آیَهً فَظَلَّتْ أَعْناقُهُمْ لَها خاضِعِینَ(17)

2. दुआ-ए-ग़रीक़ पढ़ना

अब्दुल्लाह बिन सिनान इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फ़रमाया: जल्द ही तुम लोगों के सामने ऐसी स्थिति आएगी जिसमें तुम शंका और भ्रम में पड़ जाओगे और कोई स्पष्ट निशानी दिखाई नहीं देगी। उस समय कोई व्यक्ति उस शंका से नहीं बच सकेगा, सिवाय उसके जो दुआ-ए-ग़रीक़ पढ़े।

मैंने पूछा: दुआ-ए-ग़रीक़ क्या है?

इमाम ने फ़रमाया: तुम कहो:

“या अल्लाह, या रहमान, या रहीम, या मुक़ल्लिबल-क़ुलूब, सब्बित क़ल्बी अला दीनिक।یا اللَّه یا رحمان یا رحیم یا مقلّب القلوب و الأبصار ثبّت قلبی على دینک”

अर्थात: “ऐ अल्लाह! ऐ अत्यंत कृपालु! ऐ अत्यंत दयावान! ऐ दिलों को बदलने वाले! मेरे दिल को अपने धर्म पर स्थिर रख।”

मैंने भी कहा: “या अल्लाह, या रहमान, या रहीम, या मुक़ल्लिबल-क़ुलूबि वल-अबसार, सब्बित क़ल्बी अला दीनिक।یا اللَّه یا رحمان یا رحیم یا مقلّب القلوب و الأبصار ثبّت قلبی على دینک”

इमाम ने फ़रमाया: अल्लाह तआला दिलों और आँखों को बदलने वाला है, लेकिन तुम उसी तरह कहो जिस तरह मैंने कहा है:

“या मुक़ल्लिबल-क़ुलूब, सब्बित क़ल्बी अला दीनिक یا مقلّب القلوب ثبّت قلبی على دینک।”  (18)

3. दुआ पर लगातार अमल करना

ज़ुरारा बिन आयुन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से रिवायत करते हैं। इमाम ने ग़ैबत के समय के बारे में उन्हें बताया और फ़रमाया:

“ऐ ज़ुरारा! वह प्रतीक्षा में रहने वाला है। वह ऐसा व्यक्ति है जिसके जन्म के बारे में लोग संदेह करेंगे। कुछ लोग कहेंगे कि वह अभी अपनी माँ के गर्भ में है और पैदा नहीं हुआ। कुछ कहेंगे कि वह ग़ायब है। कुछ कहेंगे कि अभी उसका जन्म ही नहीं हुआ। और कुछ लोग कहेंगे कि वह अपने पिता की मृत्यु से दो वर्ष पहले पैदा हो चुका था।

यह सब इसलिए है कि अल्लाह तआला अपने शियों की परीक्षा लेना चाहता है। उस समय झूठ और असत्य का अनुसरण करने वाले लोग संदेह में पड़ जाएँगे।”

ज़ुरारा कहते हैं: मैंने पूछा, मैं आप पर क़ुर्बान जाऊँ! अगर मैं उस समय को पा लूँ तो मुझे क्या करना चाहिए?

इमाम ने फ़रमाया: “ऐ ज़ुरारा! यदि तुम उस समय को पा लो तो इस दुआ को लगातार पढ़ते रहना:

“अल्लाहुम्मा अर्रिफ़नी नफ़्सक, फ़इन्नका इन लम तुरर्रिफ़नी नफ़्सक लम आ’रिफ़ नबिय्यक। अल्लाहुम्मा अर्रिफ़नी रसूलक, फ़इन्नका इन लम तुरर्रिफ़नी रसूलक लम आ’रिफ़ हुज्जतक। अल्लाहुम्मा अर्रिफ़नी हुज्जतक, फ़इन्नका इन लम तुरर्रिफ़नी हुज्जतक ज़लल्तु अन दीनी।للّه مّ‏عرّفني نفسك، فإنّك إن لم تعرّفني نفسك لم أعرف نبيّك، اللّهمّ عرّفني رسولك فإنّك إن لم تعرّفني رسولك لم أعرف حجّتك، اللّهم عرّفني حجّتك فإنّك إن لم تعرّفني حجّتك ضللت عن ديني”

अर्थात: “ऐ अल्लाह! मुझे अपनी पहचान करा, क्योंकि यदि तू मुझे अपनी पहचान नहीं कराएगा तो मैं तेरे पैग़म्बर को नहीं पहचान सकूँगा। ऐ अल्लाह! मुझे अपने रसूल की पहचान करा, क्योंकि यदि तू मुझे अपने रसूल की पहचान नहीं कराएगा तो मैं तेरी हुज्जत को नहीं पहचान सकूँगा। ऐ अल्लाह! मुझे अपनी हुज्जत की पहचान करा, क्योंकि यदि तू मुझे अपनी हुज्जत की पहचान नहीं कराएगा तो मैं अपने धर्म से भटक जाऊँगा।” (19)

4. फ़रज की प्रतीक्षा

शेख़ मुफ़ीद ने अपनी किताब “मजालिस” में औफ़ बिन मालिक से रिवायत की है कि उन्होंने कहा:

एक दिन पैग़म्बर (स) ने फ़रमाया: “काश! मैं अपने भाइयों से मुलाक़ात कर पाता।”

अबू बक्र और उमर ने कहा: क्या हम आपके भाई नहीं हैं? हमने आप पर ईमान लाया और आपके साथ हिजरत भी की।

पैग़म्बर (स) ने फिर फ़रमाया:

“या लैतनी क़द लक़ीतु इख़्वानी।”

अर्थात: “काश! मैं अपने भाइयों से मिल पाता।”

फिर फ़रमाया:

“तुम मेरे सहाबी हो, लेकिन मेरे भाई वे लोग हैं जो तुम्हारे बाद आएँगे। वे मुझ पर ईमान लाएँगे, मुझसे प्रेम करेंगे, मेरी सहायता करेंगे और मेरी पुष्टि करेंगे, जबकि उन्होंने मुझे देखा भी नहीं होगा। काश! मैं अपने भाइयों से मिल पाता।” (20)

इसी तरह शेख़ सदूक़ ने अपनी किताब “अल-ख़िसाल” में एक रिवायत में, जिसमें अमश से इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) की रिवायत है, लिखा है कि इमाम ने फ़रमाया:

“इमामों का धर्म परहेज़गारी, पवित्रता और सदाचार है...” यहाँ तक कि उन्होंने फ़रमाया: “और फ़रज की प्रतीक्षा धैर्य और सहनशीलता के साथ करना है।” (21)

शैख़ुत्ताइफ़ा शेख़ तूसी ने अपनी किताब “अमाली” में सईद बिन मुस्लिम से, उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.) से, उन्होंने अपने पिता इमाम हुसैन (अ.) से और उन्होंने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) से रिवायत की है कि पैग़म्बर (स.) ने फ़रमाया:

“जो व्यक्ति अल्लाह की ओर से मिलने वाली थोड़ी-सी रोज़ी पर अल्लाह से राज़ी हो जाए, अल्लाह भी उसके थोड़े-से अमल से राज़ी हो जाता है और फ़रज की प्रतीक्षा इबादत है।”

एक व्यक्ति ने पैग़म्बर (स.) से पूछा: अल्लाह के निकट सबसे प्रिय अमल कौन-सा है?

उन्होंने फ़रमाया: “फ़रज की प्रतीक्षा।” (22)

 

स्रोत

  • इस्बातुल वसीया — अली बिन हुसैन मसऊदी, अनुवाद: मुहम्मद जवाद नजफ़ी, तेहरान, इस्लामिया, 1362 शम्सी।
  • अल एहतेजाज अला अहलिल लुजाज — अहमद बिन अली तबरसी, अनुवाद: अहमद ग़फ़्फ़ारी माज़ंदरानी, तेहरान, मुर्तज़वी, 1371 शम्सी।
  • उसूल ए काफ़ी — मुहम्मद बिन याक़ूब कुलैनी, अनुवाद: कमरई, क़ुम, तीसरा संस्करण, 1375 शम्सी।
  • अल इक़ाज़ मिनल हिज्अते बिल बुरहान अलल रजआ — मुहम्मद बिन हसन शैख़ हुर्र आमिली, अनुवाद: अहमद जन्नती, संशोधन: सैयद हाशिम रसूली महल्लाती, तेहरान, नवीद, 1362 शम्सी।
  • बिहारुल अनवार— मुहम्मद बाक़िर बिन मुहम्मद तक़ी मजलिसी, अनुवाद: अली दवानी, तेहरान, इस्लामिया, 1362 शम्सी।
  • तोहफ़ुल उक़ूल — इब्न शुअबा हर्रानी, हसन बिन अली, अनुवाद: सादिक़ हसनज़ादा, क़ुम, अलवी प्रकाशन, 1382 शम्सी।
  • कमालुद्दीन व तमामुन नेअमा — मुहम्मद बिन अली इब्न बाबवैयह (शैख़ सदूक़), अनुवाद: अली अकबर ग़फ़्फ़ारी और पहलवान, तेहरान, इस्लामिया, 1395 हिजरी क़मरी।
  • अल ग़ैबतो लिल नौमानी — इब्न अबी ज़ैनब नुमानी, अनुवाद: अली अकबर ग़फ़्फ़ारी, तेहरान, प्रकाशक: नश्रे सदूक़, बिना वर्ष।
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