हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शहादत के चालीस दिन बाद मदीना एक और अज़ीम सानिहे का गवाह बना। एक रिवायत के मुताबिक 8 रबी-उस-सानी 11 हिजरी को बज़अतुल्मुस्तफ़ा, हामी-अल-मुर्तज़ा, उम्मुल-अइम्मा-तिल-हुदा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत हुई। नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शहादत का ग़म अभी ताज़ा ही था कि अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम पर फ़िराक़-ए-ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का एक और सदमा टूट पड़ा।
हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शहादत के चालीस दिन बाद मदीना एक और अज़ीम सानिहे का गवाह बना। एक रिवायत के मुताबिक 8 रबी-उस-सानी 11 हिजरी को बज़अतुल्मुस्तफ़ा, हामी-अल-मुर्तज़ा, उम्मुल-अइम्मा-तिल-हुदा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत हुई। नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शहादत का ग़म अभी ताज़ा ही था कि अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम पर फ़िराक़-ए-ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का एक और सदमा टूट पड़ा।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शहादत के बाद हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की ज़िंदगी का आख़िरी दौर ग़म, बसीरत और हक़-गोई से भरपूर था। एक तरफ़ पिदर-ए-बुज़ुर्गवार की जुदाई, दूसरी तरफ़ उम्मत के बदलते हालात और अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के हुक़ूक़ से जुड़े पैदा होने वाले मसायल; ऐसे माहौल में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने ख़ामोशी इख़्तियार नहीं की, बल्कि अपना मौक़िफ़ वाज़ेह तौर पर बयान किया।
ख़ुत्बा-ए-फ़दक इसी फ़ातिमी एहतेजाज की सबसे नुमायाँ तारीख़ी निशानी है।
ये ख़ुत्बा सिर्फ़ फ़दक के मुतालबे तक महदूद नहीं था। इसमें तौहीद, नुबूवत, क़ुरआन, अहकाम-ए-शरीअत, अद्ल और अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के मक़ाम व अज़मत पर गुफ़्तगू की गई। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी में अपना मौक़िफ़ पेश करते हुए उम्मत को उसकी दीनी और इज्तेमाई ज़िम्मेदारियों की तरफ़ मुतवज्जेह किया।
फ़ातिमी एहतेजाज की अहमियत ये थी कि ज़ाती ग़म के बावजूद हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने अपनी इज्तेमाई ज़िम्मेदारी से किनाराकशी नहीं की। रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की बेटी ने अपने रंज को हक़ की गवाही में बदल दिया।
मगर ये हक़-गोई ऐसे दौर में थी जब हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ख़ुद शदीद हुज़्न व अलम से गुज़र रही थीं। रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की जुदाई ने उन्हें बे-क़रार कर दिया था। सिब्तैन-ए-रसूल, इमामैन हसनैन करीमैन और ज़ैनब व उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहिम अपनी माँ के क़रीब थे, मगर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की निगाहों में अपने बाबा की याद हर वक़्त ताज़ा थी।
चालीस दिन का ये फ़ासला कितना मुख़्तसर था! मदीना अभी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम के फ़िराक़ से संभला भी न था कि अमीरुल-मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम को अपनी शरीक-ए-हयात की जुदाई का सामना करना पड़ा। हसन अलैहिस्सलाम व हुसैन अलैहिस्सलाम ने माँ को खो दिया और ज़ैनब व उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहिमा ने वो सदमा देखा जिसकी बाज़गश्त उनकी पूरी ज़िंदगी में सुनाई देती रही।
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत के बाद रात में तदफ़ीन और क़ब्र के मख़्फ़ी रहने की रिवायात ने इस सानिहे को और ज़्यादा दर्दनाक बना दिया। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की क़ब्र-ए-मुबारक के मक़ाम के बारे में तारीख़ी रिवायात मुख़्तलिफ़ हैं, लेकिन उसका मख़्फ़ी रहना उनकी मज़लूमियत और एहतेजाज की एक अहम अलामत है।
ये ख़ामोश क़ब्र आज भी एक सवाल की तरह सामने है कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की वो बेटी, जिसके लिए नबी बे-इंतेहा एहतेराम का इज़हार करते थे, उसकी क़ब्र आज भी तारीख़ के लिए पोशीदा क्यों है?
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की ज़िंदगी को सिर्फ़ मसाइब व आलाम की दास्तान समझना भी उनके मक़ाम को महदूद करना है। वो इबादत-गुज़ार थीं, मगर इबादत ने उन्हें इज्तेमाई शुऊर और ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल नहीं किया; वो पर्दा-दार थीं, मगर ज़रूरत के वक़्त हक़-ए-रिसालत की गवाही के लिए मैदान-ए-मुबाहला में आईं और हक़-ए-विलायत की गवाही के लिए मस्जिद में तशरीफ़ लाईं; वो ग़म-ज़दा थीं, मगर उनका ग़म हक़ के दिफ़ा की राह में रुकावट नहीं बना।
यही फ़ातिमी किरदार आगे चलकर हसनी सब्र, हुसैनी क़ियाम और ज़ैनबी इस्तिक़ामत की शक्ल में नज़र आता है।
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने अपनी मुख़्तसर हयात में ये दर्स दिया कि हक़ की हिफ़ाज़त सिर्फ़ ताक़त से नहीं, बल्कि बसीरत, दलील, किरदार और इस्तिक़ामत से भी होती है।
उनकी शहादत का सोग सिर्फ़ माज़ी का नौहा नहीं, बल्कि हक़ व बातिल, अद्ल व ज़ुल्म और वफ़ादारी व बेवफ़ाई के बीच इंसानी व दीनी ज़िम्मेदारी की याद-दहानी भी है।
अरबईन-ए-नबवी के इस फ़ातिमी अलमिये में एक बेटी अपने बाबा के फ़िराक़ के बाद उनसे जा मिली; मगर अपने पीछे ऐसा पैग़ाम छोड़ गई जो सदियों बाद भी अहल-ए-हक़ के दिलों को बेदार करता है।
सलाम हो उस ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा पर, जिनकी मज़लूमियत आज भी दिलों को अश्क-बार करती है, जिनकी बसीरत अहल-ए-ईमान को फ़िक्र अता करती है और जिनकी हक़-गोई हर दौर के लिए एहतेजाज का इस्तेआरा बन चुकी है।
अस्सलामो अलैक़ि या फ़ातिमत-ज़्ज़हरा, या बिन्त रसूलिल्लाह, या ज़ौजत वली अल्लाह, या उम्मल-हसन वल-हुसैन (सलामुल्लाह अलैहिम)













