अहले सुन्नत की निगाह में इमाम अली (अ) की फ़िक़ही सीरत

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अहले सुन्नत की निगाह में इमाम अली (अ) की फ़िक़ही सीरत

हज़रत अली (अ) ऐसी शख़्सीयत हैं कि जिन के नज़रियात उलूमे एलाही के मुख्तलिफ़ अबवाब मे रौशन हैं।

अहले सुन्नत के फ़िक़ही मनाबे मे भी हज़रत अली (अ) के इरशादात और आपकी सीरत एक फ़िकही बुनियाद शुमार किए जाते हैँ। आने वाली मिसाले उन्ही के नमूने हैँ।:

1- दसूकी का क़ौल है कि: हज़रत अली (अ) अज़ान मे जुम्ला “हय्या अला ख़ैरिल अमल” को “हय्या अलल फलाह” के बाद फरमाते थे-

2- नवी ने रोज़े के सिलसिले मे हज़रत अली (अ) की सीरत को यूँ बयान किया है कि आप रोज़ा रखने और इफ्तार करने के सिलसिले मे रोयते हिलाल को वसीला करार देते थे-

3- शरबीनी का क़ौल है: हज़रत अली अ ने हम्ल की क़लील तरीन मुद्दत छह माह बयान की है-

जैसा कि कहते हैं: हज़रत अली अ ने कुर्आनी तफक्कुरात और इस्लामी नज़रियात के ज़ेरे नज़र मुरतद को तौबा का ख़ास वक्त देते थे ताकि वो दायर ए इस्लाम मे पलट आए।

मुकद्दमा

हुज़ूरे सरवरे काएनात (स) का बुलन्द तरीन क़ौल “अना मदीनतुल इल्म व अलीयुन बाबोहा” आलमे इस्लाम मे एक रब्बानी शख्सीयत के मक़ाम को बयान करता है हज़रत अली (अ) ऐसी शख्सीयत थे जिन की तहकीक उलूमे एलाही के मुख्तलिफ अब्वाब मे जल्वागर है हज़रत अली (अ) उलूमे आसमानी व रब्बानी मे यगाना व बेमिसाल थे- हज़रत अली (अ) से इत्तेसाल और आप से तोशए इल्म का पाना ओरफा का एक इफ्तेख़ार है फ़िक़हीयों का इफ्तेख़ार आपकी सीरत से फ़िक़ही मोज़ूआत के अख्ज़ करने मे है यही नही बल्कि इल्म के मुतालाशी तमाम अफ़राद इस आलिमे रब्बानी के हुज़ूर मे कस्बे फैज़ करते रहे हैं।

इस मक़ाले मे हज़रत अली (अ) के इल्मी पहलूओं मे से एक पहलू की तरफ़ कि जो इमाम अली (अ) की फ़िक़ही सीरत है तवज्जो दी गई है सीरते अल्वी के बयान के सिलसिले मे इस मक़ाले मे फ़िक्हे शीया की जानिब तवज्जो नही दी गई है बल्कि तन्हा अहले सुन्नत की फ़िक़ही किताबो मे इमाम अली (अ) के मकामो मन्ज़िलत को पेशे नज़र क़रार दिया गया है-

इस नुक्ते को बयान करने का मक़सद ये है कि इमाम अली (अ) न तन्हा शीयों के दरमियान बा उन्वाने इमाम या मुक्तदा या फिर उलूमे आँसमानी के दरयाफ्त करने के मरकज़ की हैसियत से पहचाँने जाते हैं। बल्कि अहले सुन्नत के फ़िक़ही मनाबे मे भी आप की सीरत और आपका इरशाद अहले सुन्नत के फ़िक़ही बुनियादों मे से एक बुनियाद शुमार किया जाता है- चूँकि कलामे अली (अ) और सीरते अली अ फ़िक़ही मनाबे मे बहुत ज़्यादा हैं। इसलिए हम यहाँ फक़त चन्द नमूनों की जानिब इशारा करेंगे और अबवाबे फ़िक़ही की तरतीब के लिहाज़ से अहले सुन्नत के नज़रियात को मद्दे नज़र रखते हुए इमाम अली (अ) के फ़िक़ही नज़रियात के मसादीक़ को बयान करेंगे-

1- सीरते हज़रत अली )अ( अज़ान मे

शीया और अहले सुन्नत के दरमियान फ़िकही मबाहिस मे से एक बहेस अज़ान के अज्ज़ा और जुम्लात के बारे मे है इस सिलसिले मे मुख्तलिफ बहसें पाई जाती हैं। हम यहाँ सिर्फ एक बहेस को बयान कर रहें हैं।:

दसूकी ने अपने गरानकद्र फ़िक़ही हाशिए मे फोक़हा ए अहले सुन्नत मे से किसी एक के क़ौल को नक्ल किया है कि: “पहली बार सुल्तान यूसुफ सलाहुद्दीन अय्यूबी के ज़माने मे ये हुक्म नाफिज़ किया गया था कि” मिस्र और शाम मे अज़ाने सुब्ह से पहले “अस्सलामो अला रसूलिल्लाह” कहा जाना चाहिए-ये अमल 777 तक जारी रहा और सलाहुद्दीन बरसी के हुक्म के मुताबिक अज़ान मे “अस्सलातो वस्सलामो अलैका या रसूल अल्लाह” कहा जाने लगा नीज़ सुल्तान मन्सूर हाजी बिन अशरफ के ज़माने मे ये हुक्म था कि अज़ान के बाद पैगम्बरे इस्लाम (स) पर दुरूद और सल्वात भेजी जाए ये अमल 791 मेसूरत पज़ीर हुआ और इसी तरह जारी रहा, लेकिन दसूकी फरमाते हैं। हज़रत अली अ ने जुम्लए “हय्या अला ख़ैरिल अमल” को“हय्या अलल फलाह” के बाद अज़ान मे इज़ाफा किया और ये मस्अला आज इस ज़माने मे भी शीया एतेदाकात का जुज़ है- ( दसूकी, भाग 1 पेज 193 )

अलबत्ता शीयो का अपने ज़माने के आइम्मा अ की रवायत की पैरवी मे इस बात पर इत्तेफाक है कि जुम्लए हय्या अला ख़ैरिल अमल जुज़े अज़ान है और बेलाल भी अज़ाने सुब्ह मे इस जुम्ले को कहते थे- नीज़ बहुत से गिरोहे अस्हाब भी ये जुम्ला अदा किया करते थे-

सैय्यद मुर्तज़ा फरमाते हैं। अहले सुन्नत ने रवायत की है कि हय्या अला ख़ैरिल अमल पैग्मबरे अकरम (स) की ज़िन्दगी मे भी कहा जाता था और ये दावा हुआ है कि ये जुम्ला नस्ख़ कर दिया गया, हाँ जिस ने भी दावाए नस्ख़ किया है उसे चाहिए के दलील लाए जब कि इस सिलसिले मे कोई दलील वुजूद नही रखती- ( सैय्यद मुर्तज़ा 1451 हदीस, पेज 137 )

इब्ने अरबी का क़ौल है “हय्या अला ख़ैरिल अमल” रसूले खुदा स के ज़माने मे ऐसा ही था और रवायत भी है कि जँगे ख़न्दक मे लोग ख़न्दक खोदने मे मश्गूल थे के नमाज़ का वक्त हो गया- मुनादी ने अहले ख़न्दक को आवाज़ लगाई“हय्या अला ख़ैरिल अमल” पस जिस ने भी इस जुम्ले का अज़ान का जुज़ करार दिया है उस ने ख़ता नही की बल्कि अगर ये ख्बर सही है उस ने उनकी इक्तेदा की है या फिर सुन्नते हस्ना को काएम किया है- ( इब्ने अरबी 1987 ई0, भाग 1 पेज 400 )

बहरहाल जैसा कि मुलाहिज़ा हुआ कि: अज़ान मे जुम्लए “हय्या अला ख़ैरिल अमल”का इज़ाफा इमाम अली (अ) की सीरतों मे से एक सीरत है।

2. वज़ू मे इमाम अली (अ) की सीरत

अहले सुन्नत की फ़िकही किताबों मे वज़ू की बहेस मे एक मस्ला जूते या इन जैसी चीज़ो पर मसा के जवाज़ या अदमे जवाज़ के सिलसिले मे काबिले तवज्जो है-

शरबीनी अपनी फ़िकही किताब मे नक्ल करते हैं। कि हज़रत अली (अ) ने उन के जवाब मे जो ये कहते थे कि “हम ने अपने इज्तिहाद के ज़रिए ये नुक्ता अख्ज़ किया है कि जूते या इन जैसी चीज़ो पर मसा किया जा सकता है” फरमाया: अगर मुमकिन होता के दीने इस्लाम शख्सी राए नज़रिए व सलीके के ज़रीए बयान की जाए तो तबीयत इस बात का तकाज़ा करती कि धोने के लिए इन्सान जूते के तल्वे धोए न कि जूते को धोए- ( शरबीनी 1377,ज/1 स/67 )

शरबीनी इमाम अली अ के इस रोये और क़ौल को नक्ल करने के ज़रिए शरीअते इस्लाम मे शख्सी राए और ज़ाती तरीके को काबिले कुबूल अम्र करार देते हैं।

3- इमाम अली (अ) की सीरत नमाज़ मे

नोवी पैग्मबर अकरम स की इस हदीस को नक्ल करने के बाद कि:

 

"لا صلوة مة لمن لم یقرأ بأم القرآن"

 

“अगर कोई शख्स नमाज़ को सूरह हम्द के साथ न पढे उसकी नमाज़ ही नही है”

इस सिलसिले मे इमाम अली (अ) की सीरत को बयान करते हुए फरमाते हैं।:

इमाम अली (अ) नमाज़ की शुरू की दो रिक्अतों मे सूरह हम्द की केराअत करते थे और आखिर की दो रिक्अतों मे तस्बीहाते अरबआ को पढते थे- ( नोवी, भाग 3 पेज 362 )

इसी तरह शरवानी नमाज़ के ख़ुशू के सिलसिले मे आयत :

 

"قد افلح المومنون الذین هم فی صلاتهم خاشعون"

 

“वो मोमेनीन ब तहकीक कामयाब हैं जो अपनी नमाज़ मे ख़ाशे हैं। से इस्तेनाद करते हुए फरमाते हैं कि इमाम अली (अ) एक मुफस्सिरे कुर्आन की हैसीयत से इस आए मे लफ्ज़े ख़ाशेऊन की तफ्सीर दिल के नर्म होने, बदन के तमाम आज़ा व जवारेह के हरकते इज़ाफी से महफूज़ रहने और ख़ालिके काएनात की तरफ पूरी तरह मुतावज्जे रहने से करते हैं। (शवानी 1985 ई0, भाग 2 पेज 101)

4- इमाम अली (अ) की सीरत रोज़े मे

नवी रोज़े मे इमाम अली (अ) की सीरत के बयान मे फ़रमाते हैँ:

इमाम अली (अ) माहे रमज़ान के रोज़े का आगाज़ चाँद देख कर करते थे- और चाँद ना देखने की सूरत मे माहे शाबान के मुकम्मल होने के बाद माहे रमज़ान का आगाज़ करते थे. वो इस नक्ल के ज़रीए सीरते अलवी की ताईद करते हैं कि “वलीद बिन उत्बा का बयान है कि मैने हज़रत अली (अ) के ज़माने मे एक बार 28 दिन रोज़ा रखा पस हज़रत ने मुझे हुक्म दिया कि मै एक रोज़े की कज़ा करूं” और खतीब ने एक बयान मे दावा कीया है कि इस साल माहे रमज़ान 29 दिन का था- (नोवी, भाग 6 पेज 421)

5- हज़रत अली (अ) की सीरत जेहाद मे

जेहाद की बहसों मे पेश आने वाले मसाएल मे से एक मसला उन लोगों से क़ेताल का है जो हुकूमते इस्लामी पर खुरूज करते हैं। हेजावी जो किताब “अलकेना” के मोअल्लिफ हैं इन लोगों से केताल के सिलसिले मे जो लोग हुदूदे एलाही से तजावुज़ करते हैं और इमामो हुकूमते इस्लामी पर खुरूज करते हैँ या वो लोग जो बागीं किये जाते हैं- लिखते हैं:

“बगेया” लफ्ज़ ज़ुल्म के मफहूम मे है जिस के माने हद से तजावुज़ के हैं क्यूँकि लोग हुकूमते इस्लामी पर खुरूज करते हैं उन्होने हक से उदूल किया है- इस कज़िए मे बुनियादो अस्ल एक ऐसी आयत को करार दिया है जिस मे ख़ालिके काएनात फरमाता है:

 

و ان طاءفتان من المومنین اقتتلوا فاصلحوا بینھما فان بغت احداھما علی الاخری فقاتلوا التی تبغی حتی تفیءالی امر اللھ فان فاءت فاصلحوابینھما بالعدل و اقسطوا ان اللھ یحب المقسطین۔

 

“अगर मोमेनान के दो गिरोहों के दरमियान आपस मे मुकातिला हो जाए तो दोनो के दरमियान सुलह कर दो, लेकिन अगर एक गिरोह दूसरे ज़्यादती करे तो ज़्यादती करने वाले गिरोह के साथ जिहाद करो” (हुजरात/9)

हेजावी इस सिलसिले मे फरमाते हैं कुर्आनी असास की बुनियाद पर जिस दूसरे गिरोह के साथ जिहाद का हुक्म दिया गया है ये वही मुस्लमान हैं जो इमाम के मुखालिफ हैं, इस आयत की बुनियाद पर इमाम अली (अ)ने जन्गे सिफ्फीन और नहरवान मे शिरकत की और उन लोगों से जिहाद किया जो हुकूमते एलाही के खिलाफ कयाम कर रहे थे- ( हेजावी, भाग 2 पेज 202)

जैसा की बयान हुआ ये फ़िक्हे अहले सुन्नत हज़रत अली (अ) अहले कुफ्र के साथ जिहाद के इस रवय्ये को फ़िकही और हुकूमती रवय्या शुमार करते हैं और आयते कुर्आन के ज़रिए इसे मुस्तनद करार देते हुए ये नतीजा निकालते हैं कि हज़रत अली (अ) को इस गिरोह के साथ जो हुकूमते एलाही से तज़ाद और तअर्रुज़ रखता है जिहाद करना ही चाहिए था।

6- हज़रत अली (अ) की सीरत क़ज़ावत मे

किताबे क़ज़ा की बहसों मे से एक बहस ये भी है कि क़ाज़ी को चाहिए कि तरफैन दावा की निसबत मसावात से काम ले और एक को दूसरे पर तरजीह न दे- लेकिन किताबे “फ़तहुल वहाब” मे बयान हुआ है कि काज़ी इस सूरत मे कि तरफैन मे एक काफिर और दूसरा मुस्लमान हो तो मुस्लमान को बेहतर मकाम पर बैठा सकता है-

मोअल्लिफे किताब ने अपने इस फत्वे को हज़रत अली (अ) के फेल और रवय्ये से मुस्तनद किया है कि जब हज़रत अली (अ) का एक यहूदी के साथ दावा हुआ और आप काज़ी के पास गए तो शुरैहे काज़ी के पास बैठ कर फरमाया कि अगर मेरा मद्दे मुकाबिल मुस्लमान होता तो मै भी इस के पहलू मे और काज़ी के रूबरू बैठता- ( अन्सारी,1418 ई0 भाग 2 पेज 371 )

इसी तरह मालिक और अहमद से रवायत हुई है कि ग़ुलामों के जराएम के सिलसिले मे हज़रत अली (अ) की एक खास सीरत रही है मिसाल के तौर पर एक बार ग़ुलाम और कनीज़ एक ख़ास गुनाह के मुरतकिब हो गए हज़रत अली (अ) ने दोनो को पचास पचास कोडे मारने का हुक्म दिया और फरमाया कि अगर गुलाम और कनीज़ ऐसे गुनाह के मुरतकिब हों तो मीज़ान के एतेबार से कोडे मारने मे फ़र्क़ नही होना चाहिए।

अहले सुन्नत ने भी हज़रत अली (अ) की सीरत के मुताबिक इसी तरह का फत्वा दिया है-( हेजावी, पीशीन पेज 180 )

7- हज़रत अली (अ) की सीरत हम्ल की कम तरीन मुद्दत के बयान मे

फ़िक़ही मबहिस मे एक बहेस ये भी है कि कितनी कम मुद्दत मे मुम्किन है कि एक बच्चा दुनियाँ मे आए और उसकी मेकदार कितने दिनो की होगी इस सिलसिले मे फोकहाए शीया और अहले सुन्नत के अकवाल अलग हैं फोक़हा ए अहले सुन्नत मे शरबीनी इस सिलसिले मे हज़रत अली (अ) के इस्तिम्बात की तरफ इशारा करते हैं कि वो इस बयान के बाद कि हम्ल कि अकल मुद्दत उस ज़माने को कहा जाता है जिस मे मर्द और ज़न की मुशतरक इम्काने ज़िन्दगी का इम्कान मौजूद हो और उस काएदे की तरफ इशारा है कि निसबते इम्काने ज़िन्दगी के वसीले से साबित होता है- फ़रमाते हैं हज़रत अली (अ) के इस्तिम्बाते कुर्आन के नतीजे मे हम्ल की सब से मुख्तसर मुद्दत छह माह है-

शरबीनी हज़रत अली (अ) से नक्ल करते हैं कि खुदा वन्दे आलम ने कुर्आने मजीद मे फरमाया:

 

حملھ و فصالھ ثلاثون شھرا

 

“औरत के हम्ल और बच्चे के माँसे जुदा होने का मज्मुई मुद्दत तीस माह है”-

जैसा कि दूसरे मकाम पर इरशाद होता है فصالھ فی عامین  बच्चो को चाहिए कि कम अज़ कम दो साल की मुद्दत तक अपनी माँ का दूध पीये तीस महीने मे से चौबीस महीने कम करने के नतीजे मे छह माह बाकी बचते हैँ इसी बेना पर हज़रत अली (अ)के नज़रिए के मुताबिक हम्ल की कमतरीन मुद्दत छह माह होती है- ( शरबीनी, गुज़श्ता हवाला, भाग 3 पेज 338 )

8- गुमशुदा शौहर के बारे मे हज़रत अली (अ) की सीरत

फिक की एक दूसरी बहेस गुमशुदा शौहर के सिलसिले मे है और वो ये है कि अगर कोई शख्स तूलानी मुद्दत तक गाएब हो जाए और उसका कोई पता न हो तो उसकी ज़ौजा की क्या सूरत होगी और वो किस मुद्दत तक सब्र करेगी- शरबीनी ने अपनी किताब “मुग्नियुल मोहताज” मे मोलाए काएनात के नज़रए की जानिब इशारा करते हुए फरमाया कि अगर कोई शख्स गाएब हो जाए और उसका कोई पता न हो तो उसकी ज़ौजा उस वक्त तक शादी नही कर सकती जब तक कि शौहर की मौत का यकीन पैदा न हो जाए- जैसा कि इमाम शाफेई ने हज़रत अली (अ) से नक्ल किया है कि आप ने फरमाया: गुमशुदा शौहर की ज़ौजा अगर उस सख्ती मे मुबतिला हो जाए कि उसका शौहर गुम हो जाए तो उसके लिए सब्र के अलावा कोई चारा नही है- वो उस वक्त तक शादी नही कर सकती जब तक शौहर के मरने की खबर उस तक न पहुँच जाए या ये कि उसका शौहर पलट आए-

शरबीनी इस क़ौल की वज़ाहत मे कहते हैँ: क्योकि अस्ल हयात पर बाकी रहना है और जब एक शख्स गाएब हुआ तो अस्ल ये है कि वो अभी ज़िन्दा है और यकीन से मुराद वही रुजहान है इस सूरत मे कि अपने शौहर की मौत की ख़बर का रुजहान उसे हासिल हो और ये दो आदिल की गवाही से हासिल हो और साथ ही उसे अपने शौहर की मौत की शोहरत हासिल हुई हो- ( शरबीनी, गुज़श्ता हवाला, स/397 )

9- हद्दे शराब नोशी के सिलसिले मे आपकी (अ) की सीरत

किताबे हुदूद की बहसों मे से एक शराब नोशी की हुदूद कोडे लगाने के सिलसिले मे है- अनस बिन मालिक से नक्ल है कि रसूले इस्लाम उस शख्स को जो शराब नोशी का मुरतकिब हुआ था कोडे के बजाए लकडी या छडी वगैरा से चालीस ज़र्ब मारते थे- हज़रत अबू बक्र के ज़माने मे भी शराबी को चालीस कोडे मारे जाते थे, हज़रत उमर के ज़माने मे शराब पीने वाले को कोडे मारने के सिलसिले मे हज़रत अली (अ) से सवाल किया गया, आप (अ) ने फरमाया:

शराब पीने वाले की हद का मीज़ान 80 कोडे हैं हज़रत की दलील ये थी कि वो शख्स जो शराब पीता है मस्त हो जाता है मस्त इन्सान हिज़यान का मुरतकिब होता है और हिज़यान गोई के वक्त वो लोगों को नारवाँ और ना काबिले बरदाशत निसबतें लगाता है और लोगों को बुरी निसबतें देना इफ्तेरा का मूजिब है और चूँकि इफ्तेरा की हद की मीज़ान 80 कोडे हैं लिहाज़ा शराब नोश के सिलसिले मे भी मीज़ाने हद 80 कोड़े ही होंगी- ( अन्सारी, गुज़श्ता हवाला, पेज 288 )

जैसा कि देखा गया कि शराब नोशी की बहस मे अस्रे पैग्मबर (स) से लेकर उमर के ज़माने तक एक तारीखी दौर पाया जाता है- हज़रत अली (अ) ने इस कानून को मुनज़्ज़म करने के उन्वान से 80 कोडे की सज़ा को मोअय्यन किया है और आज भी इस सिलसिले मे हज़रत अली (अ) की फ़िकही सीरत पर अमल हो रहा है।

शरबीनी भी इस सिलसिले मे हज़रत अली (अ) की सीरत के बारे मे दूसरा कज़या यूं बयान करते हैं कि हज़रत अली (अ) ने उस बूढे को जिस ने माहे रमज़ान मे शराब पी ली थी 80 कोडे मारे फिर दूसरे दिन कोडे की 20 ज़रबें मज़ीद मांरी और फरमाया मे ने तुझे 80 कोडे इसलिए मारे कि तूने शराब पी थी और आज 20 कोडे मज़ीद इसलिए मारे के तूने खुदा वन्दे आलम की शान मे जसारत की और माहे रमज़ान की हुरमत को पामाल किय

हज़रत अली (अ) का ये अमल भी अहले सुन्नत के फत्वे की बुनियाद क़रार दिया गया है-

अहले सुन्नत कोड़े मारने की कैफियत के बारे मे भी हज़रत अली (अ) के इस क़ौल की पैरवी करते हैं कि कोड़े की ज़र्ब बदन के मुख्तलिफ आज़ा पर मारी जाए।

10- हद्दे मुरतद के सिलसिले मे हज़रत अली (अ) की सीरत

अहले सुन्नत की इबारत मे इरतेदाद की निस्बत वारिद हुआ है कि मुरतद वो है जो दीने इस्लाम से पलट जाए वो मर्द हो या औरत उस से इस बात का मुतालिबा किया जाएगा कि वो तौबा करे (हकीकत मे ये तौबा उसके हुक्मे कत्ल से पहले वाके होगी क्योंकि मुरतद शख्स की हद फक्त कत्ल है) क्यूंकि अहले सुन्नत की ताबीरात मे आया है कि इन्सान इस्लाम के ज़रिए मोहतरम हुआ था अगरचे वो अभी खुद को गैर मुस्लमान कह रहा है फिर भी ये एहतेराम इस्लाम उसके हक मे बाकी है- लिहाज़ा उस से तौबे का मुतालिबा किया जाएगा अगर तौबा करे तो वो आज़ाद है-

लेकिन वो बहेस जिसे अहले सुन्नत ने इस बारे मे पेश किया है कि मुरतद को तौबा के लिए कितनी मुद्दत तक इख्तियार दिया जाएगा हेजावी हज़रत उमर के ज़माने मे राएज रविश की जानिब इशारा करते हुए फरमाते हैं कि तीन रोज़ का इख्तियार दिया जाएगा नीज़ ये भी फरमाते हैं कि इमाम मालिक ने हज़रत उमर की रविश को मद्दे नज़र रखते हुए ये फत्वा दिया कि अगर मुरतद तीन दिन की मुद्दत के बाद तौबा न करे तो उसे कत्ल कर दिया जाए।

हेजावी ने इस रविश को ज़ईफ करार देते हुए हज़रत अली (अ) से नक्ल किया है कि हज़रत अली (अ) ने हुक्म दिया है कि मुरतद को तौबा के लिए दो माह का वक्त दिया जाएगा अगर वो तौबा करले तो उसकी तौबा कबूल करते हुए उसके इस्लाम को कबूल करेंगें और उसे आज़ाद कर देंगें ताकि वो अपनी ज़िन्दगी गूज़ारे- हज़रत अली (अ) से मनकूल हेजावी के इस क़ौल की बुनियाद पर अगर मुरतद दोबारा अपने इस बुरे अमल की तकरार करे तो उस से फिर तौबा का मुतालिबा किया जाएगा और उसे दो माह का मौका दिया जाएगा ताकि वो अपने अकीदे से दस्त बरदार हो जाए- (हेजावी, गुज़श्ता हवाला, भाग 2 पेज 206)

कारेईन कराम जैसा कि आपने मुलाहिज़ा फरमाया कि हेजावी के नक्ल के मुताबिक हज़रत अली (अ) ने दूसरों की रविश के बरख़िलाफ मुरतद को तौबा के लिए दो माह का इख्तियार दिया है आपने इस रविश को कुर्आन मजीद की इस आए मुबारिका से मुस्तनद किया है:

 

( قل للذین کفروا ان ینتھوا یغفرلھم ما قد سلف )

 

ऐ पैग्मबर(स) काफिरों से कह दीजए कि अगर वो अपनी कुफ्र आमेज़ बातें तर्क कर दें तो खुदा उनको मांफ कर देगा और उनके गुज़श्ता आमाल को दर गुज़र कर देगा- (इन्फाल,28)

11- क़ेसास के सिलसिले मे हज़रत अली (अ) की सीरत

क़ेसास के बारे मेफ़िकही बहसों मे से एक बहस क़ेसास का जुर्म के बराबर होना है इस माने मे कि अगर कोई शख्स कीसी जुर्म का मुर्तकिब हो और मुकाबिल को कोई ज़रर पहुचे तो केसास इस सूरत मे होना चाहिए कि जितना नुक़सान मुन्जी अलैह को पहुँचा है उतना ही नुक़सान मुजरिम को भी पहुँचाया जाए- अलबत्ता ये अम्र बहुत मुश्किल होता है इसी लिए बहुत मवाके पर केसास नकदी जुर्माने मे तब्दील हो जाता है- लेकिन गुज़श्ता ज़माने मे जहाँ तक मुम्किन हो सकता था केसास ही की कोशिश की जाती थी-

दसूकी इस ज़िम्न मे फरमाते हैं कि अहदे उस्मान मे एक शख्स ने दूसरे शख्स को ऐसी ज़र्ब लगाई जिसकी वजह से उसकी एक आँख की बीनाई खत्म हो गई लेकिन उसकी आँख को मामूल के मुताबिक कोई और नुकसान नही हुआ- हज़रत उस्मान ने ख़लीफ ए मुस्लेमीन होने की हैसीयत से केसास का हुक्म तो दे दिया लेकिन ये मुश्किल दरपेश आई कि आया मुजरिम की आँख को नुकसान पहुँचाया जाए या फिर कोई दूसरा तरीका इख्तियार किया जाए- मुश्किल को हल्लाले मुश्किलात हज़रत अली (अ) के सामने पेश किया गया तो आप ने फरमाया एक आईना लाया जाए और एक कपडा मुजरिम की आँख पर डाल कर सूरज को आईने पर इस तरह चमकाए कि सूरज का अक्स मुजरिम की आँख पर पडे इस तरह उसकी आँख की बीनाई तो चली जाएगी मगर आँख अपने मामूल पर बाकी रहेगी- ( दसूकी, गुज़शता हवाला, पेज 254 )

नतीजा

जो चीज़ गुज़श्ता तमाम बहसों से हासिल होती है वो ये है कि हज़रत अली (अ) एक ऐसी शख्सीयत के उनवान से रब्बानी उलूम से बहरामन्द और फिक के मुख्तलिफ अबवाब मे एक खास सीरत के मालिक हैं और ये सीरत अहले सुन्नत के नज़दीक भी फ़िकही मनाबे के उनवान से तस्लीम की जाती है-

हवाले

1- कुरईन करीम

2- इब्ने अरबी मोहयुद्दीन, अलफोतुहातुल मिया

3- अन्सारी, ज़करया, फत्हुल वहाब, दारुल किताब अलइल्मीया, बैरूत 1418 ह0

4- हेजावी, मूसा, अलइक्ना, दारूल मारफा, बैरूत,

5- दसूकी, मुहम्मद बिन उरफा, हाशिया अस्सूकी अलश्शरहिल कबीर, दारूल अहया अलकुतुबिल अरबीया, बैरूत

6- सैय्यद मुर्तज़ा, इल्मुल होदा, अलइन्तेसार, जामिआ मुदर्रेसीन, कुम 1415 ह0

7- शरबीनी, शम्सुद्दीन मुहम्मद, अलइक्ना फी हल्लिल अल्फाज़ अबी शुजा, दारू मारफा, बैरूत

8- शरबीनी, शम्सुद्दीन मुहम्मद, मुगनियुल मोहताज, दारे अहया अत्तोरासुल अरबी, बैरूत 1377

9- शरवानी, अब्दुल हमीद, हवाशियुश शरवानी, दारे अहया अत्तोरासुल अरबी, बैरूत 1985 ई0

10- नोवी, मोहयुद्दीन, अलमजमू फी शरहिल मोहज़्ज़ब, दारूल फिक्र, बैरूत

 

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