रविवार, 12 जून 2016 06:46

धार्मिक नेतृत्व और इमाम ख़ुमैनी का दृष्टिकोण

Rate this item
(0 votes)
धार्मिक नेतृत्व और इमाम ख़ुमैनी का दृष्टिकोण

ईरान के इतिहास में जून महीने का पहला सप्ताह और ईरानी कैलेंडर के तीसरे महीने ख़ुरदाद का मध्य भाग दो महत्वपूर्ण घटनाओं की याद ताज़ा करता है।

ईरान के इतिहास में जून महीने का पहला सप्ताह और ईरानी कैलेंडर के तीसरे महीने ख़ुरदाद का मध्य भाग दो महत्वपूर्ण घटनाओं की याद ताज़ा करता है। 3 जून 1989 को ईरान की इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था के रचनाकार और इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी का स्वर्गवास हुआ था जबकि 4 जून 1963 के लिए इमाम ख़ुमैनी ने तानाशाही पहलवी शासन के विरुद्ध अपना आंदोलन शुरू किया था।

 

 वह आंदोलन जो 4 जून 1963 को शुरू हुआ, 15 साल बाद सन 1979 में ढाई हज़ार साल से चली आ रही शाही व्यवस्था के पतन पर समाप्त हुआ। इमाम ख़ुमैनी का आंदोलन ईरान और इस्लामी के इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण अध्याय है। इमाम ख़ुमैनी इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक होने के साथ ही एक प्रतिष्ठित धर्मगुरू भी थे अतः जनता और धर्मगुरुओं के बीच उनका बड़ा सम्मान था। इसी वजह से मोहम्मद रज़ा पहलवी की शाही सरकार के विरुद्ध उनके आंदोलन को भरपूर समर्थन मिला ईरान में इस्लामी क्रान्ति के सफल होने से पहले दूसरे भी अनेक देशों में विदेशी साम्राज्य और आंतरिक अत्याचारी शासनों के विरुद्ध कई क्रान्तियां आ चुकी थीं। इनमें अधिकांश क्रान्ति सोशलिस्ट नारों के साथ सफल हुईं। इन क्रान्तियों के नेता मार्कसिस्ट विचारधारा अपनाकर स्राज्यवाद विरोधी आंदोलन चलाते थे लेकिन यदि उनका आंदोलन सफल होता और वह सत्ता प्राप्त कर लेते तो ख़ुद भी अत्याचारी तानाशाह बन जाते थे। एसे समय जब दुनिया साम्राज्यवाद और मार्क्सवाद के बीच बंटी हुई थी, इमाम ख़ुमैनी ने इस्लाम धर्म को केन्द्र बनाकर दोनों विचारधारओं के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। इस प्रकार इमाम ख़ुमैनी ने साम्राज्यवाद और मार्क्सवाद का मुक़ाबला करने के लिए एक नया रास्ता बनाया।

 

ईरान की इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने इमाम ख़ुमैनी की बीसवीं बर्सी के अवसर पर अपने एक संदेश में कहा था कि इमाम ख़ुमैनी ने शुद्ध इस्लाम धर्म की शिक्षाओं को आधार बनाकर और जनता की ईमान की शक्ति के सहारे और अपने साहस, निष्ठा तथा ईश्वर पर अपार भरोसे के माध्यम से अत्यंत कठिन व प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करने का रास्ता खोजा, उसपर आगे बढ़े तथा पूरे धैर्य से क़दम बढ़ाते हुए लोगों के मन मस्तिष्क को कटु तथ्यों तथा उनसे निपटने के तरीक़ों से परिचित कराया। ईरान की जनता ने शुरू से ही इमाम ख़ुमैनी की आवाज़ पर अपनी आवाज़ बुलंद की तथा सत्य और ज्ञान से भरी उनकी बातों को ध्यान से सुना और दिल में उतारा।

 

  लोगों ने इस्लाम से गहरे प्रेम और ईमान की शक्ति से त्याग और बलिदान की अविस्मरणीय कहानियां लिख दीं। इस बीच इमाम ख़ुमैनी ने जनता का मार्गदर्शन करने, सच्चाई सामने लाने के साथ ही और करोड़ों की संख्या में लोगों को कुछ कर गुज़रने के लिए मैदान में लाने के साथ ही साथ इस्लामी शासन की विचारधारा को परवान चढ़ाया तथा विश्व में प्रचलित दो विचारधाराओं के सामने इस्लामी शासन की नई राह पेश की जिसमें धर्म और इंसान दोनों ही तत्वों को मूल रूप से दृष्टिगत रखा गया तथा जनता का ईमान और इच्छा शक्ति उसकी महत्वपूर्ण पहचान बनी।

 

 

इस्लामी क्रान्ति की सफलता दुनिया के राजनैतिक पटल पर बिल्कुल अदभुत घटना थी। यह घटना अपनी विशेष प्रवृत्ति, लक्ष्यों और परिणाम के आधार पर दुनिया में प्रचलित राजनैतिक समीकरणों में किसी में भी नहीं समाई। इस्लामी क्रान्ति ने दुनिया में मान्यता प्राप्त कर चुके दो ब्लाकों तथा दो मोर्चों में बटी व्यवस्था को अस्त व्यस्त कर दिया। यही कारण था कि दोनों ब्लाक अपनी पुरानी और गहरी दुशमनी को भूलकर इस्लामी क्रान्ति के विरुद्ध एकजुट हो गये। सोवियत संघ, अमरीका तथा इन दोनों शुक्तियों से जुड़े देशों ने इस्लामी गणतंत्र ईरान के विरुद्ध इराक़ के सद्दाम शासन के युद्ध में सद्दाम का साथ दिया। इस्लामी जगत के अन्य विचारकों और धर्मगुरुओं के विपरीत इमाम ख़ुमैनी को यह अवसर मिला कि अपने विचारों को इस्लामी शासन के रूप में ढालें। शीया मुसलमानों, विद्वानों और दार्शनिकों की राजनैतिक विचार धारा का एक मूल सिद्धांत है पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद इमामत का अक़ीदा। यानी उनका यह विचार है कि पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद भी उनका मिशन इमामों द्वारा जारी है।

 

इसी आस्था को इमामत की आस्था कहा जाता है। इस्लाम में इस आस्था का महत्व इतना अधिक है कि इस आस्था के रूप और व्याख्या के आधार पर कई संप्रदाय बन गए हैं। इन संप्रदायों में इमामिया संप्रदाय का इमामत का नज़रिया कुछ विशेषताएं रखता है। इस अक़ीदे अनुसार इमामत वह पदवी है जो ईश्वर की ओर से तथा पैग़म्बर द्वारा दी जाती है और यह दायित्व पैग़म्बर के स्वर्गवास के बाद कि उस व्यक्ति को दिया जाता है जो मानव जाति का मार्गदर्शन करे।

 

 इमाम वह हस्ती है जिसके हाथ में लोगों के भौतिक और अध्यात्मिक जीवन के सभी मामले होते हैं। क़ुरआन की आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों तथा शिष्टाचारों के अनुसार ईश्वर ने उन्हीं लक्ष्यों और कारणों के तहत जिनके आधार पर मानव जाति के मार्गदर्शन और उसे एकेश्वरवाद के मार्ग पर लाने के लिए पैग़म्बर को भेजा है उनके ही आधार पर मानव समाज को पैग़म्बर के स्वर्गवास के बाद मार्गदर्शन के लिए इमाम की ज़रूरत होती है।

 

 

ग़दीरे ख़ुम नामक स्थान की घटना जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपने स्वर्गवास से एक साल पहले तथा अपने जीवन की अंतिम हज यात्रा में लोगों का सरपरस्त बनाया। क़ुरआन की कई आयतें और इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम के कई कथन हैं जो शीया सुन्नी दोनों ही समुदायों के धर्मगुरुओं ने अपनी किताबों में दर्ज किए हैं इनमें साफ़ साफ़ कहा गया है कि पैग़म्बरी के सिलसिले को आगे बढ़ाने का माध्यम इमाम है। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी प्रख्यात हदीसे सक़लैन में कहा कि मैं आप लोगों के बीच दो महान चीज़ें छोड़े जा रहा हूं। इनमें से हर एक दूसरे से महान है। एक है ईश्वरीय ग्रंथ जो आसमान से धरती तक फैली अल्लाह की रस्सी के समान है। दूसरी चीज़ है मेरे परिजन। यह दोनों कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि हौज़े कौसर पर मुझसे आ मिलेंगे। लगभग सभी धर्मगुरू जिनमें सुन्नी समुदाय के धर्मगुरू भी शामिल हैं इस बिंदु पर एकमत हैं कि इस कथन में परिजन से पैग़म्बरे इस्लाम का तात्पर्य हज़रत अली अलैहिस्सलाम से है।

 

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बाद उनके 11 उत्तराधिकारी हैं जो बारी बारी मानवजाति का मार्गदर्शन संभालते रहे हैं। 11वें उत्तराधिकारी मानवता के मोक्षदाता हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम हैं  जो इस समय दुनिया की नज़रों से ओझल हैं और एक समय वह आएगा जब हज़रत इमाम महदी प्रकट होंगे और संसार में न्याय की स्थापना करेंगे। अंतिम समय में मोक्षदाता के प्रकट होने का विचार सभी ईश्वरीय धर्मों में पाया जाता है।

 

 इस विचार का कारण एक तो मनुष्य की अपनी प्रवृत्ति है मनुष्य की प्रवृत्ति उसे न्याय, इंसाफ़ और शांति व सुरक्षा की स्थापना की दावत देती है। मानव जाति की हार्दिक इच्छा यह है कि दुनिया में न्याय की स्थापना हो। दूसरे यह है कि ईश्वरीय दूतों ने अपने अपने काल में अपने मिशन के एक भाग के रूप में यह शुभसूचना दी है कि अंतिम ज़माने में एक महान सुधारक आएगा जो इंसानों को अन्याय और अत्याचारों से मुक्ति दिलाएगा तथा दुनिया से भ्रष्टाचार और बुराइयों का सफ़ाया करेगा। क़ुरआन की आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों शीया समुदाय की मान्यता है कि वह महान सुधारक हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम हैं जो हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा जहेरा के वंशज हैं।

 

 

शीया समुदाय के धर्मगुरुओं के बीच बहस का एक बड़ा विषय यह है कि जब इमाम महदी अलैहिस्सलाम लोगों की आंखों से ओझल रहेंगे तो उस कालखंड में समाज का क्या होगा। इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि जिन कारणों से पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास से पहले ईश्वर ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को उनका उत्तराधिकारी निर्धारित कर दिया उन्हीं कारणों से हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद उनके बेटों को उनका उत्तराधिकारी बनाया। हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के नज़रों से ओझल रहने के कालखंड में भी जिसे ग़ैबत का ज़माना कहा जाता है समाज को उसके हाल पर नहीं छोड़ दिया गया है बल्कि समाज के लिए सरपरस्त निर्धारित किया गया है।

 

 

 

 ग़ैबत दो चरणों पर आधारित है। इसका पहला चरण सीमित है जिसे ग़ैबते सुग़रा अर्थात छोटी ग़ैबत कहा जाता है इस कालखंड में हज़रत इमाम ज़माना अलैहिस्सलाम अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से लोगों के संपर्क में थे लेकिन इसके बाद ग़ैबते कुबरा अर्थात बड़ी ग़ैबत शुरू हुई तो सवाल यह पैदा हुआ कि इस काल के लिए क्या उपाय है। इस काल के लिए लोगों को क़ुरआन तथा पैग़म्बरे इस्लाम के शिष्टाचारों व कथनों का ज्ञान रखने वालों से अपने सवाल पूछने की सलाह दी गई। इमाम ख़ुमैनी ने अपनी पुस्तक हुकूमते इस्लामी में विस्तार से लिखा है कि क़ुरआन की आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम तथा इमामों के कथनों के आधार पर किस तरह इस्लामी सरकार का गठन  किया जा सकता है।

 

 यह पुस्तक वास्तव में इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ में इमाम ख़ुमैनी के उन बयानों पर आधारित है जो उन्होंने अपनी क्लास में दिए। यह उस समय की बात है जब इमाम ख़ुमैनी नजफ़ में निर्वासन का जीवन बिता रहे थे।

 

इमाम ख़ुमैनी के दृष्टिकोण के अनुसार हर काल में इमाम की ज़रूरत बिल्कुल स्पष्ट है। इमाम के अस्तित्व के सहारे ही धर्म के नियमों को लागू किया जा सकता है और धर्म की रक्षा की जा सकती है क्योंकि इमाम धर्म और उसके नियमों का रक्षक होता है। इस प्रकार हर काल में इमाम का निर्धारण आवश्यक है और यह निर्धारण ईश्वर, पैग़म्बरे तथा पहले वाले इमाम के माध्यम से होना चाहिए। इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि इस्लाम धर्म के नियमों की रचना यदि किसी आम विद्वान ने की होती तो वह भी अपने बाद धर्म के अनुयायियों के लिए कोई न कोई बंदोबस्त ज़रूर करता।

 

अब यदि सर्वज्ञानी ईश्वर ने मानव जीवन के लिए कुछ क़ानून बनाए हैं, लोक व परलोक में इंसान के कल्याण के लिए नियम निर्धारत किए हैं तो अक़्ल कहती है कि एसे भी क़ानून और नियम ज़रूर होंगे जिनके बारे में ईश्वर व पैग़म्बर का यह मंशा होगी कि यह जारी रहें। जब दुनिया में क़ानून बनाने वाले आम विशेषज्ञ यह चाहते हैं कि उनका बनाया हुआ क़ानून उनके बाद भी लंबे समय तक चलता रहे तो निश्चित रूप से ईश्वर और पैग़म्बर की भी यही इच्छा होगी कि उनके क़ानून केवल किसी एक कलखंड तक सीमित न रहें। जब यह बात साबित हो गई तो यह भी समझ में आने वाली बात है कि पैग़म्बर के बाद भी एसी हस्ती का होना ज़रूरी है जो इन क़ानूनों को सही रूप से जानती हो।

 

वह हस्ती एसी है जो इन क़ानूनों को न तो भूले और न उनमें किसी भी प्रकार की कमी या बढ़ोत्तरी करे। एसी हस्ती हो जिसे प्रलोभन न दिया जा सकता हो। इमाम ख़ुमैनी के विचार मे इमाम वास्तव में ईश्वरीय निमयों और क़ानूनों को जारी रखने के  लिए पैग़म्बरी की अगली कड़ी है। अतः इमामत के बिना धर्म अधूरा है तथा इमामत की मदद से ही उसे संपूर्ण बनाया जा सकता है।

 

 

इमाम ख़ुमैनी का विचार यह है कि इमाम महदी अलैहिस्सलाम की ग़ैबत के ज़माने में समाज के मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी धर्मगुरुओं पर है। ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद विशेषज्ञ एसेंबली बनी जिसका काम है समाज के नेतृत्व के लिए सबसे सदाचारी, सबसे  न्यायी, और सबसे ज्ञानी व्यक्ति का चयन इस्लामी क्रान्ति और इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वास्तुकार इमाम खुमैनी ने अपनी विचारधारा से धार्मिक लोकतंत्र का सफल नमूना दुनिया के सामने पेश किया।

 

Read 136 times

Add comment


Security code
Refresh