हम्बली धर्म शास्त्र और इमाम अहमद पुत्र हम्बल

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जीवनी

 

अब्दुल्लाह पुत्र हम्बल पुत्र बिलाले शैबानी मरूज़ी अरब के शैबान पुत्र ज़हल या बनी ज़हल पुत्र शैबान ख़नदान से हैं आप हम्बलियों के मार्ग दर्शक और अहले सुन्नत वल जमाअत के चौथे इमाम हैं। आप 164 हिजरी मुताबिक़ 780 ई0 में पैदा हुए। अहम्द पुत्र हम्बल ने ग़रीबी में

 

ज़िन्दगी बिताई और जीविका चलाने के लिए कपड़ा बुनने का काम करते थे। आप ने क़ुरआन का ज्ञान हासिल करने के बाद धर्म शास्त्र का ज्ञान हासिल किया और उसके बाद लेखन कला को हासिल करने मे लग गए। आप ने एक मुद्दत तक अहले राय की पुस्तकों को पढ़ा अहम पुत्र हम्बल हदीस को प्रमाणित करने के लिए विभिन्न सिद्धातों से सहायता लेते थे क्योंकि आप हदीस को दीन का आधार मानते थे। आपने इल्मे हदीस को हासिल करने के लिए 186 हिजरी मताबिक़ 603 ईसवीं में बसरा, कूफ़ा, हिजाज़ (सऊदी अरबिया) और शाम (सीरिया) की यात्रा की।

 

आपके शिक्षक:

 

इमाम अहमद पुत्र हम्बल ने वकीअ, यहया पुत्र आदम, यहया पुत्र सईद क़हतान और यहया पुत्र मोईन जैसे शिक्षकों से बहुत ज़्यादा हदीसें उल्लेख की हैं। इन के अतिरिक्त मीसम तथा अबू यूसुफ़ के छात्र से जो ख़ुद अबु हनीफ़ के छात्र भी थे शिक्षा ग्रहण की है। इमाम शाफ़ेई भी आप के शिक्षक थे।

 

आप के छात्र:

 

अहमद पुत्र हम्बल के वह छात्र जिन्होंने हदीसें उल्लेख करने में आपकी सहायत की है उनके नाम निम्न लिखित हैं:

 

अबुल अब्बास असतख़री, अहमद पुत्र अबी ख़बसमा, अबू यअली मूसली, अबू बक्र असरम, अबुल अब्बास सालब, अबू दाऊद सजिस्तानी, इत्यादि ।

 

आप की म्रत्यु 341 हिदरी मुताबिक़ 855 ईसवी को बग़दाद में हुई।

 

हम्बली धर्म शास्त्र की विशेषता:

 

इस मज़हब से संस्थापक हदीस एकत्र करने और कथनों की जाच पड़ताल करने में इतने लीन हो गये थे कि कुछ उलमा के मुताबिक़, जैसे तबरी ने कहा है कि उनका कोई अलग धर्म शास्त्र नही है। लेकिन इसका दावा किया जा सकता है कि दूसरे तमाम धर्मो से अलग हम्बली नाम का एक धर्म शास्त्र मौजूद है जिसकी विशेषता यह है कि उन्होंने पैग़म्बरे अकरम (स0) की हदीसों की तरफ़ ज़्यादा ध्यान दिया है।

 

हम्बली धर्म शास्त्र के स्रोत:

 

इस धर्म ने अपने धर्म शास्त्र का असली स्रोत क़ुरआन व सुन्नत (पैग़म्बर (स0) के स्वभाव और उनके कथन तथा कर्म) को क़रार दिया है। इस धर्म के मुखिया हज़रात क़ुरआन तथा सुन्नत के बीच फ़र्क़ को नही मानते हैं। जो लोग इन दोनो को अलग समझते हैं या एक को दूसरे से ऊँचा समझते हैं उन की कठोरता से निन्दा करते हैं, और सिर्फ़ हदीसों से तर्क लाते हैं। हम्बली, सहाबा (पैग़म्बर (स0) के शिष्य) और धर्म गुरुओं के कथन को भी विश्वास योग्य मानते हैं। क़ुरआन, हदीस सहाबा के कथन तथा धर्म गुरुओं के अलावा, कुछ और भी चीज़े हैं जिन का महत्व उन के नज़दीक बहुत कम है लेकिन उन को भी तर्क के तौर पर लाया जा सकता है। और वह जगह निम्न लिखित हैं:

 

क़यास, इजमाअ, मसालेह मुरसला तथा सद्दुज़ ज़राएअ।

 

हम्बली कमज़ोर हदीस से उस वक़्त पर लाभ उठाते हैं जब वह क़ुरआन तथा सुन्नत से न टकरा रही हो। उन के धर्म की एक विशेषता जो मशहूर भी हो गई है वह इबादात (अराधना), व्यवसाय, तथा पवित्रता में कठोरता है, इस कठोरता की एक मिसाल ये है कि वह वज़ू में कुल्ली और नाक में पानी डालना अनिवार्य समझते हैं।

 

धर्म गुरू की आवश्यकता एवं सीमांए:

 

इनकी की विशेषताओं में से एक जो अच्छी भी है वह धर्म गुरू की सीमाओं का निश्चित करना है। इस विशेषता की कुछ मिसालें ये हैं:

 

1. धर्म गुरू को ज्ञानी तथा साबिर होना चाहिए।

 

2. धर्म गुरू की नीयत साफ़ होना चाहिए।

 

3. धर्म गुरू को समय तथा लोगों की दशा का ज्ञान होना चाहिए।

 

4. धर्म गुरू को क़ुरआन व सुन्नत और हदीसो की सनद (वह श्रंखला या कड़ी जिस से रावी हदीस को इमाम या रसूल से उल्लेख करता है) का ज्ञानी होना चाहिए।

 

5. एक हद तक धर्म गुरू में फ़तवा देने की काबिलायत और योग्यता होना चाहिए ताकि लोग उस के दुश्मन न हो जाँय।

 

हम्बली धर्म शास्त्र ने समाज की समस्याओं की तरफ भी पूरा ध्यान दिया है तथा इसी तुलना में धार्मिक आदेश दिये है। इसकी कुछ मिसाले निम्न लिखित हैं:

 

• अगर कोई शख़्स किसी ज़मीन को निर्धन एवं कमज़ोर लोगों के लिए समर्पित (वक़्फ) कर दे तो उस से उगने वाली चीज़ों पर ज़कात नही है।

 

• वह रिश्तेदार जिसका ख़र्च आदमी पर वाजिब है ये वह लोग हैं जो स्वंय अपना ख़र्च पूरा नही पर सकते हैं।

 

दावे को तर्क से सिद्ध करने के बारे में हम्बली धर्म शास्त्र का सिद्धांत:

 

1. इक़रार (स्विकृति): हम्बलियों का दृष्टिकोण है कि स्विकृति, शब्द लेखने तथा गूँगे लोगो के लिए इशारे से दावा सिद्ध हो जाता है।

 

2. क़सम: अगर मैं किसी पर किसी चीज़ का दावा करूं और उक को सिद्ध करने के लिए मेरे पास कोई तर्क न हो तो जज प्रत्यक्ष (सामने वाले) को क़सम खाने पर विवश करेगा कि उस की बात झूटी है।

 

3. गवाही: हम्बलियों का विश्वास है कि जिन चीज़ो में गवाही दी जा सकती है वह सात है:

 

अ.एवं ब: ज़िना तथा गुद मैथुन की गवाही चार मर्दों के द्वारा सिद्ध होती है।

 

स. हुदूद (धार्मिक दंड): जैसे कज़्फ़, मदिरा पान, और लूट दो मर्दों की गवाही से सिद्घ होती है।

 

द. वह ज़ख्म जो इन्सान या जानवर पर लगते हैं, उन को जानवरों के डाक्टरों की रिपोर्ट के बाद दो मर्द या एक मर्द व एक औरत की गवाही से सिद्ध किया जा सकता है।

 

ह. औरतों के वह दोष जो मर्दों से छिपे होते हैं ये दोष एक औरत की गवाही से सिद्ध होते हैं।

 

4. क़ुरआ (लाटरी): इस धर्म के अनुसार क़ुरआ आदेश करने के बाराबर है, तलाक़, निकाह, दास आज़ाद करने, माल तथा बीवी के साथ सोने को बाटने के लिए और इसी तरह बीवियों में से किसी एक बीवी को अपने साथ यात्रा पर ले जाने के लिए क़ुरआ करते हैं। अहमद पुत्र हम्बल ने इब्राहीम तथा जाफ़र पुत्र मोहम्मद के कथन मे कहा है कि क़ुरआ जाएज़ है।

 

धार्मिक तथा कलामी अक़ाएद:

 

इमाम अहमद हम्बल और उन के अनुरागी हदीसी धर्म के हिमायती हैं इसलिए उन को कलाम का संस्थापक नही कहा जा सकता, इसलिए अक़ाएद में से जो भी अक़ीदा उन से सम्बंधित है वह सब किताब (क़ुरआत) तथा सुन्नत से लिया गया है।

 

सामान्य रूप से हम्बली इरजा धर्म के मानने वाले है। जैसे कि तकफ़ीर (दूसरे को काफ़िर मानना) के विषय में उन का वही दृष्टिकोण है जो मुरजेआ का है। जैसा कि अध्यात्मा (ख़ुदा शिनासी) के विषय में उन की गिन्ती सिफ़ातिया मे होती है और इसलिए यह लोग जमहीया, क़दरीया, मोअतज़ेला, और उन के मानने वालो की निंदा करते हैं। यह लोग ईश्वर के कथन अर्थात क़ुरआन को मख़्लूक़ नही मानते हैं।

 

ईमान के लिए कथन एवं कर्म को आवश्यक जानते हैं ईश्वर को देखे जाने के विषय को सही मानते हैं क्योंकि विश्वास योग्य हदीस में उन्होंने ईश्वर के देखे जाने का वर्णन किया है।

 

चारो धर्मों मे से सब के कम श्रृद्धालु हम्बली धर्म के हैं, निःसंन्देह इस धर्म के धर्म गुरुओं ने ऐसा काम किया है कि जिस की वजह से वहाबी तथा सलफ़ी विचारों ने बहुत तरक़्क़ी की और वहाबी अपने आप को हम्बलियों से संबद्ध करते हैं।

 

स्रोत:

 

1. फ़िक़्हे तत्बीक़ी, सईद मनसूरी (आरानी)

 

2. अहले सुन्नत वल जमाअत के इमाम मुहम्द रऊफ़ तवक्कुली

 

3. अल अइम्म तुल अरबआ, डाक्टर अहमद अशरबासी

 

4. तहक़ीक़ दर तारीख़ व फ़लसफ़ ए मज़ाहिबे अहले सुन्नत, यूसुफ़ क़ज़ाई

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