शहीद हाज क़ासिम सुलेमानी की बेटी ज़ैनब सुलेमानी ने कहा है कि हाज क़ासिम हमारे ज़माने के ऐसे बहादुर और जांबाज़ शख़्स थे जिनकी दास्तान शहादत के बाद भी फ़न और रिवायत के ज़रिये ज़िंदा है, और जो आज ईरानी क़ौम के साझा एहसास और क़ौमी सरमाया बन चुके हैं।
शहीद हाज क़ासिम सुलेमानी की बेटी ज़ैनब सुलेमानी ने कहा है कि हाज क़ासिम हमारे दौर के ऐसे बहादुर और जांबाज़ इंसान थे जिनकी कहानी शहादत के बाद भी फ़न और रिवायत के ज़रिये ज़िंदा है। आज वह ईरानी क़ौम के साझा एहसास और क़ौमी सरमाया बन चुके हैं।
तेहरान में “मकतब-ए-हाज क़ासिम” के उनवान से मुनक़इद फ़नकारों और मीडिया से जुड़े लोगों के इज्तेमा में ख़िताब करते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम का मक़सद शहादत की बरसी के मौक़े पर हाज क़ासिम सुलेमानी के अफ़कार और उनके मकतब पर बातचीत करना है। अहले-फ़न और अहले-रिवायत से गुफ़्तगू करना उनके लिए इज़्ज़त की बात है।
ज़ैनब सुलेमानी ने कहा कि तारीख़, अदब और फ़न में बहादुर और सूरमा हमेशा समाज को अपनी तरफ़ खींचते हैं और लोगों को क़ीमतों और भलाई की राह दिखाते हैं। ईरानी समाज में भी सूरमाओं ने हमेशा अहम किरदार अदा किया है, और शहीद हाज क़ासिम सुलेमानी हमारे दौर के ऐसे ही सच्चे सूरमा थे।
उन्होंने कहा कि हाज क़ासिम कोई अफ़साना या काल्पनिक किरदार नहीं थे, न ही उन्होंने लोहे का कवच पहना था, लेकिन उन्होंने तकफ़ीरी गिरोहों जैसे ज़ालिम दुश्मनों के सामने डटकर मुक़ाबला किया और मज़लूम औरतों, बच्चों और आम लोगों के लिए अमन वापस लाए। उनकी इस ताक़त का राज़ इमाम ख़ुमैनी (रह) के मकतब और रहबर-ए-इंक़ेलाब-ए-इस्लामी की तालीमात में छुपा हुआ है।
ज़ैनब सुलेमानी ने आगे कहा कि शहादत के बाद हाज क़ासिम सुलेमानी लोगों के दिलों में और ज़्यादा ज़िंदा हो गए। फ़िल्म, शायरी, म्यूज़िक और दूसरी फ़न्नी तख़लीक़ात में यह एहसास साफ़ नज़र आता है कि “क़ासिम अभी ज़िंदा है।
आख़िर में उन्होंने फ़नकारों और मीडिया से जुड़े लोगों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि उन्हीं की कोशिशों से शहीद सुलेमानी का रास्ता और उनका मकतब समाज में हमेशा ज़िंदा रहेगा।













