हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अली नज़री मुनफ़रिद ने कहा है कि अक़्ल और नक़्ल दोनों इस हक़ीक़त पर दलील पेश करते हैं कि हर दौर में ख़ुदा की जानिब से एक हुज्जत का मौजूद होना लाज़िमी है, और ज़मीन कभी भी इमाम व रहबर-ए-इलाही से ख़ाली नहीं रहती।
हौज़ा ए इल्मिया के उस्ताद हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन अली नज़री मुनफ़रिद ने महदवियत के बुनियादी बहसों में से एक अहम मौज़ू यानी हर ज़माने में इमाम-ए-मासूम की ज़रूरत पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि अगरचे रसूल-ए-अकरम स.स.व. के ज़रिये दीन मुकम्मल हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद हिदायत, दीन की सही तफ़सीर, इख़्तिलाफ़ात के हल और वह़्य के तहफ़्फ़ुज़ के लिए हर दौर में एक मासूम रहनुमा की ज़रूरत बाक़ी रहती है।
उन्होंने वाज़ेह किया कि अक़्ली एतिबार से इंसानी मुआशरा ऐसे इलाही रहबर से बे-नियाज़ नहीं हो सकता जो हक़ व बातिल में तमीज़ करे; क्योंकि अगर ज़मीन इस नूर-ए-हिदायत से ख़ाली हो जाए तो गुमराही और इनहिराफ़ लाज़िमी हो जाते हैं।
नक़्ली दलीलों की वज़ाहत करते हुए उन्होंने क़ुरआन-ए-करीम की आयात का हवाला दिया, जिनमें हर उम्मत के लिए हादी और रहनुमा के तसलसुल का ज़िक्र मिलता है, और इस बात की तरफ़ इशारा किया गया है कि क़ियामत के दिन हर क़ौम को उसके इमाम के साथ बुलाया जाएगा।
उन्होंने मुतअद्दिद अहादीस का भी ज़िक्र किया, जिनमें यह बात सराहत से बयान हुई है कि अगर एक लम्हे के लिए भी हुज्जत-ए-ख़ुदा ज़मीन से उठा ली जाए तो ज़मीन अपने बाशिंदों समेत तबाह हो जाएगी।
इसी तरह यह हदीस कि जो शख़्स अपने ज़माने के इमाम को पहचाने बग़ैर मर जाए, उसकी मौत जाहिलियत की मौत है इमाम की मआरिफ़त की अहमियत को वाज़ेह करती है।
उस्ताद-ए-हौज़ा ने बारह इमामों (अ.स.) से मुतअल्लिक़ मशहूर हदीस का हवाला देते हुए कहा कि यह रिवायत अहले-सुन्नत की मोअतबर किताबों में भी मौजूद है, और इसका सही मिसदाक़ सिर्फ़ अहले-बैत (अ.स.) के बारह इमाम ही हैं।
आख़िर में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हज़रत महदी (अ.स.) का वुजूद और उनका ज़ुहूर इस्लामी रिवायात में एक मुसल्लम हक़ीक़त है, और इसका इंकार दरअसल सुन्नत-ए-नबवी स.ल.व. के एक क़तई हिस्से का इंकार है।













