दिनी इज्तिमाआत और मजालिस के इनक़ाद में उलेमा के किरदार को पस-ए-पुश्त नहीं डाला जाना चाहिए

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दिनी इज्तिमाआत और मजालिस के इनक़ाद में उलेमा के किरदार को पस-ए-पुश्त नहीं डाला जाना चाहिए

 आयतुल्लाह मुहम्मद मेंहदी शब ज़िंन्दा दार ने कहा कि इस्लामी मआरिफ़ की नशर-ओ-इशाअत, अख़लाक़ की तरवीज और दीन की तालीमात की गहराई को बयान करना उलेमा की बुनियादी ज़िम्मेदारियों में से है। अगर दीनी महाफ़िलों और मजालिस के इनक़ाद में उलेमा और हौज़ा ए इल्मिया के फ़ुज़ला के किरदार को तदरीज़न कम कर दिया जाए और उन्हें ख़िताबत व मआरिफ़ की तौज़ीह के लिए दावत न दी जाए, तो यह रवैय्या तवील मुद्दत में मनफ़ी नताइज का सबब बनेगा।

हौज़ा ए इल्मिया की आला कौंसिल के सेक्रेटरी आयतुल्लाह मुहम्मद मेंहदी शब ज़िंदा दार ने ईरान के दारुल-हुकूमत तेहरान के मेयर अली रज़ा ज़ाकानी और उनके मुआविनीन से शहर क़ुम में मुलाक़ात के दौरान निज़ाम-ए-इस्लामी में हदफ़मंद मंसूबाबंदी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

उन्होंने कहा कि हर किस्म की मंसूबाबंदी वाज़ेह और मुतअय्यन अहदाफ़ पर मबनी होनी चाहिए। पहले बुनियादी और कलीदी मक़ासिद तय किए जाएँ, फिर उनके तहक़्क़ुक़ के लिए अमली क़दम उठाए जाएँ।

उन्होंने कहा कि हुकूमत-ए-इस्लामी भी इस उसूल से मुस्तसना नहीं है। यह ज़रूरी है कि वाज़ेह तौर पर तय किया जाए कि इस्लामी निज़ाम किन अहदाफ़ का तआक़ुब कर रहा है और उन्हीं की बुनियाद पर पॉलिसी साज़ी और अमली इक़दामात किए जाएँ।

आयतुल्लाह शब ज़िंदा दार ने इस्लाम और अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के मआरिफ़ व अहदाफ़ को बयान करने के तरीक़े की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि इस्लाम के तरबियती असालीब में से एक यह भी है कि बुलंद मआरिफ़, अहकाम और अज़ीम मक़ासिद को दुआ के क़ालिब में पेश किया जाता है, ताकि दिली तवज्जोह, ख़ुदावंद-ए-मुतआल से उन्स और हक़ तआला से मुहब्बत की कैफ़ियत मज़बूत हो और साथ ही इलाही अहदाफ़ की तरफ़ रहनुमाई भी मिलती रहे।

उन्होंने माह-ए-मुबारक रमज़ान में पढ़ी जाने वाली दुआ-ए-इफ्तिताह की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि इस दुआ में बेहद अमीक और वसीअ मआरिफ़ नयाज़ के अंदाज़ में बयान हुए हैं। इस दुआ का एक अहम फ़िक़रा है: «اللهم انا نرغب الیک فی دولة کریمة…» जिसमें मोमिनीन “दौलत-ए-करीमा” के क़ियाम की दुआ करते हैं।

उन्होंने वाज़ेह किया कि “दौलत-ए-करीमा” का तसव्वुर सिर्फ़ फ़र्दी इबादात जैसे नमाज़ और रोज़ा तक महदूद नहीं है, बल्कि यह दुआ हमें सिखाती है कि दीन महज़ ज़ाहिरी इबादात का नाम नहीं, बल्कि इस्लामी मुआशरा ऐसी हुकूमत का मुहताज है जो इलाही अहदाफ़ के तहक़्क़ुक़ के लिए मुनासिब माहौल और बुनियाद फ़राहम करे।

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