ईरान की अमेरिका पर विजय ने एक सभ्यता और विचारधारा की पश्चिम पर जीत को दर्शाया

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ईरान की अमेरिका पर विजय ने एक सभ्यता और विचारधारा की पश्चिम पर जीत को दर्शाया

ख़ुरासान रज़वी मे वली फ़कीह के प्रतिनिधि ने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच टकराव केवल सैन्य या राजनीतिक संघर्ष से कहीं आगे का विषय है। उनके अनुसार, इस मैदान में जो कुछ हुआ वह एक सभ्यता और एक विचारधारा की पश्चिम पर जीत है, जो जनता के प्रतिरोध और मैदान में उनकी निरंतर उपस्थिति के कारण संभव हुई।

आयतुल्लाह सय्यद अहमद अलम उल हुदा, ख़ुरासान रज़वी मे वली फ़क़ीह के प्रतिनिधि ने 17 जून को मशहद के खोआजे रबी क्षेत्र में एक जनसभा में कहा कि यह वह महाकाव्य है जो आपने रचा और वह 100 दिनों का संघर्ष जिसने इस्लाम और क्रांति की गरिमा को दुनिया के सामने उजागर किया, जबकि दुश्मन की अपमान, कमजोरी और नाकामी भी पूरी दुनिया के सामने दर्ज हुई।

उन्होंने कहा कि आज जब हम उस शत्रुतापूर्ण हमले के 100 दिनों बाद परिणामों का मूल्यांकन करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि हमें जो भौतिक क्षति हुई उसके मुकाबले हमने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त किया है। यह घटनाएँ इस्लाम और क्रांति को विश्व जनमत के सामने एक नए रूप में प्रस्तुत करती हैं।

उन्होंने आगे कहा कि आज दुनिया के कई देश और विकसित समाज यह मानते हैं कि ईरान और अमेरिका का संघर्ष केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं है, बल्कि यह एक सभ्यताओं का टकराव है—ईरान की एक सभ्यता और विचारधारा बनाम पश्चिमी सभ्यता।

उन्होंने कहा कि दुनिया यह नहीं मानती कि केवल सैन्य क्षति या राजनीतिक विफलता हुई है, बल्कि यह एक व्यापक सभ्यतागत संघर्ष है जिसमें ईरान ने पश्चिमी सभ्यता और उसकी विचारधारा पर विजय प्राप्त की है।

अलम उल हुदै ने कहा कि दुनिया यह नहीं देखती कि केवल एक युद्ध हुआ या केवल आर्थिक और सैन्य नुकसान हुआ, बल्कि यह समझा जा रहा है कि यह एक “सभ्यताओं की लड़ाई” थी।

उन्होंने आगे कहा कि ईरान ने इस संघर्ष के माध्यम से इस्लाम, शिया विचारधारा और विलायत-ए-अहले-बैत की सभ्यता को दुनिया में प्रभावशाली बनाया है।

उनके अनुसार, आज विशेषज्ञ यह नहीं कहते कि ईरान की शक्ति केवल हथियारों, तकनीक या विश्वविद्यालयों के कारण है, बल्कि वे मानते हैं कि इसका मूल कारण जनता की वह उपस्थिति है जो सड़क और मैदान को खाली नहीं छोड़ती।

उन्होंने कहा कि यही इस्लामी सभ्यता और विलायती विचारधारा है जो लोगों को बिना भय के प्रतिरोध और यहां तक कि शहादत के लिए तैयार करती है। यही विचारधारा एक राष्ट्र को दुश्मन के सामने डटे रहने की शक्ति देती है।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि चीन में हाल ही में एक बैठक में भी यह स्वीकार किया गया कि ईरान के प्रतिरोध ने जिस सभ्यता को दुनिया में फैलाया है, वह इस्लाम और विलायत की सभ्यता है।

उन्होंने कहा कि इस 100 दिनों की जनता की उपस्थिति का परिणाम यह है कि दुनिया इस्लाम को अधिक पहचानने और स्वीकार करने लगी है।

उन्होंने कहा कि यदि जनता मैदान में उपस्थित न होती, तो इतने बड़े परिणाम संभव नहीं थे। यह केवल सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि पश्चिमी सभ्यता की हार और इस्लामी विचारधारा की विजय थी।

उन्होंने कहा कि यह सब कुछ जनता के प्रतिरोध का परिणाम है, और इसी के कारण दुनिया में इस्लाम और उसकी विचारधारा की प्रतिष्ठा बढ़ी है।

उन्होंने कहा कि इमाम महदी (अ) का ज़ुहूर तभी होगा जब ऐसा वैश्विक वातावरण तैयार होगा, और यह प्रतिरोध उसी दिशा में एक कदम है।

उन्होंने अंत में कहा कि यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है और दुश्मन विभिन्न रूपों में हमला जारी रखेगा, इसलिए जनता की उपस्थिति और एकता ही इसका सबसे बड़ा उत्तर है।

उन्होंने कहा कि दुश्मन एक “संयुक्त युद्ध” (हाइब्रिड वार) की योजना बना रहा है—जिसमें अंदरूनी अस्थिरता, हथियारों की तस्करी, और समूहों का गठन शामिल है—लेकिन जनता की उपस्थिति के कारण ये योजनाएँ विफल होंगी।

उन्होंने कहा कि अंततः यह सब कुछ जनता की वफ़ादारी, विलायत-ए-अली (अ) और अहले-बैत (अ) से उनके दिली संबंध का परिणाम है, जिसने इस्लाम की गरिमा को दुनिया में फैलाया है।

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