सऊदी नीतियाँ उम्मत की एकता के लिए ख़तरा। अंसारुल्लाह

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सऊदी नीतियाँ उम्मत की एकता के लिए ख़तरा। अंसारुल्लाह

,अमेरिका, इस्राईल और ब्रिटेन के साथ मिलकर मुस्लिम उम्मत की किसी भी एकजुट और साझा स्थिति को कमजोर करने में सऊदी अरब की भूमिका अब पूरी तरह स्पष्ट और जगज़ाहिर हो चुकी है।

यमन के खिलाफ सऊदी अरब का सैन्य अभियान वर्षों से जारी है। इसका कोई वैध कानूनी आधार नहीं है और यह अमेरिका तथा इस्राईल के साथ उसकी नीतिगत समानता और निष्ठा के तहत चलाया जा रहा है।

सऊदी अरब की इस भूमिका का पहला शिकार फ़िलिस्तीनी जनता बनी है, जो इस समय नरसंहार का सामना कर रही है।

सऊदी अरब की नीतियों के कारण इस्राईल के बहिष्कार और उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए इस्लामी दुनिया में कोई संयुक्त और एकजुट राजनीतिक रुख विकसित नहीं हो पाया।

सऊदी अरब की नीति ने “फ़िलिस्तीन की आज़ादी” के नारे को ही एक आपराधिक और आतंकवादी कृत्य के रूप में प्रस्तुत कर दिया है, जिसके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें दंडित करने की बात कही जा रही है।

अमेरिका और इस्राईली शासन ग़ाज़ा के लोगों के नरसंहार को सामान्य बनाने और उसे एक स्वीकार्य घटना के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं

लेबनान में प्रतिरोध की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और वह अरब तथा इस्लामी उम्मत के सम्मान और गौरव का कारण है, लेकिन लेबनान की सरकार अमेरिका के निर्देशों पर चलते हुए उसी प्रतिरोध को पीछे से कमजोर कर रही है।

लेबनान की सरकार राष्ट्रीय हितों के लिए प्रतिरोध की महत्वपूर्ण भूमिका का लाभ उठाने के बजाय उसे नज़रअंदाज़ करने का प्रयास कर रही है।

हिज़्बुल्लाह के रुख और उसके प्रति ईरान के समर्थन की सराहना की जानी चाहिए तथा लेबनान की सरकार को देश के हित में इस क्षमता का उपयोग करना चाहिए।

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