परिवार ही इस्लामी सभ्यता की नींव और ज़ुहूर की तैयारी का आधार

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परिवार ही इस्लामी सभ्यता की नींव और ज़ुहूर की तैयारी का आधार

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैय्यद अलीरज़ा तराशियून ने कहा कि वैश्विक दृष्टिकोण, दुश्मन की पहचान, दूरदर्शिता और कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता से युक्त नई पीढ़ी का निर्माण ही इस्लामी सभ्यता की स्थापना और हज़रत इमाम मेंहदी (अज.) के ज़ुहूर की तैयारी का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैय्यद अलीरज़ा तराशियून ने कहा कि वैश्विक दृष्टिकोण, दुश्मन की पहचान, दूरदर्शिता और कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता से युक्त नई पीढ़ी का निर्माण ही इस्लामी सभ्यता की स्थापना और हज़रत इमाम मेंहदी (अज.) के ज़ुहूर की तैयारी का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है।

उन्होंने मस्जिद-ए-मुक़द्दस जमकरान में आयोजित साप्ताहिक दुआ-ए-तवस्सुल कार्यक्रम में इस्लामी क्रांति, प्रतिरोध मोर्चे, हालिया युद्ध और शहीद इमाम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि शहीद नेता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उनकी सभ्यता-निर्माण की दृष्टि थी। उन्होंने कहा कि इस्लामी सभ्यता की स्थापना, हज़रत इमाम मेंहदी (अज.) की वैश्विक सरकार के गठन की प्रस्तावना है।

उन्होंने इस्लामी सभ्यता के निर्माण के मूल स्तंभों की व्याख्या करते हुए कहा कि परिवार इस पूरी प्रक्रिया की पहली और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। परिवार ही वह स्थान है जहाँ ऐसी पीढ़ी का निर्माण होता है जो भविष्य की इस्लामी सभ्यता की नींव रख सकती है।

तराशियून ने कहा कि इस्लामी सभ्यता की स्थापना के चार प्रमुख आधार हैं:परिवार,सभ्यता-निर्माता पीढ़ी का निर्माण,सभ्यतागत दृष्टिकोण वाला समाज,युवा और क्रांतिकारी सरकार।

उन्होंने कहा कि यदि आने वाली पीढ़ी का सही ढंग से निर्माण नहीं किया गया, तो आदर्श समाज की स्थापना और ज़ुहूर की तैयारी संभव नहीं होगी।

उन्होंने कहा कि इस्लामी सभ्यता ईमानदार और जागरूक इंसानों से बनती है। इसलिए सभ्यता-निर्माता पीढ़ी में चार विशेषताएँ होना आवश्यक हैं:वैश्विक दृष्टिकोण,सत्य और असत्य के मोर्चों की पहचान,दुश्मन की पहचान,कठिनाइयों को सहने की क्षमता।

उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही मज़लूमों का समर्थन करने, वैश्विक ज़िम्मेदारी निभाने और सत्य के मोर्चे की रक्षा करने की शिक्षा दी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि दुनिया हमेशा हक़ और बातिल के संघर्ष का मैदान रही है। इसलिए धार्मिक शिक्षा तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक बच्चों को हक़ और बातिल के बीच का अंतर तथा इस्लाम के दुश्मनों और उनकी घुसपैठ के तरीकों से परिचित न कराया जाए।

उन्होंने परिवारों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों में प्रतिरोध, धैर्य और संघर्ष की भावना विकसित करें। उन्होंने कहा कि इस्लामी क्रांति और प्रतिरोध मोर्चे की अनेक महान हस्तियाँ धैर्य, कठिनाइयों को स्वीकार करने और निरंतर संघर्ष पर आधारित इसी प्रकार की परवरिश का परिणाम थीं, और यही गुण आने वाली पीढ़ियों में भी मज़बूत किए जाने चाहिए।

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